📕 श्रेष्ठता के पैमाने
सभी श्रेष्ठता अपनी वास्तविक गुणवत्ता पर ही टिकी हो यह ज़रूरी नहीं है। साहित्य में तो और भी नहीं। यहांँ तो और बहुत सूक्ष्म, कूटनीतिक स्तर तक बौद्धिक कुशलता से संस्थापित होते हैं। अधिकतर ऊंँचाई और श्रेष्ठता भी अक्सर,संगठनात्मक प्रक्षेपण और प्रायोजित होती हैं। कभी विचारधारा, कभी पारस्परिक स्वार्थ और प्रवृत्ति मूलक लाभकारी योजना में। वैसे दुर्भाग्य से ऐसी तुच्छताओं के संकीर्ण संगठन साहित्य कलाएंँ और प्रबौद्धिक समाजों में अधिक ही सक्रिय रहते हैं। इनके कारण प्रतिगामी विचार और कार्य को अदृश्य और बहुत सूक्ष्म रूप में पर्याप्त ताक़त मिलती रहती है। दिलचस्प कहें या दोहरा दुर्भाग्य यह है कि मीडिया-माध्यमों में ये ही वर्ग,साहित्य की मशाल होने का भी दम भरते दृष्टिगोचर होते हैं।
इनके पीछे अति महत्वाकांँक्षी नवसिखुओं की शोभायात्रा भी चलने लगती है।
आप माने रह सकते हैं :
अपवाद का तिनका !
💥 गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
Friday, February 2, 2024
श्रेष्ठता के पैमाने
Friday, January 26, 2024
ग़ज़लनुमा : यादों से पहले माज़ी का मंज़र
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यादों से पहले माज़ी का मंज़र था
बाद नदी के आगे एक समन्दर था।
सजी धजी मीना बाज़ार व' मोहतरमा
और सामने कोई खड़ा क़लन्दर था।
अभी-अभी तो नेता की मजलिस छूटी
और अभी ही भड़का कोई बवंडर था।
अबके भी बादल बरसे बिन लौट गये
धरती के आगे शर्मिन्दा अम्बर था।
अन्देशे हर सू क्या अनहोनी हो जाए
ऐसे में इक फ़ोन अजाना नंबर था।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Tuesday, January 23, 2024
शे-एर नुमा : सिमट कर रह गया लगता है
सिमट कर धँस गया लगता है जीवन ही सियासत में
अभी तो गीत गाना इश्क़ होना,चाय भी सियासत है।
•• गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Monday, January 22, 2024
चित्त इतना क्यों है उद्विग्न आज?
Friday, January 19, 2024
मेघाच्छन्न प्रतिबद्धताओं में
💨 मेघाच्छन्न प्रतिबद्धताओं में
लिख पढ़ की दृष्टि से प्रतिबद्ध
रचनाकारों का अभी अकाल काल चल रहा लगता है। सच और यथार्थ तो फिलहाल दलीय राजनीतिक सत्ताओं के मीडियाओं की लुक्का छिप्पी भर बन गया है। सार्वजनिक जीवनके सभी यथार्थ किसी न किसी राजनीतिक सत्ता की ही उपज भर प्रचारित होने रहने के कारण अपने-अपने सकल प्रतिबद्ध अपनी ज़िद से ही तमाम चैनेलों पर पक्षीय यथार्थ गढ़ कर सेवायें दे रहे हैं।काम चला रहे हैं।ऐसा सिर्फ़ साहित्य में ही नहीं, प्रखर उग्र पत्रकारिता में भी आम लगता है। साधारण जन के लिए तो यह और खतरनाक है।आख़िर उनका भी तो कोई अपना पक्ष है। इस घटाटोप को वे क्या समझें और करें ? किस तरफ देखें,जायँ।
जाने किनके पास अपना अपना कैसा विश्वस्त सूचना-तंत्र है कि वे भरदेशी समाज राजनैतिक सच्चाइयों को आर-पार देख परख लेते हैं,समझ लेते हैं और मन मुताबिक़ कहने के लिए सान्ध्य सत्यों की भी बारात भी सजा लेते हैं। आश्चर्य होता है।
साधारण जन और सिर्फ़ लेखक इसमें बौआ जाता है। भटक जाता है।उसमें तो
किंकर्तव्यविमूढ़ता की परिस्थिति व्याप्त है।
पत्रकारिता तो ख़ैर रोज़मर्रे की खेती है लेकिन इस घनी अनिश्चितता के दौर में कुछ दिनों तक कविता लिखना स्थगित नहीं रखा जा सकता ? मैंने तो सोचा है।
#उचितवक्ताडेस्क।
Thursday, January 18, 2024
दो पंतिया: फटी चिटी ख़ुशियाली से
फटी-चिटी ख़ुशियाली से अब बिल्कुल दिल भरता है नहीं।
होता कोई एक मुकम्मल सिर पर अर्श शामियाना।
* गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Wednesday, January 17, 2024
शे-र नुमा :
बाहर से डर कर घबरा कर मैं अपने भीतर भागा, और घिर गया और डर गया और तीरगी तन्हाई से।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
