Saturday, July 25, 2026

रंजन कुमार (भागलपुर को सम्बोधित

                           🕸️
प्रिय भाई रंजन,
मीरा जयन्ती पर अब भागलपुरमें ''मीरा महोत्सव" होता है या नहीं रञ्जन ? मारवाड़ी स्कूल प्राँगण में जो विशाल रूप में होता था। आदरणीय हरिकुञ्ज जी ही थे न सूत्रधार उसके ?
... एक बार तो उसी अवसर और भाईजी डॉ.बेचन जी की अनुकम्पा से मुझ पर भारी विपदा आन पड़ी थी। जयन्तीक समारोह में उस रात कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे माननीय सांसद भागवत झा आज़ाद जी। संचालन -डॉ.बेचन। मैं (किसी स्वाभिमान जन्य कारणसे 'सविनयअवज्ञा' पूर्वक सामान्य श्रोता वृन्द के साथ विशाल पांडाल में बैठा था। बेचन जी मुझे लगातार मञ्च पर आकर बैठने का आह्वान कर रहे थे और मैं आदरपूर्वक अनसुना किए जा रहा था।उधर डॉ बेचन जी को श्रोताओं में से मेरे लिए पर्चियांँ आ रही थीं।अवश्य ही युवाओं के आग्रह से। मंच से इसके हवाले से भी मुझे बुलावे आ रहे थे।मैं आदरपूर्वक मंच पर जाना टाले जा रहा था। डॉ बेचन जी ने किंचित खीझ के साथ ही आखिर मुझ पर रामवाण की तरह छोड़ दिया। बोले -'सभा के अध्यक्ष,आज़ाद जी का आग्रह है कि गुंजन जी मञ्च पर आकर बैठें।.’... 

   उसके बाद का दृश्य जो वहाँ हुआ वो तो 'जो हम जानते हैं हमीं जानते हैं'।वह धर्मसंकट काल ! ऊपर से आज़ाद जी उन दिनों मुझसे नाराज़ चल रहे थे। क्यों यह तो पता नहीं।...लेकिन सो यादें फिर कभी।
   लगभग यही घटना टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल हॉल के आयोजन में हो गयी।उसमें तो मुझे सभाध्यक्ष आ. चाँद मिसिर जी की भी 'सविनय अवज्ञा' करनी पड़ी थी। प्रसंग देवेन्द्र जी सुधाकर जी के एक साहित्यिक आयोजन का था शायद। उन दिनों मेरे ये दोनों प्रिय अग्रज भी भागलपुर में मेरे ‘बाहरी आदमी’ होने की प्रच्छन्न मुहिम चला रहे थे…🤔। उस आयोजन में मुझे विधिवत् काव्यपाठ का आमंत्रण कार्ड नहीं भेजा था। कार्ड भर भेजा था। सो कवि के स्वाभिमान में मैं,काव्य पाठ करने को तैयार नहीं हुआ और वहाँ भी जे.चन्द्रशेखर (चाँद मिसिर जी ) जैसी मेरे इतने आत्मिक शुभेच्छु तक को नाराज़ करना पड़ा था…।  

   संभव हुआ तो कभी कहने का मन है मेरा...  आप थे कि नहीं रञ्जन उस रात वहाँ मारवाड़ी स्कूल प्रांगण के ‘मीरा महोत्सव में ? तब मेरे युववाणी के बहुत से युवा तो उपस्थित थे वहाँ। युवा तुर्क दिवाकर विद्रोही,संतोष प्रीतम तो सद्य: याद आ रहे हैं। आज के प्रोफेसर अमरेन्द्र तब मेरी युववाणी के स्टार शाइर 'अमरेन्द्र घायल' हुआ करते थे और कुमार भागलपुरी तो भागलपुरी ही रहे।रामावतार राही जी(दुःखद कि अब नहीं हैं )।राही शंकर ,

'कैक्टस' साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक पुराने मेरे मित्र तो सुविधा पूर्वक उस मंच पर आसीन ही थे वहाँ।                                                               आज भी यह सवाल मन में है ही और इस बात का दुःख भी कि मुझे ही  ‘वहाँ मुझे, मुझे भागलपुर में, बाहरी आदमी माना गया …और सो अपने ही आत्मीय समानधर्मी लेखक मित्रों द्वारा भी…

   होली की शुभकामनाएंँ भागलपुर ।
                       ▪️
[आपको सम्बोधित यह पत्र मैंने कभी आपको भेजा था वह मिला था या कितने ही मेरे ऐसे लिखे आर्काइव में ही दम तोड़ते हुए में शामिल रह गये? फाईलों में आज दिख गया तो इसी शक में भेज रहा हूंँ। सस्नेह,]

-गंगेश गुंजन।
17.01.2017.

Friday, July 24, 2026

.यहाँ ...

•                       यहाँ.
                         ▪️
कुछ प्रोफेसर टाइप प्रबुद्धों को लगता है मानो अवकाश प्राप्ति के बाद भी वे क्लास में छात्र पढ़ा रहे हैं। कुछ एक तो फेसबुक पर भी अनवरत
समुपलब्ध हैं। परन्तु
यहीं पर कुछेक प्रोफ़ेसर यदि फेसबुक पर लिखना छोड़ दें तो हम जैसे कितने ही फेसबुकिए फेसबुक को ही छोड़ दें।
   विशद सामाजिक जीवन में मनुष्य की ऐसी ही  कुछ रोमांँचक चुनौतियांँ भी हैं जिनमें चकित और अकस्मात् प्रेरित कर देने वाले कितने ही अवसर भी झलकते हैं !
                      गंगेश गुंजन 

                    #उचितवक्ताडे.

Tuesday, July 21, 2026

टिप्पणी : कुछ शब्द आजकल...

📕               कुछ शब्द आजकल,
आदमी के होंठों पर आते ही या,क़लम से काग़ज़ पर उतरते ही राजनीति बन जाते हैं,चाहे वे कितने ही स्वच्छ हृदय से कहे-लिखे गए ही क्यों न हों।
                                🌘                                                          गंगेश गुंजन                                               #उचितवक्ताडेस्क.

उधो,ब्रज मोहि बिसरत नाही... भागलपुर बाल स्मृति

📘        उधो,ब्रज मोहि बिसरत नाहीं…
     भागलपुर : बाल-स्मृति और स्वतंत्रता का
                    पहला बोध।
                           •
भागलपुर मेरे जीवन में क्या है,मैं आज भी पूरी तरह नहीं समझ पाता। उलझन में ही रह जाता  हूँ। आज फिर अचानक उसकी एक स्मृति मन में उभर आई। तब हम लोग बरारी में रहते थे। ठीक गंगा किनारे की बंगला कोठी में। वहीं पास ही कारकंपनी जहाज़ घाट भी था।बाबू जी ने हमें वहीं गंगा में तैरना भी सिखाया था।
   एक दिन माँ ने कहा कि मेरी किन्हीं बहन के पति अर्थात मेरे बहनोई बहुत दिनों के बाद जेल से छूट कर आए हैं और हमलोग उनसे मिलने जाना चाहिए। जेल से छूट कर? उस समय मेरे बाल मन में जेल का अर्थ बस यही था कि जेल में तो चोर बन्द करके रखे जाते हैं । खाली चोर। डाकू नहीं। क्योंकि चोर पर गुस्सा जाय तो उल्टे डाकू ही पुलिस को पकड़कर ले जाता है। डाकू को तो पुलिस पकड़ ही नहीं सकती। पुलिस उतना ताकतवर नहीं होती। डकैत ही सबसे बहादुर होता है,ऐसी हमारी बाल धारणा थी।तब हत्या जैसे अपराधों की दुनिया का तो हमें कोई ज्ञान ही क्या होता,नहीं था।
आज सोचता हूंँ तो यह भी लगता है कि शायद तब चोरी के अलावा बुरी घटनाएं और होती भी कहां थीं। डकैती को तो हम बच्चे बहादुरी ही मानते थे। इसलिए मन में सवाल उठा —मेरे संबंधी चोर कैसे हो सकते हैं?’ बाल अभिमान को भी धक्का लगा…
  माँ,मेरे बड़े भाई,मैं और दो बहनें पांँव पैदल चल कर ही उनसे मिलने गए। तब रिक्शा आदि का कोई चलन था भी कहां। यों बरारी बस्ती का यह इलाका हमारी बँगलाकोठी से था भी नज़दीक ही। दोपहर का समय रहा होगा। पहुंँचे तो वहाँ बाहर के बरामदे में बिना कंबल दरी की खाली चौकी पर एक गोरे गोरै धोती पहने एक सज्जन पालथी मारकर बैठे थे।उनके आसपास बैठे लोग आदरपूर्वक बहुत ध्यान से उनसे बातें कर रहे थे। मां को देखते ही वे उठे और पैर छूकर प्रणाम किया। फिर मां आंगन तरफ़ चली गईं। जाते-जाते मैंने सहमे सहमे हुए ही उन्हें बड़े गौर से देखा। मुझे तो उनमें चोर जैसा कुछ खास नहीं लगा। वे तो एकदम और लोग जैसे ही लग रहे थे। बाद में माँ ने बताया कि छोटा लड़का, बुद्धी (बुद्धिनाथ झा, और बड़ा, भोला, दोनों तुम्हारे भांँजे हैं। यह बात मेरे लिए और आश्चर्य की थी क्योंकि वे लगभग मेरी ही उम्र के और दूसरे मुझसे बड़े थे। हमारे बरारी हाई स्कूल में ही पढ़ते थे।तब जान पहचान नहीं थी।
बाद के वर्षों में उनसे आनंदगढ़ के भोज के अवसरों पर मुलाकात होती रही।आनन्द गढ़ में बहुत भोज हुआ करता था। पर भांजों से हम दोनों भाइयों की निकटता अधिक नहीं बन सकी।
   घर लौटकर भी मेरे मन का सवाल शांत नहीं हुआ। एक दिन मैंने किसी बड़े से धीरे से पूछ ही लिया, "उन्होंने क्या चोरी की थी जो जेल गए थे?" वे मुस्कराए और बोले, "अरे, वे चोर नहीं थे। वे तो स्वतंत्रता संग्राम में ,बयालिस के आंदोलन में बिजली तार तोड़ने पोस्ट आफिस स्टेशन सब जलाने गए थे।सो अंगरेज ने उन्हें जेल में बन्द कर दिया था। वे स्वतंत्रता संग्रामी हैं।" मुझे तब समझ में आया कि जेल सिर्फ अपराधियों के लिए नहीं होती। देश की आज़ादी के लिए लड़ने वाले लोग भी जेल जाते हैं और समाज उन्हें बहुत अच्छा मानता है। उस दिन मुझे पहली बार समझ में आया कि स्वतंत्रता सेनानी का मतलब क्या होता है।आज सोचता हूँ कि एक बच्चा अपने समय की कितनी बड़ी घटनाओं को कितना सीमित रूप में समझ पाता है। इतिहास उसके सामने घट रहा होता है,पर उसकी समझ और अनुभव अभी वहाँ तक पहुँचे नहीं होते। अगर वे हमारे जीजा कहीं हों और मेरी उस बाल धारणा को सुन रहे हों,तो वे अवश्य मुझे क्षमा करेंगे।मैं बच्चा था; मैं क्या जानता कि जेल जाना कभी-कभी गौरव की भी बात हो सकती है।
   आज न जाने क्यों भागलपुर फिर याद आ गया। वहाँ की और भी अनेक स्मृतियाँ हैं,अनेक बाल मित्र हैं जो बार-बार याद आते हैं। कई बार लिखने का मन होता है,परअवसर या मनःस्थिति साथ नहीं देती। आज लगा कि कहीं न कहीं से शुरुआत तो करनी ही चाहिए…। और एक बात कुछ दिन पहले भी मैंने भागलपुर पर काफी कुछ बोल कर टाईप करबाया था एआई से। पर उसे सुरक्षित करने की विधि मुझे नहीं मालूम थी।सो नहीं सुरक्षित कर सके…।
   तब के अपने परम दोस्त सहपाठी का मन रखने के लिए जोखिम उठा कर चल रहे क्लास के बीच ही मुझसे क्या हुआ था कि पढ़ा रहे गया बाबू सर ने भरे क्लास मुझे अजीब-सी ही नई -
नई सज़ा दी थी…
बाल मित्र पंडित जी को याद भी होगा कि उसकी ख़ुशी के लिए मैंने जैसी सज़ा पाई कि महीनों दोस्त लोग मुझ चिढ़ाते रहे….😅।
अब सोचता हूंं कभी मिले तो अपने उस बाल सखा अब बड़े चित्रकार पंडित जी से पूछूँ-
‘भले आदमी तुम्हें याद भी है तुम्हारे कारण मुझे मिली वह सज़ा ?’
  
साल दो साल पहले तक मित्र डॉ रणजीत साहा जी रतन मोहन के बारे में बताया करते थे।वह भी संपर्क में नहीं के बराबर हैं।
    पिछ्ले दिनों भागलपुरी प्रिय अनुज मित्र रंजन कुमार से यह जान कर बहुत तसल्ली हुई कि पंडित जी स्वस्थ सानन्द हैं और बरारी के मेरे प्रिय जनार्दन जी सर्राफ उर्फ जन्नू भी ! ख़ुश रहो साथियो !
   काश !
   अब एक बार कभी भागलपुर जाता... !
                            ▪️
                       गंगेश गुंजन                                                 #उचितवक्ताडेस्क। 

Sunday, July 19, 2026

शे'रनुमा : सारे गीत लिखे जा चुकते हैं...

   सारे गीत लिखे जा चुकते हैं जीवन के,             अन्तिम प्रेमगीत बच ही जाता है लिखना..                                         🌱

                       गंगेश गुंजन.                                                 #उचितवक्ताडेस्क.

Thursday, July 9, 2026

अब का पटना

🌐                        अब का पटना !
                                     🕸️                     
कदम कुआँ पटना में ऐन निताई कैफ़े और उसके बायें पेट्रोल पंप के सामने कदम कुआँ पटना में एक धर्मशाला हुआ करती थी जिसका नाम ‘दैवज्ञ धर्मशाला’ था।अब कोई कह सकेगा उसके बारे में ?
   भैया के साथ राँची जाने के रास्ते में हम सब पहली बार पटना की इसी धर्मशाला में रात भर के लिए ठहरे थे। दूसरी सुबह गांँधी मैदान से बस में राँची गये थे।सन् १९५४-५५ ई.का तो रहा ही होगा…जहांँ तक याद है बिहार राज्य पथ परिवहन की बस सेवा तभी अस्तित्व में थी…
                           •
                  गंगेश गुंजन

              #उचितवक्ताडेस्क.

मैं,वही सौतार !

.                  मैं,वही सौतार !
                             •
भागलपुर में बचपन बीता।आनन्द गढ़ और बरारी की बंगला कोठी में,बारी बारी से।आनन्दगढ़ के बागीचे ही बागीचे थे। बरारी हाई स्कूल जाने के रास्ते में भी। जिन पर बन्दरों का उपद्रव मचा रहता। दोनों प्रकार के के बन्दर। एक तो असली बन्दर और दूसरे हम कुछ बालबृन्द बन्दर 😃! सो आम के मौसम आते ही बागीचों की रखवाली के लिए तीर-धनुषधारी संताल युवक रखे जाते थे। हम उन्हें 'सौतार' कहते थे।हमलोग एक तो आनन्दगढ़ का होने के कारण और दूसरे उन भाइयों से दोस्ती कर लेते थे और इतनी कि कभी-कभी वे हमें तीर धनुष भी बना कर देते जिन्हें घर में रखना भी छुपा कर ही पड़ता भैया के डर से। अक्सर रातों मे जब वे बाँसुरी टेरते तब का समां का अनुमान ही किया जा सकता है। वैसे मैं आज भी इस घड़ी महसूस कर पा रहा हूंँ। ऐसे होते थे वे। हम बालक तो कल्पना किया करते कि ‘हम भी सौतार होते !’
   आज शब्दकोश में इनके लिए 'संताल' मिलता है,पर मेरी स्मृति आज भी सौतार' ही कहती है। मुझे तो कभी-कभी यह भी लगता है, जैसे अभी ही कि,भाषा का सबसे ज़िन्दा प्रामाणिक शब्द प्रायः वही होता है,जिसे शब्दकोश उतना नहीं नहीं जितना स्मृतियाँ,ख़ासकर हमारा बचपन’ सँजोकर रखता है।
  आज जाने कहांँ से कैसे सुबह-सुबह ‘सौतार’ की याद आई।और यह भी कि मैं भी वही ‘सौतार’ हूँ ! याद आया तो मैंने मैथिली में लिखा भी-
‘प्रचण्ड रौद मे कोनो 
गाछ तर ओठङ्गि क’ बैसल
तीर-धनुष लेने कलम ओगरैत-
                     सौतार छी हम !’

किंतु तब इतने दिनों बाद संदेह हुआ कि मैं शब्द का सही प्रयोग कर भी रहा हूंँ या इसमें कोई भूल है ? बहुत देर तक फिर से याद करता रहा और फिर से मन भी मान जाता रहा कि हां यह ठीक है। फिर भी मन नहीं माना तो सुनिश्चित करने के लिए मुझे अपने अनुज मित्र रंजन कुमार लेखक और भागलपुर के प्रसिद्ध चित्रशाला के मालिक और वर्तमान भागलपुरी साहित्यिक सरगर्मियों के जंक्शन ! ) याद प्रो०लखन लाल सिंह आरोही जी (अंगिका भाषाविद /आंदोलन के कर्मठ विद्वान)मेरे स्नेही भी बन्धु। फोन रंजन को ही किया और ज़ाहिर है बहुत ख़ुशी हुई। बहुत दिनों पर बातचीत हो रही थी तो कितनी बातें निकलीं। लेकिन संदर्भ मैंने जो बताया यह सौतार शब्द प्रयोग के केंद्र में ही।लेखक रंजन जी अंगिका के कर्मठ शब्दमर्मी हैं। 
   बहुत दिनों के बाद बरारी के अपने बाल-मित्र पंडित जी यानी रत्नमोहन ठाकुर और जनार्दन जी सर्राफ (जन्नू )के भावुक कर देने वाले चर्चे देर तक चलते रहे …
      ख़ुश रहो कलाकार -रंजन कुमार!
                       ▪️
                 गंगेश गुंजन                                       #उचितवक्ताडे.
           (फेसबुक ब्लाग पर।)