तर्कीली तुक का तो मैं भी क़ायल हूँ, काठ-कसैली तुक से घायल हो जाता हूँ !
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ता.
तर्कीली तुक का तो मैं भी क़ायल हूँ, काठ-कसैली तुक से घायल हो जाता हूँ !
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ता.
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मंत्रमुग्ध होना चाहे
जी उससे मिलना चाहे।
कली मुन्तज़िर है किसके
अधरों पर खिलना चाहे
किससे मिले हुई मुद्दत
किससे दिल मिलना चाहे
वक़्त शिकंजा कसता है
ज़ीस्त नहीं उठना चाहे
एक बराबर ख़िजाँ बहार
खिलना - मुरझाना चाहे
ख़त भर के हर्फ़-ए-मायूस
दफ़्न छुपा रहना चाहे
जवांँ सियासी हल्क़ों में
जानें क्या घटना चाहे
चश्मे नम वक़्त-ए-रुख़्सत
हसरत यह रहना चाहे
🌼
गंगेश गुंजन
#उवडे.
▪️
१.
पेट खाली हो मगर सीधी रहती है रीढ़
तने ज़मीर सीधा देखते हैं वो जो फ़क़ीर।
२.
बड़े मज़े की लड़ाई थी
दोस्ती पर आ के ख़त्म हुई।
३.
ख़ामुशी की जु़बाँ में उस क़िस्सए ग़म का बयान
चश्म-ए-नम भी बज़्म में देखा है कल रक़ीब को।
🌼 गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडे.
उम्मीद तो जी भर रक्खें कोई हर्ज नहीं,मगर यह ध्यान भी कि हौसले से बाहर न जायंँ.
💢 गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडे.
✨। कल शिक्षक दिवस था...
यह बड़ा दिलचस्प है कि शिक्षक दिवस पर सबसे पहले हमें अपनी प्राथमिक कक्षाओं के गुरु जी लोग ही याद आते हैं।जैसे मुझे अपने बरारी हाई स्कूल के भगवान बाबू सर, (गणित), गया बाबू सर (साहित्य और भूगोल) और बनर्जी सर (सामान्य स्वास्थ्य विज्ञान) और इन सबको मिला कर अकेले सर्वज्ञ मेरे गाँव में प्राइमरी स्कूल के मास्साहेब -बुध नारायण बाबू (सभी विषयों के गुरु जी)-श्री बुद्धि नारायण झा मास्साहैब।
उससे भी और रोचक तो यह अनुभव है कि इन श्रद्धा सुमन स्मरण से मैंने जो ये गुरुनाम लिखे हैं,सब के सब प्रायः निर्दय और डरावने ही थे ! लेकिन आश्चर्य कि आज अब वे सभी हृदय से श्रद्धेय और प्रणम्य होकर याद आते हैं.मन ही मन उनके पैरों को छू कर प्रणाम करता हूँ !
💐💐💐💐💐
गंगेश गुंजन #उचितवक्ता.
।कृष्णाष्टमी।
उस सीधी,सरल सन् १९५७ ई.में कहांँ मालूम था कि हमें २०२६ की ऐसीअशान्त कुरूप ईस्वी भी देखनी है..
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडे.
- विडंबना -
मनुष्य को यह जीवन मिलता तो है एक
अनमोल वरदान की तरह लेकिन ऐसे जैसे किसी
शिशु के नन्हे हाथों में धर्मग्रंथ या गीता-ज्ञान की
पुस्तक के समान ।
.📕. गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क