निरे बकवास को भी मूल्यवान विचार मान कर 'वाह-वाह' करने का यह फेसबुकिया बुद्धिजीवी-काल भी,कमाल है !
🌐 गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडे.
निरे बकवास को भी मूल्यवान विचार मान कर 'वाह-वाह' करने का यह फेसबुकिया बुद्धिजीवी-काल भी,कमाल है !
🌐 गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडे.
🌼 ‘साहित्य का वानप्रस्थ’
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साहित्य का भी वानप्रस्थ होता है।इसका अपना ही द्वन्द्वात्मक भौतिकतावाद है। रोज़ाना दुनियावी घटना-परिघटनाओं से सूचना वंचित इसकी चिन्ताएँ एवं अशान्तियाँ भी अलग हैं।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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रचनाकार की यह ख्व़ाहिश होती ही है कि उसका लिखा पढ़ते हुए पाठक को कोई और याद नहीं आए यहांँ तक कि कबीर और निराला भी। और जो याद आए ही तो फिर यूंँ आए जैसे वह,किसी बहुत परिचित सफ़र के पुराने पड़ाव से आगे चला जा रहा है। ▪️
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क.