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आभासी संसार में 'नूतन आत्मरति'।
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कृपया कहें तो -
फेसबुक आदि पर स्त्री-पुरुष जो भी हों,अगर बार-बार अपनी ही फ़ोटुओं को रस ले-ले कर डालें और लिखते रहें तो इसे एक प्रकार की 'नूतन 'आत्मरति' क्यों न समझा जा सकता है ?
आप क्या सोचते हैं लोगो ?
✨ गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क जिज्ञासा !
Saturday, September 19, 2026
आभासी संसार की नूतन आत्मरति
Friday, September 18, 2026
हिन्दी आवेश बनाम मैथिली आवेश
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हमारी हिंदी कहती है :
‘आवेश’ में आकर मनुष्य को कोई क़दम नहीं उठाना चाहिए।’
किन्तु मेरी मैथिली तो कहती है :
पहिले डेग उठैत छै मनुखक प्रेमक ककरो 'आवेशे' मे। (अर्थात, प्रेम का पहला क़दम ही मनुष्य का किसीआवेश में ही उठता है 😆)। 📕| गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
Wednesday, September 16, 2026
अस्पताल में मरीज का गाना
इन दिनों फेसबुकादि पर मेरी सक्रियता यूँ समझें कि सरकारी अस्पताल में भर्ती कोई मरीज़ गाना गा रहा है !
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गंगेश गुंजन. #उचितवक्ताडेस्क।
शेरनुमा : हम तो समझे डूब कर माज़ी में कबके
हम तो समझे डूब कर माज़ी में कब के मर चुके,
कौन है फिर जी रहा है मज़े से इस जिस्म में। 🍁
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडे
Sunday, September 13, 2026
हिन्दी दिवस !
Wednesday, September 9, 2026
शेर नुमा : तर्कीली तुक का तो मैं भी क़ायल हूं
तर्कीली तुक का तो मैं भी क़ायल हूँ, काठ-कसैली तुक से घायल हो जाता हूँ !
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ता.
ग़ज़लनुमा। : मंत्रमुग्ध होना चाहे
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मंत्रमुग्ध होना चाहे
जी उससे मिलना चाहे।
कली मुन्तज़िर है किसके
अधरों पर खिलना चाहे
किससे मिले हुई मुद्दत
किससे दिल मिलना चाहे
वक़्त शिकंजा कसता है
ज़ीस्त नहीं उठना चाहे
एक बराबर ख़िजाँ बहार
खिलना - मुरझाना चाहे
ख़त भर के हर्फ़-ए-मायूस
दफ़्न छुपा रहना चाहे
जवांँ सियासी हल्क़ों में
जानें क्या घटना चाहे
चश्मे नम वक़्त-ए-रुख़्सत
हसरत यह रहना चाहे
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गंगेश गुंजन
#उवडे.
