Wednesday, April 22, 2026

बादल चन्द्रमा और प्रेम !

।।  बादल चन्द्रमा और प्रेम ।।

कहते हैं प्रेम भी ब्रम्हाण्ड में अनन्त काल से एक बिछड़े नक्षत्र के समान एकाकी भटक रहा था। एक दिन तपती धूप में जब वह बहुत झुलसने लगा तो उसी के समान बेचैन बनकर अंतरिक्ष में भटक रहे बादल को इस कोमल नक्षत्र पर करुणा आ गई और उसने उसे अपनी छांह में ले लिया।प्रेम कुम्हला चुका था। अब बादल की छांव में आकर उसे हल्की-हल्की वायु का झोंका लगा तो फिर खिल उठा।और बादल को आभार प्रकट करने लगा तो बदले में बादल उदास होकर बोला कि बल्कि कृतज्ञ तो मुझे होना चाहिए तुम्हारा। क्या अनुभव है कि जाने कब से मैं भी इसी प्रकार भटक रहा हूं लेकिन यह शीतलता ऐसा आनन्द कभी नहीं हुआ जैसा तुमको अपने संग लेने के बाद हो रहा है। अब तो तुम्हें छोड़ने का मेरा भी मन बिल्कुल नहीं है। लेकिन क्या करूं ? दु:ख है मित्र ,अब इससे अधिक मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकता। सूरज मुझे ही कहां बख़्शता है। हवा के साथ कभी भी मुझे उड़ा कर कहीं किसी और अनन्त में भेज देगा। सो मैं इसी चिंता में हूं कि तुम जैसे दिव्य सुन्दर और कोमल की रक्षा नहीं कर पा रहा। तुम तुरत जन्मे शिशु के समान इतने कोमल और ईश्वर के समान सुन्दर हो लेकिन अपनी रक्षा के लिए तो तुम्हारे पास एक छोटा छाता भी नहीं है। ऐसे तो जीवन भर तुम झुलसते रहोगे या भीगते ही रहोगे। क्या करूं मैं? अब इस हाल में तुम्हें अकेला कैसे छोड़ूं ? सोच-सोच कर बादल बेहद परेशान था। अपने लिए प्रेम ने उसकी यह चिंता जो देखी तो वह भी उसे चिंता नहीं करने के लिए उसी भावना में बोला- 
-मेरा क्या मित्र। मैं तो यों ही आवारा फिरने को ही बना हूं। मुझे जहां-तहां रह जाना भी तो पसन्द नहीं आता। क्या करूं अपने ही स्वभाव का शाप लेकर आया हूं। तुम मुझे कितना बचाओगे ? चलते-चलते तुम्हारी तरह ही एक बार छल नाम का कोई मिला तो अपने साथ अपने घर ले गया।और उसने बड़े यतन से अपने पास ठहरा लिया। मुझ पर बहुत ध्यान देकर रख रहा था वह। लेकिन मैं ही हर पल जाने कैसी एक अजीव सी बेकली से दबा हुआ अनुभव करता और अचानक ही आंखों से कुछ दिखाई नहीं पड़ने लगा तो सोच में पड़ गया। मैंने सोचा इस तरह तो मैं अंधा हो जाऊंगा।मैंने उसे समझाया कि वह इस तरह किसी को भरमाने की,धोखा देने की आदत छोड़ दे तो मैं यहां रह जाऊंगा। लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ। 
मैं वहां से भाग आया। उसी परेशानी में तुम मिल गये हो। सो इतना बहुत है। फिर मिलेंगे कभी। तुम मेरी चिन्ता मत करो। अपनी सुविधा से मुझे गोद से कहीं भी उतार दो ! वज़न‌ भी तो कम नहीं है न मेरा। तुम थक भी तो गये होगे।' प्रेम ने यह जो कहा तो बादल बिजलियों में अट्टहास करता हुआ कौंधा। मीठा-मीठा गरजा और उल्लास में बोला : 
-अरे कुछ नहीं यार ! अब हमारी यह दोस्ती कभी खत्म होने वाली नहीं है। '
-अर्थात्?' प्रेम ने बहुत उत्सुक होकर पूछा तो बादल बोला-
-ऐसा करते हैं,मेरी एक सखि है-चन्द्रमा।मैं तुम्हें उसके पास रख देता हूं।वहां तुम जीवन भर बड़े चैन से रह पाओगे।उसका स्वभाव तुम्हरी तरह कोमल और मीठा है। वह तुम्हें बहुत मानेगी। सूरज तो फिर से ढूंढ़ेगा ही तुमको। सखि चन्द्रमा तुम्हें छुपा कर उस दुष्ट से बचाये रखेगी। और मेरा भी मन निश्चिंत रहेगा कि इतने प्यारे दोस्त को एक अच्छी जगह पर,उसके मन लायक घर में रख कर आया हूं। छल के साथ रहने के अनुभव से प्रेम का मन तो घोर घोर था। सो उसने अपनी असहमति जताई तो सयाना बादल मुस्कुराया और बोला- 'तू छल के अनुभव से डरा हुआ लगता है। लेकिन फिर कहीं तो विश्वास करना पड़ता है ना यार। तू एक पल चांद में बैठ कर तो देख। तू मुझे भी न भूल जाय तो कहना।'  उसके कहने में ऐसी सच्चाई लगी कि प्रेम को भरोसा हो गया।तब चलते-चलते बादल ने प्रेम को एक जगह टिकाया।वह जगह चांद थी।प्रेम को  चांद पर उतारते हुए उसने बड़े अपनापे से चांद से कहा-'सखि, तुम इसे रखो। तुम्हारे पास यह मेरी थाती है। तुम्हारे पास रखता हूं। इसे स्नेह और यतन से रखना।और हां इसके लिए मुझसे छल मत करना कभी, बता देता हूं,बादल ने हंसते-हंसते मज़ाक किया।
चांद ने प्रेम को जो देखा तो सुध-बुध ही खो बैठी।बिना किसी प्रश्न के उसने उल्लास से सब तरफ अपनी अनगिन सुनहरी बांहें पसार दीं‌ जो कि हंसती हुई दिव्य चांदनी बन कर चारो दिशाओं में फैल गई।आग्रह से कहा- ‘आओ,मित्र बैठो !'
लेकिन बादल तो जाने को उतावला तैरता रहा। यह देख कर प्रेम हैरानी से पूछने लगा- 
‘किन्तु तुम कहां जा रहे हो ?' इस पर बादल उदास हो गया। और बिहंस कर बोला-
‘नहीं मित्र।सखि से मेरा इतना ही वायदा था कि एक न एक दिन लाकर उसे प्रेम सौंपूंगा। सो आज मैंने अपना वह वचन पूरा कर लिया है!' यह सुनते ही प्रेम तो घबड़ा गया। बोल पड़ा :
‘लेकिन यह तो तुमने भी मुझसे छल किया है ?' प्रेम स्नेह के रोष में बोला तो, बादल बड़े सहज भाव से बिहंसने लगा और बोला:
‘दोस्ती में इतना-सा छल तो एकदम जायज़‌ है मित्र।' बहुत ममता से मुस्कुरा कर बादल ने जवाब दिया।चांँद उदास हो गया।बादल से दोस्ती के कृतज्ञ भाव में चुपचाप था।तब एकाएक उसने फिर सवाल किया: 
‘अरे मगर मैं जिस स्थान को जानता भी नहीं।जिससे कोई परिचय नहीं।मुझे यहां पर छोड़ कर चले जाना तो सरासर अन्याय है तेरा। तू छोड़ कर चला गया तो मैं और बेसहारा हो गया ना?' प्रेम रुआंसा होकर बोला।
'एक मुश्किल भी तो है दोस्त ! मैं अगर यहां रहता भी हूं तो बाधा ही बना रहूंगा। तनिक ही देर में कहीं तुम दोनों भी मुझसे उकताने ही लग जाओ। इसलिए पूरा तो नहीं, छुप-छुप कर कभी-कभार हम तीनों दोस्तों की आंँख- मिचौली भी चलती रहेगी। मगर हां,रोज-रोज की तरह नहीं,पर्व-त्योहार की तरह।अलविदा सखि चांद और दोस्त प्रेम!' कहकर बादल आकाश में यों तैरने लगा जैसे तालाब में मछलियां तैरती हों !
  इधर बादल से बिछुड़ कर प्रेम एक दो दिन तो चंचल रहा।लेकिन जल्दी ही अपने लिए चांँद का लगाव देख कर प्रेम, चन्द्रमा में चित्त लगा कर रहने लगा। रहते-रहते,बहुत दिन रह गया। तब एक दिन अकस्मात प्रेम उदास हूआ। फिर उदास ही रहने लगा। धीरे-धीरे और भी उदास रहने लगा। जैसे यहां अब उसका दिल नहीं लग रहा हो। इस तरह लगातार उदास देख कर एक दिन चन्द्रमा को प्रेम की ममता में चिंता होने लगी। तब इसका कारण जानने  की उत्सुकता हो आई। इस प्रकार समझते समझते उसने प्रेम का मन जान ही लिया। तब एक दिन उससे पूछ बैठी- 
'यहां तुम्हारा मन नहीं लग रहा है ना ? मैं समझ गयी हूं।' वह मुस्कुरायी और प्रेम का सिर सहलाने लगी। फिर बोली-
मुझे यह अंदेशा था। तुम यहां भी बेचैन ही हो जाओगे। सो मैं तुम्हारा कोई उचित और अच्छे ठिकाने ‌की खोज में लगातार लगी हुई भी रही। कि तभी एक  बार मुझे पृथ्वी की याद आयी।अभी पिछली रात तुम सो रहे थे तो मैं वहां उतरी तो भी लोगों को कछमछ करते पाया। सब तरफ़ अशांति। कहीं शान्ति नहीं। सब बेचैन।मैंने पूछा तो बोली :
'यहां कुछ ऐसी कमी तो ज़रूर है कि सब कुछ होकर भी कुछ खालीपन और उदासी छायी रहती है।जाने वह कैसा अभाव है कि दिन-रात हम अपने आप को महज़ चलती-फिरती बेजान पुतलियां भर महसूस करते रहते हैं…'
तभी मेरे मस्तिष्क में तुम्हारा ध्यान कौंध गया और लगा कि मुझे पाने के लिए,मेरे पास आने के लिए संसार जान दिए रहता है और तुम उसके पास रहकर भी अकेले और उदास पड़ गये हो। क्योंकि मैं चांद भी हूं तो क्या हूं? हूं तो अकेली ! सो तुम्हारा जी उदास रहने लगा है। तुम्हें कोई और बहुत- बहुत जगह और हृदय चाहिए। वैसी जगह मिले तो कहां मिले ! तभी मुझे सूझा कि एक मात्र जगह धरती ही है जहां अनगिनत आदमी,प्राणि और जीव जन्तु निवास करते हैं। मगर नीरस जीवन जीते रहते हैं। सो सबसे उचित और रहने लायक स्थान तो पृथ्वी है तुम्हारे लिए। इसी लिए ‌उस दिन मैं तुम्हें भी अपने साथ धरती पर घुमाने ले गयी थी कि तुम्हारा मन बहल जाएगा। लेकिन वहां जाकर जो तुम्हारा रूप देखा तो तुम्हारा मन पूरी तरह समझ में आने लगा।वहां जाते ही जिस तरह तुमने रोते बच्चे को गोद में उठा लिया और उसे चुप करा दिया,उदास मां स्त्री को दु:ख पूछा और ढाढ़स दी फिर अकेले जाते हुए उस पुरुष को टोका कि इतनी रात को अकेले कहां जा रहो हो? तो मैं कुछ कुछ क्या, पूरा ही तुम्हें समझने भी लगी। 
लौटकर आये तो वहां अपने लोक में तुम्हें और भी अधिक बेचैन देखने लगी। सो मेरा भी मन विचलित हो गया और तुमसे पूछा तो हिचकिचाहट से भी लेकिन तुमने सिर झुका कर मान लिया तो मैं ने तुम्हें अपनी किरण पर बिठा ले जाकर पृथ्वी पर उतार दिया।लोग कहते हैं कि अकस्मात पूरे वातावरण में एक अलौकिक सुगंधि फैल गयी। कुछ अनजानी आवाज़ गूंजने लगी।पशु-पक्षी तक चांदनी को भोर मान कर चहकने लगे थे…!यह कैसा आनन्द था जिस पर क़ब्ज़ा किये मैं बैठ गया था। मुझे अपने आप पर क्रोध भी आया। सो एक रात तो मैं पृथ्वी को वचन ही दे आया कि उसकी ख़ुशी के लिए यह त्याग करना मेरा कर्त्तव्य है। मैं जानती थी तुम इसे मेरे प्रति अपना छल मान कर हिचकिचाओगे।लेकिन बेकार। इस हिसाब से छल तो तुम से मैंने किया कि बिना तुम्हारी इच्छा जाने एक बारगी धरती को वचन ही दे डाला कि तुम्हें उसके पास भेज दूंगी।सो पृथ्वी को दिया अपना वचन पूरा कर सकी इसलिए प्रेम मैं जबतक रहूंगी मैं तुम्हारी कृतज्ञ ही रहूंगी।सच पूछो तो छल तो मैंने किया तुम्हारे साथ प्रेम।लेकिन क्या करें, दोस्ती में इतना छल तो माफ़ है। चांद करुणा से मुस्कुराया और आंख भर प्रेमको देखा। प्रेम की आंखें झुकी हुई थीं और जरूर ही कोर भींगे हुए।

कहते हैं कि तभी से सृष्टि में चांद,बादल और प्रेम की यह दोस्ती चल रही है।तीनों को श्राप है कि साथ-साथ नहीं रह सकते जबकि एक दूजे के लिए तीनों तड़पते रहेंगे। आकाश में बादल,अंतरिक्ष में चांद और पृथ्वी पर प्रेम! 
                          ०
इधर सुनते हैं कि ज्ञान विज्ञानी लोग इसे प्रकृति का विधान और सृष्टि चक्र कह रहे हैं। दीवाने हैं !
                        🌸
                 -गंगेश गुंजन,०१.६.'२०.
                #उचितवक्ताडेस्क।

दो पंक्तियां : प्यार और आदर

प्यास तो प्यार से ही बुझती है आदमी की
आदर सम्मान से उसका अहं तृप्त होता है.
                    🌸🌼
                 गंगेश गुंजन 
            #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, April 20, 2026

टिप्पणी : ईमानदार बेईमान

एक अनुभवी ईमानदार राजनेता सौ शिक्षित बेइमान शासकों से श्रेष्ठ होता है।
                      📕 
                 गंगेश गुंजन 
                   #उवडे.

शेरनुमा। मृत्यु से डर-डर के हम

मृत्यु से डर-डर के हम जीते रहे मरते हुए
पास आने पे तो इक मासूम बच्ची थी खड़ी'
                      🕊️ 
               गंगेश गुंजन 
            ज्ञ #उचितवक्ताडे.

Sunday, April 19, 2026

ब्रह्मा,स्त्री- पुरुष

स्त्री ब्रह्मा का अनुरोध है और पुरुष उनका आदेश।
                        📕
                  गंगेश गुंजन                                         #उचितवक्ता.

टिप्पणी : राजनीति।

         राजनीति में खेद नहीं है !
                    🌛🌜 
                गंगेश गुंजन 
              #उचितवक्ता.

Thursday, April 16, 2026

दो पंतिया : दोस्ती है, दुश्मनी है...

 दोस्ती है दुश्मनी है इतना सारा क़रार है। 
आज सुबह मेज़ पर वक्त़ का अखबार है।
                    🪾🌐🪾 
                   गंगेश गुंजन
               #उचितवक्ताडेस्क.