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हमारी हिंदी कहती है :
‘आवेश’ में आकर मनुष्य को कोई क़दम नहीं उठाना चाहिए।’
किन्तु मेरी मैथिली तो कहती है :
पहिले डेग उठैत छै मनुखक प्रेमक ककरो 'आवेशे' मे। (अर्थात, प्रेम का पहला क़दम ही मनुष्य का किसीआवेश में ही उठता है 😆)। 📕| गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
