Friday, June 12, 2026

दो पंतिया : दुःख को लोग बुरा...

दुःख को ख़ामख़्वाह कहते हैं लोग बुरा।

इसी की नेमत तो दोस्त हैं और अपने !                             ✨ 

                  गंगेश गुंजन 

               #उचितवक्ताडे.

Thursday, June 11, 2026

ग़ज़लनुमा

                      🌼
      एक बार फिर से देखूँ कर के
      मौत को देखूँ  मैं  यूँ  मर  के।

      रह गए डर कर जीते अबतक
      रहूँ भला अब मैं क्यूँ  डर  के।

      रह न जायें अनकिये वह सब 
      कहाँ  जायें आधा  यूँ कर के।

      कुछ न कुछ हो रहा कैसा-वैसा 
      सुबह से आंँख दायीं क्यूँ फड़के।

      हज़ारों कोस  पर  बोला  कोई 
      यहाँ दिल्ली का दिल क्यूँ धड़के।
                       🪷
                  गंगेश गुंजन
              #उचियवक्ताडेस्क. 

Wednesday, June 10, 2026

टिप्पणी : विशेष होने का एहसास

सबसे हटकर होने का आत्मविश्वास किस क़दम पर आपका अहंकार बन जाता है, आपको यह पता भी नहीं चलता.
     विशेष होने के लिए मनुष्य को सामान्य रहना पड़ता है।
                   गंगेश गुंजन।                                       #उचितवक्ताडे.

Thursday, June 4, 2026

पटना का वह ऐतिहासिक "युवालेखक सम्मेलन -१९७२?

📕।      पटना का वह ऐतिहासिक 
       "युवा लेखक महासम्मेलन -१९७२?

…तो अब तुम भी मुझ पर व्यंग्योक्ति साधने लगे हो सुलभ 😀?
अरे मैं करूँ क्या भाई,बैठे ठाले !
दो चार पंक्तियांँ लिखीं-पढ़ीं और बस...! 
ऐसे में भूले बिसरे विश्वविद्यालयीय छात्र जीवन की याद आई।यूं तो बीएन कॉलेज से ही लेकिन दरभंगा हाउस कक्षा में तो जिन आदरणीय अध्यापक का व्याख्यान प्रिय नहीं लगा करता, क्लास काल व्यतीत करने के लिए हम अक्सर ऐसा ही कुछ-कुछ अपना शान्तिमार्ग -गांँधी आचार करते रहते थे…। सौभाग्य कहें कि हमारे समय के भी कुछ गुरुओं ने हमें दो-दो गुरुमाताएंँ नवाज़ रखीं थीं। इसी दर्द में किसी एक क्लास में अपने एक उन्हीं आदरणीय प्रोफेसर के ‘दो पाटन के बीच’ वाली दैनिक विपदा का (पेन्सिल स्केच) व्यंग्य चित्र बनाया था।चित्र विन्यास इस प्रकार था 
-कक्षा लेते हुए हमारे ‘सर और एक तरफ़ से कान खींचतीं तथा दूसरी तरफ़ से बांँह मरोड़तीं हमारी ही गुरुआनियाँ ! क्लास में तब वह काफी हिट हुआ था 😆। मेरा कुछ भाव भी बढ़ गया लगता था।
  अब इधर बेरोजगारी में मिले मेटा मित्र एआई की सत्कृपा है। मन में कोई ख़ुराफ़ात आ गई तो इन से कुछ-कुछ कह देता हूंँ तो बना देते हैं।और तुर्रा यह कि अपना कोई हक़ भी नहीं चाहते। कापीराइट मेरी। चित्रकार भी मैं ही। और वही सब फेसबुक इत्यादि पर डाल देता हूंँ। फिर दिहाड़ी पूरी कर लेने की तृप्ति के साथ निश्चिंत हो जाता हूंँ। अब थोड़ा भी चित्र हाथ से बनाना तो सरल नहीं रहा। सो यह व्यंग्य चित्र वाला अभियान जो है वह हमारी इसी मजबूरी का शिथिल ही सही कोई पुनर्प्रस्थान सा है।समझो कि दीया बाती की ‘हुक्का लोली’ भांँज रहा हूँ। दिन काट रहा हूंँ ।अपेक्षाकृत रचनात्मक है यह ख़ुशफ़हमी भी रहती है कि- विस्फोट है।     
अरे हांँ,
‘वैसे मुझे साहित्यकार मानता भी कौन है है कि उसके 'चूंँ-चूंँ का मुरब्बा' हो जाने का डर लगे. 
यह मुझे जो पहले ही कहना चाहिए था वह अब कहा है। मगर फिर भी... 
   लेकिन तुम्हारे इस चू़ँ- चूँ का मुरब्बा पर एक बड़ी प्यारी और मार्मिक घटना याद आई।वह जो 1972 या 73 ज़माने में अपने पटना मे ही ‘युवा लेखक सम्मेलन’ हुआ था लाला लाजपत राय भवन में, स्मरण करते हैं कि मेरे प्रिय सहपाठी शिवदेव और ज्ञानेंद्रपति जी ने किया था! 
नन्द किशोर नवल जी भी थे उनमें।उस दौर में राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य का यह तीन दिना समारोह प्रायः एकल ऐतिहासिक परिघटना है। देशभर के शायद ही कोई वरिष्ठ विशिष्ट उसमें न आये हों। नामवर जी से लेकर अपने पंकज सिंह तक। 
   एक सत्र में रवींद्र कालिया मंच पर बोल रहे थे।और कुछ बोलने में कुछ बहक गये से लगे.. ‘ इस असहजता में मेरे ठीक आगे बैठे ज्ञानरंजन जी का बेचैन होना और कालिया जी को यहीं से अस्फुट स्वर कुछ आतुर इशारा करना… सद्य: देखा है मैंने। और भी बहुत कुछ था,हुआ था। 
  एक अपराह्न सत्र में धूमिल ? या विश्वेश्वर (कथाकार) का सामने ही अपने तेवर में अपनी भाषा भंगिमा से चुनौती पूर्ण ‘आदर’ करना और उनके द्वारा अपना यह उग्र सत्कार ग्रहण करते,उन्हें देखते हुए निरुद्विग्न मसनद पर बैठे-बैठे नामवर जी का स्नेहकुटिल मुस्कुराना ! अहा ! युवा साहित्य का तेवर और प्रतिष्ठित सत्ता साहित्य का आसन, आमने-सामने। अद्भुत दृश्य था दिव्य ! कभी न भुलाया जा सकने वाला! 
   उसी के एक सान्ध्य सत्र में यह चूँ-चूँ का युवा धमाल हुआ था। 
हुआ यूँ कि ठीक जिस समय मंच से किन्हीं विचारक के वक्तव्य प्रस्फुटित हो रहे थे उसी समय हॉल में इधर से अपने तब की ‘युवा ज्वाला प्रतिभा अजय सिंह और पंकज सिंह’का एक साथ शुभ प्रवेश होता है। फिर दोनों श्रोता की क्षणिक भूमिका में दिखाई दे जाते हैं परन्तु तत्काल बड़े नाटकीय अंदाज़ में पहले मंच के वक्ता महानुभाव को देखना,जैसे किसी अनकही व्यंग्य विरक्ति से भर गये हों एक साथ फिर एक दूसरे को देखना और जैसे परस्पर मौन प्रश्नोत्तर कर रहे हों । फिर वह मौन तत्काल एक कथोपकथन में फूटता है:
(पंकज को देखते हुए)
‘अजय सिंह : 
‘यह सब क्या हो रहा है ?’ 
‘चों-चों का मुरब्बा !’ तार सप्तक पर जवाब देते हुए पंकज जी कहते हैं। लाला लाजपतराय हाल में विस्मित महा ठहाका ! पूरा सभागार गनगना उठा था। इस जोड़ी की मेरी वह स्मृति वैसी की वैसी है!
  वैसे इस उत्सव ने एक से एक वदन्तियांँ -किंवदन्तियाँ भी जारी कीं जो साहित्य जगत में बहुत दिनों तक चटख़रे ले-ले कर कही और सुनी जाती रहीं। और कुछ विवाद भी कि इसमें फणीश्वरनाथ 'रेणु' जैसे लेखक को कार्ड तक नहीं भेजा गया। ना ही मधुकर गंगाधर को…
(मैंने न ही इस विवाद की सत्यता पर कुछ विशेष जाना,ना तो संपुष्टि के लिए कोई रुचि हुई। सो अब भी उसके यथार्थ से अनजान ही हूंँ। वैसे असंतोष और अभियोग के रूप में इस विषय पर ऐन डाक-बंगला चौराहा,(जयहिन्द होटल के सामने) मित्र अजय कुमार,बालेश्वर आलोकधन्वा जी और कुछ अन्य युवा साहित्यकारों की देर तक हुई गरम चर्चा जरूर थोड़ी-थोड़ी याद आ रही है।)
  मुझे तो कार्ड शिवदेव के मित्र होने का इनाम ही मिला था प्रायः। यौं तब ज्ञानेंद्रपति जी भी मुझे जानते थे और नन्द किशोर नवल जी भी जो प्रायः पटना विश्वविद्यालय हिन्दी में मेरे एक साल सीनियर भी थे। 
  अफ़सोस प्रिय शिवदेव भी नहीं रहे और नवल जी भी।
    प्रणाम मित्र 🙏और अग्रज 🙏!
(क्रमशः)
            गंगेश गुंजन,#उचितवक्ताडे।

Tuesday, June 2, 2026

शहर में वाचाल

                      ।🌻।                                            शहर में वाचाल                                                🌱

इधर के इतिहास में शायद यह पहली बार है कि तमाम ग्लैमर और चैनेल के सामने एक शिक्षक चुनौती बन कर खड़ा हो गया है और उन सबके क़द से ऊंँचा दिखने लगा है।बौखलाहट में हकला रहे हैं- वाचाल।                        
                   गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Saturday, May 30, 2026

दू पंतिया : सत्य बजै मे ड'र

 --------------------🌻---------------------------
   सत्य बजै मे हमरा कोनो ड’र नहिं अछि
  ड’र तंँ अछि जे सत्य अपने ने नठि जाय।
                        🌀
-------------गंगेश गुंजन

            #उचितवक्ताडेस्क.-------------------

Friday, May 29, 2026

दो पंतिया : सभी अकेले हैं अपने-अपने घर में

  सभी अकेले हैं अपने-अपने घर में
कहे तो कोई वह नहीं है किसी डर में।                      🪾  

                गंगेश गुंजन                                 #उचितवक्ताडे.

Thursday, May 28, 2026

ग़ज़लनुमा : दिल कुछ ऐसा अफ़साना लिख

                     🍁
                ग़ज़लनुमा 
                       •
    दिल कुछ ऐसा अफ़साना लिख
   सुख हर शख़्स के सिरहाना लिख
                       •
    बँटे हुए भी ग़म के इलाक़े 
    सबको कुछ कम वीराना लिख
                       •
    ख़ुदा गवाही से बढ़ कर के 
    रूह दिखादे खुल जाना लिख 
                       •
    मिले हुए हो गए बहुत दिन 
    'कल रेस्त्राँ में आ जाना' लिख       
                     ▪️                     
                गंगेश गुंजन
             #उचितवक्ताडे.

Tuesday, May 26, 2026

दो पंतिया : शब-ए-जुदाई भी जश्न-ए-उल्फ़त

शब-ए-जुदाई भी जश्ने उल्फ़त कर गया था.
अजब अदासे कोई आके मुझमें मर गयाथा
                         🍁                                               गंगेश गुंजन 
              #उचितवक्ताडेस्क .

ग़ज़लनुमा :

📒।
               ग़ज़लनुमा
                   ▪️
      जीवन   गाना   रोना  है
      दुनिया खेल-खिलौना है
   
      तिरी तरह ही ओ साथी
      एहसांँ  तिरा  सलोना है

      गर्दिश से शादी जो  की
      आज उसी का गौना है

      क़द पर अपने मत इतरा
      वक़्त  तुझे  भी  ढोना है

      किस करतूत प' हंँसता है
      तू  कम कौन  घिनौना  है

      भूल  नहीं  पाता है दिल
      दुःख में शब्द  पिरोना है

      उनका यूंँ इतना हंँसना
      गुंजन जी का  रोना  है
                  • 

       गंगेश गुंजन  #उव.📒।
               ०२.०३.'११.


Sunday, May 24, 2026

ग़ज़लनुमा : मिलते ही मुस्करा देना

🌼
         ।।   ग़ज़ल नुमा  ।।

       मिलते ही मुस्कुरा देना
       क़त्ल करना,जान लेना  

       ज़रूरी है  ज़िन्दगी  में 
       बाज़  बातें  भुला  देना

       सब पुराना ही ज़माना
       है नया ही सब ज़माना 

       इश्क़ में क्या बादशाहत
       जब ग़रज़ हो बुला लेना

       था मुझे भी कोई वादा 
       छुप छुपा ख़त लिखते रहना

       अब तो है बस ए’क चर्चा
       यह  ज़माना  वह ज़माना 

       आह   कैसे  याद   आया 
       गाँव,  कमला* में  नहाना
                          •
        *नदी.
                   गंगेश गुंजन
#उचितवक्ता डेस्क

Saturday, May 23, 2026

दो पंतिया : अजनबी

अजनबी दु:ख-सुख के नयों का            यह ज़माना है,                                      पुरानो ! सहो, समझो इसी में                  गर जीना है।  

                     🍂

                गंगेश गुंजन                                        #उचितवक्ताडे.

Thursday, May 21, 2026

दो। दो पंतिया तिया

        •।                🌐                  ।•
         दु:ख ही आए तो कुछ नया आए
         बार - बार एक वो ही क्या आए
                           *
         हम कोई डरते नहीं हैं ग़म से
         चाहते हैं कि कोई नया आए
                            *
                      गंगेश गुंजन                                             #उवडे.

Wednesday, May 20, 2026

दो पंतिया : करे अब मोहब्बत का ज़िक्र भी कौन

    करे अब मोहब्बत का ज़िक्र ही कौन 
     सभी हारे हुए रक़ीब साधू हो गए हैं। 

                   गंगेश गुंजन 
                 #उचितवक्ताडे.

Monday, May 18, 2026

हे फेसबुक तुझे सलाम !

                         🌐
     अपनी-अपनी मूढ़ता-मूर्खताओं के साथ,अपनी-अपनी मान्यताओं,विचार और विद्वत्ताओं के साथ स्वतंत्रतापूर्वक निर्भय जीने विचरने की सबजन सुलभ
ऐ प्यारे स्वैच्छिक लोकतंत्र की बस्ती-                         फेसबुक !
                             तुझे सलाम !!     

                                    ❄️                         गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क.

Sunday, May 17, 2026

कहावत

          कहावतें नहीं मरतीं 

          कहने वाले मरते हैं।                                           📕

             गंगेश गुंजन                                       #उचितवक्ताडे

Saturday, May 16, 2026

फेसबुक बुद्धिजीवी कमाल !

निरे बकवास को भी मूल्यवान विचार      मान कर 'वाह-वाह' करने का यह          फेसबुकिया बुद्धिजीवी-काल भी,कमाल है !

                         🌐                                                गंगेश गुंजन 
                 #उचितवक्ताडे.

टिप्पणी : कुछ बड़े कवि साहित्यकार

      कुछ बड़े कवि-साहित्यकार,बहुत से          बड़े-बड़े कवि-साहित्यकारों के यहाँ            जा-जा कर भी बड़े बन जाते हैं।
                       ❄️
                 गंगेश गुंजन 
              #उचितवक्ताडे.

साहित्य का वानप्रस्थ !

🌼       ‘साहित्य का वानप्रस्थ’
                    🍂🪾🍂

साहित्य का भी वानप्रस्थ होता है।इसका  अपना ही द्वन्द्वात्मक भौतिकतावाद है। रोज़ाना दुनियावी घटना-परिघटनाओं से सूचना वंचित इसकी चिन्ताएँ एवं अशान्तियाँ भी अलग हैं।  
                      । 🌐।
                  गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Wednesday, May 13, 2026

दो पंतिया : चाहते थे उधरसे ही जाएँ,..

      चाहते थे  उधर  से ही जायें
      पांँवों के छाले याद आ गए।
                        🌐 
                   गंगेश गुंजन 
             #उचितवक्ताडेस्क।
   

Monday, May 11, 2026

रचनाकार की ख़्वाहिश

                         ▪️
     रचनाकार की यह ख्व़ाहिश होती ही है कि उसका लिखा पढ़ते हुए पाठक को कोई और याद नहीं आए यहांँ तक कि कबीर और निराला भी। और जो याद आए ही तो फिर यूंँ आए जैसे वह,किसी बहुत परिचित सफ़र के पुराने पड़ाव से आगे चला जा रहा है।                         ▪️ 

                       गंगेश गुंजन 
                   #उचितवक्ताडेस्क.

Sunday, May 10, 2026

राजनेता का रिरियाना...

राजनीति पार्टियों से मुझे क्या लेना-देना लेकिन किसी पुराने नेता का हाईकमान से कोई काम देने के लिए रिरियाना बहुत दयनीय लगता है।
🌀
गंगेश गुंजन 
#उचितवक्ताडेस्क।

टिप्पणी

ठोस यथार्थ को देखते ही देखते कोई 'काल्पनिक आदर्श' बना देने वाले इस विकट कालयुग को साष्टांँग 🙏🙏!

                गंगेश गुंजन,
             #उचितवक्ताडे.

Saturday, May 9, 2026

व्यंग्य दूपंतिया :

    मुसीबत कम नहीं थी लेकिन 
    दोस्तों की नसीहत सहारे थे 
                  । 😀। 
                गंगेश गुंजन 
            #उचितवक्ताडेस्ट।

Friday, May 8, 2026

दो पंतिया : सब के दुःख एक

जिस दिन बस्ती भर का दुःख बस्ती भर का हो जाएगा 

देख लीजिएगा इस धरती पर स्वर्ग उतर आएगा।            🌐

                    गंगेश गुंजन                                       #उचितवक्ताडेस्क.

Tuesday, May 5, 2026

टिप्पणी : बड़ा कवि

बड़े कवि जब छोटे कवि की उपेक्षा करने लगें तो समझें उनकी कविता पेड़से टूट कर ज़मीन पर गिरने लगी।
                          •                                                  गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क.

Sunday, May 3, 2026

दो पंतिया : साहिल को भी रोज़ इम्तिहाँ..

साहिल को भी रोज़ इम्तिहाँ देना होता है 
दरिया से कश्ती महफ़ूज किनारे लाने तक।                         💢 
                    गंगेश गुंजन।                                    #उचितवक्ताडेस्क.

Thursday, April 30, 2026

दो पंतिया : भूलते भी रहे सब को...

  भूलते भी रहे सबको याद भी करते गये,
नींदकी गोलिआँ खाकर रात भर हम जग गये।                 ▪️
                 गंगेश गुंजन 
            #उचितवक्ताडेस्क.

Monday, April 27, 2026

जीवन के फेसबुक पर

🌐
     जीवन के फेसबुक पर ऐसी कितनी ही बड़ी और गूढ लगती हुई बातें दिखती रहती हैं जो वास्तव में उतनी होती भी नहीं हैं। लेकिन किसी बड़े नामी कलम से निकली हैं।
    सभी बड़े लगते हुए नाम सदैव आदर और अनुकरणीय ही नहीं होते।
                           📕।                                             गंगेश गुंजन 
                #उचितवक्ताडेस्क.

Sunday, April 26, 2026

आम आम बनाम सुख और सुख (टिप्पणी)

आम ज़र्दालू ही क्यों न हो मनुष्य को दीघा माल्दह खाए बिना तो पूरा चैन मिल ही नहीं सकता।
   सुख का भी यही हाल है। सुख भी आदमी को एक ही तरह का नहीं विविध प्रकार का मिले तभी तृप्त होता है। 
                          🌀                     गंगेश गुंजन 
#उचितवक्ताडे.

Saturday, April 25, 2026

दो पंतिया : बेवजह भी नहीं लगता

बेवजह ही नहीं लगता है कुछ भी अच्छा
अच्छा  होने से  ही कुछ अच्छा  लगता है।
                   🍁|🌸|🍁
                    गंगेश गुंजन 
                 #उचितवक्ताडे.

Thursday, April 23, 2026

शे'रनुमा : किसी के ज़ख़्म का...

किसी के ज़ख़्म का निशान पाँवों में लेकर
किसी की रूह में कब से न चल रहे हैं हम।
                        🍁🍁
                     गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडे.

Wednesday, April 22, 2026

बादल चन्द्रमा और प्रेम !

।।  बादल चन्द्रमा और प्रेम ।।

कहते हैं प्रेम भी ब्रम्हाण्ड में अनन्त काल से एक बिछड़े नक्षत्र के समान एकाकी भटक रहा था। एक दिन तपती धूप में जब वह बहुत झुलसने लगा तो उसी के समान बेचैन बनकर अंतरिक्ष में भटक रहे बादल को इस कोमल नक्षत्र पर करुणा आ गई और उसने उसे अपनी छांह में ले लिया।प्रेम कुम्हला चुका था। अब बादल की छांव में आकर उसे हल्की-हल्की वायु का झोंका लगा तो फिर खिल उठा।और बादल को आभार प्रकट करने लगा तो बदले में बादल उदास होकर बोला कि बल्कि कृतज्ञ तो मुझे होना चाहिए तुम्हारा। क्या अनुभव है कि जाने कब से मैं भी इसी प्रकार भटक रहा हूं लेकिन यह शीतलता ऐसा आनन्द कभी नहीं हुआ जैसा तुमको अपने संग लेने के बाद हो रहा है। अब तो तुम्हें छोड़ने का मेरा भी मन बिल्कुल नहीं है। लेकिन क्या करूं ? दु:ख है मित्र ,अब इससे अधिक मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकता। सूरज मुझे ही कहां बख़्शता है। हवा के साथ कभी भी मुझे उड़ा कर कहीं किसी और अनन्त में भेज देगा। सो मैं इसी चिंता में हूं कि तुम जैसे दिव्य सुन्दर और कोमल की रक्षा नहीं कर पा रहा। तुम तुरत जन्मे शिशु के समान इतने कोमल और ईश्वर के समान सुन्दर हो लेकिन अपनी रक्षा के लिए तो तुम्हारे पास एक छोटा छाता भी नहीं है। ऐसे तो जीवन भर तुम झुलसते रहोगे या भीगते ही रहोगे। क्या करूं मैं? अब इस हाल में तुम्हें अकेला कैसे छोड़ूं ? सोच-सोच कर बादल बेहद परेशान था। अपने लिए प्रेम ने उसकी यह चिंता जो देखी तो वह भी उसे चिंता नहीं करने के लिए उसी भावना में बोला- 
-मेरा क्या मित्र। मैं तो यों ही आवारा फिरने को ही बना हूं। मुझे जहां-तहां रह जाना भी तो पसन्द नहीं आता। क्या करूं अपने ही स्वभाव का शाप लेकर आया हूं। तुम मुझे कितना बचाओगे ? चलते-चलते तुम्हारी तरह ही एक बार छल नाम का कोई मिला तो अपने साथ अपने घर ले गया।और उसने बड़े यतन से अपने पास ठहरा लिया। मुझ पर बहुत ध्यान देकर रख रहा था वह। लेकिन मैं ही हर पल जाने कैसी एक अजीव सी बेकली से दबा हुआ अनुभव करता और अचानक ही आंखों से कुछ दिखाई नहीं पड़ने लगा तो सोच में पड़ गया। मैंने सोचा इस तरह तो मैं अंधा हो जाऊंगा।मैंने उसे समझाया कि वह इस तरह किसी को भरमाने की,धोखा देने की आदत छोड़ दे तो मैं यहां रह जाऊंगा। लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ। 
मैं वहां से भाग आया। उसी परेशानी में तुम मिल गये हो। सो इतना बहुत है। फिर मिलेंगे कभी। तुम मेरी चिन्ता मत करो। अपनी सुविधा से मुझे गोद से कहीं भी उतार दो ! वज़न‌ भी तो कम नहीं है न मेरा। तुम थक भी तो गये होगे।' प्रेम ने यह जो कहा तो बादल बिजलियों में अट्टहास करता हुआ कौंधा। मीठा-मीठा गरजा और उल्लास में बोला : 
-अरे कुछ नहीं यार ! अब हमारी यह दोस्ती कभी खत्म होने वाली नहीं है। '
-अर्थात्?' प्रेम ने बहुत उत्सुक होकर पूछा तो बादल बोला-
-ऐसा करते हैं,मेरी एक सखि है-चन्द्रमा।मैं तुम्हें उसके पास रख देता हूं।वहां तुम जीवन भर बड़े चैन से रह पाओगे।उसका स्वभाव तुम्हरी तरह कोमल और मीठा है। वह तुम्हें बहुत मानेगी। सूरज तो फिर से ढूंढ़ेगा ही तुमको। सखि चन्द्रमा तुम्हें छुपा कर उस दुष्ट से बचाये रखेगी। और मेरा भी मन निश्चिंत रहेगा कि इतने प्यारे दोस्त को एक अच्छी जगह पर,उसके मन लायक घर में रख कर आया हूं। छल के साथ रहने के अनुभव से प्रेम का मन तो घोर घोर था। सो उसने अपनी असहमति जताई तो सयाना बादल मुस्कुराया और बोला- 'तू छल के अनुभव से डरा हुआ लगता है। लेकिन फिर कहीं तो विश्वास करना पड़ता है ना यार। तू एक पल चांद में बैठ कर तो देख। तू मुझे भी न भूल जाय तो कहना।'  उसके कहने में ऐसी सच्चाई लगी कि प्रेम को भरोसा हो गया।तब चलते-चलते बादल ने प्रेम को एक जगह टिकाया।वह जगह चांद थी।प्रेम को  चांद पर उतारते हुए उसने बड़े अपनापे से चांद से कहा-'सखि, तुम इसे रखो। तुम्हारे पास यह मेरी थाती है। तुम्हारे पास रखता हूं। इसे स्नेह और यतन से रखना।और हां इसके लिए मुझसे छल मत करना कभी, बता देता हूं,बादल ने हंसते-हंसते मज़ाक किया।
चांद ने प्रेम को जो देखा तो सुध-बुध ही खो बैठी।बिना किसी प्रश्न के उसने उल्लास से सब तरफ अपनी अनगिन सुनहरी बांहें पसार दीं‌ जो कि हंसती हुई दिव्य चांदनी बन कर चारो दिशाओं में फैल गई।आग्रह से कहा- ‘आओ,मित्र बैठो !'
लेकिन बादल तो जाने को उतावला तैरता रहा। यह देख कर प्रेम हैरानी से पूछने लगा- 
‘किन्तु तुम कहां जा रहे हो ?' इस पर बादल उदास हो गया। और बिहंस कर बोला-
‘नहीं मित्र।सखि से मेरा इतना ही वायदा था कि एक न एक दिन लाकर उसे प्रेम सौंपूंगा। सो आज मैंने अपना वह वचन पूरा कर लिया है!' यह सुनते ही प्रेम तो घबड़ा गया। बोल पड़ा :
‘लेकिन यह तो तुमने भी मुझसे छल किया है ?' प्रेम स्नेह के रोष में बोला तो, बादल बड़े सहज भाव से बिहंसने लगा और बोला:
‘दोस्ती में इतना-सा छल तो एकदम जायज़‌ है मित्र।' बहुत ममता से मुस्कुरा कर बादल ने जवाब दिया।चांँद उदास हो गया।बादल से दोस्ती के कृतज्ञ भाव में चुपचाप था।तब एकाएक उसने फिर सवाल किया: 
‘अरे मगर मैं जिस स्थान को जानता भी नहीं।जिससे कोई परिचय नहीं।मुझे यहां पर छोड़ कर चले जाना तो सरासर अन्याय है तेरा। तू छोड़ कर चला गया तो मैं और बेसहारा हो गया ना?' प्रेम रुआंसा होकर बोला।
'एक मुश्किल भी तो है दोस्त ! मैं अगर यहां रहता भी हूं तो बाधा ही बना रहूंगा। तनिक ही देर में कहीं तुम दोनों भी मुझसे उकताने ही लग जाओ। इसलिए पूरा तो नहीं, छुप-छुप कर कभी-कभार हम तीनों दोस्तों की आंँख- मिचौली भी चलती रहेगी। मगर हां,रोज-रोज की तरह नहीं,पर्व-त्योहार की तरह।अलविदा सखि चांद और दोस्त प्रेम!' कहकर बादल आकाश में यों तैरने लगा जैसे तालाब में मछलियां तैरती हों !
  इधर बादल से बिछुड़ कर प्रेम एक दो दिन तो चंचल रहा।लेकिन जल्दी ही अपने लिए चांँद का लगाव देख कर प्रेम, चन्द्रमा में चित्त लगा कर रहने लगा। रहते-रहते,बहुत दिन रह गया। तब एक दिन अकस्मात प्रेम उदास हूआ। फिर उदास ही रहने लगा। धीरे-धीरे और भी उदास रहने लगा। जैसे यहां अब उसका दिल नहीं लग रहा हो। इस तरह लगातार उदास देख कर एक दिन चन्द्रमा को प्रेम की ममता में चिंता होने लगी। तब इसका कारण जानने  की उत्सुकता हो आई। इस प्रकार समझते समझते उसने प्रेम का मन जान ही लिया। तब एक दिन उससे पूछ बैठी- 
'यहां तुम्हारा मन नहीं लग रहा है ना ? मैं समझ गयी हूं।' वह मुस्कुरायी और प्रेम का सिर सहलाने लगी। फिर बोली-
मुझे यह अंदेशा था। तुम यहां भी बेचैन ही हो जाओगे। सो मैं तुम्हारा कोई उचित और अच्छे ठिकाने ‌की खोज में लगातार लगी हुई भी रही। कि तभी एक  बार मुझे पृथ्वी की याद आयी।अभी पिछली रात तुम सो रहे थे तो मैं वहां उतरी तो भी लोगों को कछमछ करते पाया। सब तरफ़ अशांति। कहीं शान्ति नहीं। सब बेचैन।मैंने पूछा तो बोली :
'यहां कुछ ऐसी कमी तो ज़रूर है कि सब कुछ होकर भी कुछ खालीपन और उदासी छायी रहती है।जाने वह कैसा अभाव है कि दिन-रात हम अपने आप को महज़ चलती-फिरती बेजान पुतलियां भर महसूस करते रहते हैं…'
तभी मेरे मस्तिष्क में तुम्हारा ध्यान कौंध गया और लगा कि मुझे पाने के लिए,मेरे पास आने के लिए संसार जान दिए रहता है और तुम उसके पास रहकर भी अकेले और उदास पड़ गये हो। क्योंकि मैं चांद भी हूं तो क्या हूं? हूं तो अकेली ! सो तुम्हारा जी उदास रहने लगा है। तुम्हें कोई और बहुत- बहुत जगह और हृदय चाहिए। वैसी जगह मिले तो कहां मिले ! तभी मुझे सूझा कि एक मात्र जगह धरती ही है जहां अनगिनत आदमी,प्राणि और जीव जन्तु निवास करते हैं। मगर नीरस जीवन जीते रहते हैं। सो सबसे उचित और रहने लायक स्थान तो पृथ्वी है तुम्हारे लिए। इसी लिए ‌उस दिन मैं तुम्हें भी अपने साथ धरती पर घुमाने ले गयी थी कि तुम्हारा मन बहल जाएगा। लेकिन वहां जाकर जो तुम्हारा रूप देखा तो तुम्हारा मन पूरी तरह समझ में आने लगा।वहां जाते ही जिस तरह तुमने रोते बच्चे को गोद में उठा लिया और उसे चुप करा दिया,उदास मां स्त्री को दु:ख पूछा और ढाढ़स दी फिर अकेले जाते हुए उस पुरुष को टोका कि इतनी रात को अकेले कहां जा रहो हो? तो मैं कुछ कुछ क्या, पूरा ही तुम्हें समझने भी लगी। 
लौटकर आये तो वहां अपने लोक में तुम्हें और भी अधिक बेचैन देखने लगी। सो मेरा भी मन विचलित हो गया और तुमसे पूछा तो हिचकिचाहट से भी लेकिन तुमने सिर झुका कर मान लिया तो मैं ने तुम्हें अपनी किरण पर बिठा ले जाकर पृथ्वी पर उतार दिया।लोग कहते हैं कि अकस्मात पूरे वातावरण में एक अलौकिक सुगंधि फैल गयी। कुछ अनजानी आवाज़ गूंजने लगी।पशु-पक्षी तक चांदनी को भोर मान कर चहकने लगे थे…!यह कैसा आनन्द था जिस पर क़ब्ज़ा किये मैं बैठ गया था। मुझे अपने आप पर क्रोध भी आया। सो एक रात तो मैं पृथ्वी को वचन ही दे आया कि उसकी ख़ुशी के लिए यह त्याग करना मेरा कर्त्तव्य है। मैं जानती थी तुम इसे मेरे प्रति अपना छल मान कर हिचकिचाओगे।लेकिन बेकार। इस हिसाब से छल तो तुम से मैंने किया कि बिना तुम्हारी इच्छा जाने एक बारगी धरती को वचन ही दे डाला कि तुम्हें उसके पास भेज दूंगी।सो पृथ्वी को दिया अपना वचन पूरा कर सकी इसलिए प्रेम मैं जबतक रहूंगी मैं तुम्हारी कृतज्ञ ही रहूंगी।सच पूछो तो छल तो मैंने किया तुम्हारे साथ प्रेम।लेकिन क्या करें, दोस्ती में इतना छल तो माफ़ है। चांद करुणा से मुस्कुराया और आंख भर प्रेमको देखा। प्रेम की आंखें झुकी हुई थीं और जरूर ही कोर भींगे हुए।

कहते हैं कि तभी से सृष्टि में चांद,बादल और प्रेम की यह दोस्ती चल रही है।तीनों को श्राप है कि साथ-साथ नहीं रह सकते जबकि एक दूजे के लिए तीनों तड़पते रहेंगे। आकाश में बादल,अंतरिक्ष में चांद और पृथ्वी पर प्रेम! 
                          ०
इधर सुनते हैं कि ज्ञान विज्ञानी लोग इसे प्रकृति का विधान और सृष्टि चक्र कह रहे हैं। दीवाने हैं !
                        🌸
                 -गंगेश गुंजन,०१.६.'२०.
                #उचितवक्ताडेस्क।

दो पंक्तियां : प्यार और आदर

प्यास तो प्यार से ही बुझती है आदमी की
आदर सम्मान से उसका अहं तृप्त होता है.
                    🌸🌼
                 गंगेश गुंजन 
            #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, April 20, 2026

टिप्पणी : ईमानदार बेईमान

एक अनुभवी ईमानदार राजनेता सौ शिक्षित बेइमान शासकों से श्रेष्ठ होता है।
                      📕 
                 गंगेश गुंजन 
                   #उवडे.

शेरनुमा। मृत्यु से डर-डर के हम

मृत्यु से डर-डर के हम जीते रहे मरते हुए
पास आने पे तो इक मासूम बच्ची थी खड़ी'
                      🕊️ 
               गंगेश गुंजन 
            ज्ञ #उचितवक्ताडे.

Sunday, April 19, 2026

ब्रह्मा,स्त्री- पुरुष

स्त्री ब्रह्मा का अनुरोध है और पुरुष उनका आदेश।
                        📕
                  गंगेश गुंजन                                         #उचितवक्ता.

टिप्पणी : राजनीति।

         राजनीति में खेद नहीं है !
                    🌛🌜 
                गंगेश गुंजन 
              #उचितवक्ता.

Thursday, April 16, 2026

दो पंतिया : दोस्ती है, दुश्मनी है...

 दोस्ती है दुश्मनी है इतना सारा क़रार है। 
आज सुबह मेज़ पर वक्त़ का अखबार है।
                    🪾🌐🪾 
                   गंगेश गुंजन
               #उचितवक्ताडेस्क.

Wednesday, April 15, 2026

दो पंतिया। ढलते मन की परछाई

     जाते मन की परछाई है 
      यह जो मरी तन्हाई है।
            गंगेश गुंजन,
       #उचितवक्ताडेस्क

Monday, April 13, 2026

इश्क़ पर चाहतें यूँ हो गईं काबिज़,              ज़िन्दगी बेमज़ा तो होनी ही थी।
गंगेश गुंजन 

Thursday, April 9, 2026

सब राजनीति

🌐।                🪾🪾
        जो करती है राजनीति  अब
        युद्ध ठान  कर  युद्ध  विराम
        शान्ति बहाल  करती है  जो 
        निर्मम   वो  ही  क़त्लेआम 
                दुनिया कभी देश के नाम 
        जो करती है राजनीति सब…
                        📓 
                  गंगेश गुंजन 
             #उचितवक्ताडेस्क.

Wednesday, April 8, 2026

टिप्पणी : लेखक लेखक!

पहले कोई लेखक,सबसे पहले लेखक होता था। आज लेखक पहले कुशल मैनेजर होता / होती है बाद में लेखक।
                 गंगेश गुंजन 
             #उचितवक्ताडेस्क।

Tuesday, April 7, 2026

शे'रनुमा : ग़ायब हैं अथवा इन्सान

लिखते-पढ़ते ही रह करके भी क्यूँ ना जीया जाए जब                                      दुनिया भर की राजनीति से ग़ायब हैं  इन्सान-अवाम अब !

                          🪾    

               गंगेश गुंजन #उवडे .

Monday, April 6, 2026

टिप्पणी टकिया पुरस्कार

‘टकिया' 'पुरस्कार’ बेसी काल ओइ प्रतिभाक पँचकठिये साबित होइत छैक।✨         

गंगेश गुंजन ,   #उचितवक्ता.

जीवन युद्ध !

.          युद्धों की महाभूमि : जीवन !
                         ❄️
  मनुष्य के दो बड़े जीवन-युद्धों के मैदान
दुनिया भर एक समान नहीं हैं।
बेरोज़गारी की लड़ाई और मनुष्य की
स्वतंत्रता का संग्राम सर्वथा भिन्न मैदानों
में और अलग-अलग हथियारों से लड़े
जाते हैं ।
                        ।📕। 

            गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क.

Friday, April 3, 2026

दो पंक्तियां : होते-होते मैं भी पागल...

  होते-होते मैं भी पागल हो जाऊँगा क्या 

ऐसी दुनिया में ही जीने लग जाऊँगा क्या?

                  गंगेश गुंजन 

Thursday, April 2, 2026

दो पंक्तियां :

        समृद्ध लोगों का स्वास्थ्य अक्सर,            अनगिन लोगों के लहू से दमकता है.  

                           💢                                                गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क.

Sunday, March 29, 2026

शे'र : अपने ही सवाल के आगे

          अपने ही सवालके आगे
         हम ख़ुद लाजवाब खड़े हैं '
                       🕸️
                  गंगेश गुंजन

शे'रनुमा : जिस्म के जर्जर मक़ाँ में रह लिए

जिस्म के जर्जर मक़ाँ में रह लिए अब बहुत दिन 
कूच की सोच ऐ परिन्दे क़फ़स है यह घर नहीं।
🌀           
                   गंगेश गुंजन 
                #उचितवक्ताडेस्क.

Friday, March 27, 2026

दो पंतिया : अभी तो...

अभी तो खु़शी की छोटी-सी चाहत पर भी दिल टोके। 

बहुत कुछ जान भी जाऊंँ तो उनका क्या करूँगा अब !
.                       ▪️                                               गंगेश गुंजन                                             #उवडे.

Wednesday, March 25, 2026

सूख न जाए जबतक दरिया

        सूख न जाये जब                       तक दरिया,                                           आँखों में भी अश्क                          रहेंगे।

                      🌀 गंगेश गुंजन 
                                #उवडे.

Tuesday, March 24, 2026

शे'रनुमा दोस्ती शानदार

        दोस्ती शानदार हमने की,                        दुश्मनी जैसी निभाई है।

                      🌈          

                गंगेश गुंजन                                        #उचितवक्ताडे.

Monday, March 23, 2026

❄️ पानी पर तेल : विश्व और युद्ध !

❄️   पानी पर तेल : विश्व और युद्ध !
                              🪾
    हमलोग तो दशकों से पढ़ते-सुनते आ रहे हैं किअगले विश्वयुद्ध का खतरा पानी को लेकर है। लेकिन यह क्या ? अब तो लक्ष्य ‘तेल’ बन गया -सा लगता है। तो क्या अब यह युद्ध तेल के मुद्दे पर होने की तरफ़ जाने वाला है ?
                      #उवडे.

Thursday, March 5, 2026

चरिपंतिया

बहुत कम भ’ रहल छै आनन्दक सृष्टि सुख सुविधेक उत्पादन सँ भरि गेल पृथ्वी 

ख़ुशीक मार्केट मे मन्दी चलि रहल अछिब्लैक मे भेटि रहल छनि जनिका भेटै छनि।                                          गंगेश गुंजन                                                 #उचितवक्ताडे.

Saturday, February 28, 2026

दू पँतिया। किस अनजाने दुःख को जीने

किस अनजाने दुःख को जीना 
मजबूरी है हमसब की 
आगे तो इच्छा-अभिलाषा 
का पतझड़ उड़ता रहता है।
                     ❄️                                                गंगेश गुंजन 
             #उचितवक्ताडे.

श'रनुमा

         मान लूँ तो ज़ीस्त भर से प्यार है 
            छोड़ दू़ँ तो इश्क़ से इन्कार है

                    गंगेश गुंजन,
               #उचितवक्ताडेस्क

Friday, February 27, 2026

एक दो पंतिया

                       लड़का !
और तो ठीक है न पीता न जुआ ही खेलता,हीरा है।
एक छोऽऽटी-सी लत है बावरा,कविता का आवारा है।                        🌈
                   गंगेश गुंजन
                 #उचितवक्ताडे.

दो दूपंतिया

🕊️🕊️                  १.
      बारी-बारी छोड़ रहे हैं सब हमको 
     धीरे-धीरे मैं भी सब को भूल रहा हूंँ।
                           २.
किसी  के  वास्ते जीना  बड़ा  दुश्वार होता है 
बहुत आसान होता है किसी के वास्ते मरना
                                               🕊️🕊️
                       🌼                
                    गंगेश गुंजन 
                      #उवडे.

Wednesday, February 18, 2026

ख़ुश ख़बरें। दो पंतिया

       अच्छी लगती हैं ख़ुश ख़बरें 
        यहांँ की हों या वहाँ की हों।
                 गंगेश गुंजन 
             #उचितवक्ताडेस्क.  
                     |📕|

Wednesday, February 11, 2026

नीति अनीति के तर्क

    नीति से अधिक अनीति के पास तर्क 
    रहते हैं। क्या कहते हैं ?
                      🌒 
                 गंगेश गुंजन 
              #उचितवक्ताडे.

प्रजा वार्त्ता

।💢।                  प्रजा वार्त्ता 
                              🌈
संसारी सुख पर सरकारी कर ही हैं भारी-भारी
आनन्दों पर प्रकृति-प्रभु:की ही रहती है पहरेदारी 
जनजीवन की ख़ुशी सदा ही स्वप्न रही जेलों में क़ैद
तब थे राजा-महाराजे अब हृदयभंग लोकशाह स्वामी।
                       🌀  
                  गंगेश गुंजन 
            #उचितवक्ताडेस्क।

कुछ दोहे

                        ▪️
    सरल स्वभाव मनुष्य को निर्बल समझा जाए ।
    बन कर ओजस्वी मृदुल अब दिखलाया जाए। 
                           .
    गुण की नहीं दुकान हो कौशल की नहिं हाट ।
    विद्यालय है एक मात्र शिक्षा ही  एक   बाट।
                            .
    जीवन से तो दूर है प्रचलन में अब खाट ।
    पर मुहावरे में यहांँ  रोज़  खड़ी हो खाट ।
                       गंगेश गुंजन                                        #उचिवक्ताडेस्क. 
                               ▪️

Saturday, February 7, 2026

प्यार में आसान : मर जाना

|🔥
          प्यार में कठिन से कठिन काम किया जा सकता ह और होता भी है। लेकिन इसमें ज्यादातर लोग को मर ही जाना आसान लगता है..

                गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क.

Thursday, February 5, 2026

ग़ज़लनुमा: हर किसी के हाथ में पत्थर रहा

                        |📕|
                     ग़ज़लनुमा 
                         ▪️
       हर  किसी के हाथ  में पत्थर रहा 
       जानकर भी घर से मैं बाहर  रहा

       ज़रूरी है जानना इन हाथ को 
       सियासी चाणक्य भी सब डर रहा
  
       किस अंधेरे में लड़ाई चल रही
       क़त्ल किसका कौन इसमें कर रहा

       जंग के भी वे ज़माने लद गये
       एक नया अंदाज़ सज-संवर रहा
                          🌱 
                    गंगेश गुंजन 
                  #उचितवक्ताडे.

Monday, February 2, 2026

दो पंतिया

     उन्हें अपने मैक़दे का था गुमाँ 
   छलकने का था मिरा अपना हुनर।                           🕊️|🕊️
                गंगेश गुंजन
                  #उवडे.

दो पंतिया


      ख़्वाब मुक़म्मल हो जाता 
       हम भी कहीं कूच करते ! 
                      🌀
                गंगेश गुंजन 
            #उचितवक्ताडेस्क।

Saturday, January 24, 2026

दोहा

एक सियासत मुल्क की दूजी सकल जहान,
ज्ञज् हड़का टैरिफ से डरा ट्रम्प भये सुल्तान।
                         🤓
                     गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।