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एक बार फिर से देखूँ कर के
मौत को देखूँ मैं यूँ मर के।
रह गए डर कर जीते अबतक
रहूँ भला अब मैं क्यूँ डर के।
रह न जायें अनकिये वह सब
कहाँ जायें आधा यूँ कर के।
कुछ न कुछ हो रहा कैसा-वैसा
सुबह से आंँख दायीं क्यूँ फड़के।
हज़ारों कोस पर बोला कोई
यहाँ दिल्ली का दिल क्यूँ धड़के।
🪷
गंगेश गुंजन
#उचियवक्ताडेस्क.

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