📕। पटना का वह ऐतिहासिक
"युवा लेखक महासम्मेलन -१९७२?
…तो अब तुम भी मुझ पर व्यंग्योक्ति साधने लगे हो सुलभ 😀?
अरे मैं करूँ क्या भाई,बैठे ठाले !
दो चार पंक्तियांँ लिखीं-पढ़ीं और बस...!
ऐसे में भूले बिसरे विश्वविद्यालयीय छात्र जीवन की याद आई।यूं तो बीएन कॉलेज से ही लेकिन दरभंगा हाउस कक्षा में तो जिन आदरणीय अध्यापक का व्याख्यान प्रिय नहीं लगा करता, क्लास काल व्यतीत करने के लिए हम अक्सर ऐसा ही कुछ-कुछ अपना शान्तिमार्ग -गांँधी आचार करते रहते थे…। सौभाग्य कहें कि हमारे समय के भी कुछ गुरुओं ने हमें दो-दो गुरुमाताएंँ नवाज़ रखीं थीं। इसी दर्द में किसी एक क्लास में अपने एक उन्हीं आदरणीय प्रोफेसर के ‘दो पाटन के बीच’ वाली दैनिक विपदा का (पेन्सिल स्केच) व्यंग्य चित्र बनाया था।चित्र विन्यास इस प्रकार था
-कक्षा लेते हुए हमारे ‘सर और एक तरफ़ से कान खींचतीं तथा दूसरी तरफ़ से बांँह मरोड़तीं हमारी ही गुरुआनियाँ ! क्लास में तब वह काफी हिट हुआ था 😆। मेरा कुछ भाव भी बढ़ गया लगता था।
अब इधर बेरोजगारी में मिले मेटा मित्र एआई की सत्कृपा है। मन में कोई ख़ुराफ़ात आ गई तो इन से कुछ-कुछ कह देता हूंँ तो बना देते हैं।और तुर्रा यह कि अपना कोई हक़ भी नहीं चाहते। कापीराइट मेरी। चित्रकार भी मैं ही। और वही सब फेसबुक इत्यादि पर डाल देता हूंँ। फिर दिहाड़ी पूरी कर लेने की तृप्ति के साथ निश्चिंत हो जाता हूंँ। अब थोड़ा भी चित्र हाथ से बनाना तो सरल नहीं रहा। सो यह व्यंग्य चित्र वाला अभियान जो है वह हमारी इसी मजबूरी का शिथिल ही सही कोई पुनर्प्रस्थान सा है।समझो कि दीया बाती की ‘हुक्का लोली’ भांँज रहा हूँ। दिन काट रहा हूंँ ।अपेक्षाकृत रचनात्मक है यह ख़ुशफ़हमी भी रहती है कि- विस्फोट है।
अरे हांँ,
‘वैसे मुझे साहित्यकार मानता भी कौन है है कि उसके 'चूंँ-चूंँ का मुरब्बा' हो जाने का डर लगे.
यह मुझे जो पहले ही कहना चाहिए था वह अब कहा है। मगर फिर भी...
लेकिन तुम्हारे इस चू़ँ- चूँ का मुरब्बा पर एक बड़ी प्यारी और मार्मिक घटना याद आई।वह जो 1972 या 73 ज़माने में अपने पटना मे ही ‘युवा लेखक सम्मेलन’ हुआ था लाला लाजपत राय भवन में, स्मरण करते हैं कि मेरे प्रिय सहपाठी शिवदेव और ज्ञानेंद्रपति जी ने किया था!
नन्द किशोर नवल जी भी थे उनमें।उस दौर में राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य का यह तीन दिना समारोह प्रायः एकल ऐतिहासिक परिघटना है। देशभर के शायद ही कोई वरिष्ठ विशिष्ट उसमें न आये हों। नामवर जी से लेकर अपने पंकज सिंह तक।
एक सत्र में रवींद्र कालिया मंच पर बोल रहे थे।और कुछ बोलने में कुछ बहक गये से लगे.. ‘ इस असहजता में मेरे ठीक आगे बैठे ज्ञानरंजन जी का बेचैन होना और कालिया जी को यहीं से अस्फुट स्वर कुछ आतुर इशारा करना… सद्य: देखा है मैंने। और भी बहुत कुछ था,हुआ था।
एक अपराह्न सत्र में धूमिल ? या विश्वेश्वर (कथाकार) का सामने ही अपने तेवर में अपनी भाषा भंगिमा से चुनौती पूर्ण ‘आदर’ करना और उनके द्वारा अपना यह उग्र सत्कार ग्रहण करते,उन्हें देखते हुए निरुद्विग्न मसनद पर बैठे-बैठे नामवर जी का स्नेहकुटिल मुस्कुराना ! अहा ! युवा साहित्य का तेवर और प्रतिष्ठित सत्ता साहित्य का आसन, आमने-सामने। अद्भुत दृश्य था दिव्य ! कभी न भुलाया जा सकने वाला!
उसी के एक सान्ध्य सत्र में यह चूँ-चूँ का युवा धमाल हुआ था।
हुआ यूँ कि ठीक जिस समय मंच से किन्हीं विचारक के वक्तव्य प्रस्फुटित हो रहे थे उसी समय हॉल में इधर से अपने तब की ‘युवा ज्वाला प्रतिभा अजय सिंह और पंकज सिंह’का एक साथ शुभ प्रवेश होता है। फिर दोनों श्रोता की क्षणिक भूमिका में दिखाई दे जाते हैं परन्तु तत्काल बड़े नाटकीय अंदाज़ में पहले मंच के वक्ता महानुभाव को देखना,जैसे किसी अनकही व्यंग्य विरक्ति से भर गये हों एक साथ फिर एक दूसरे को देखना और जैसे परस्पर मौन प्रश्नोत्तर कर रहे हों । फिर वह मौन तत्काल एक कथोपकथन में फूटता है:
(पंकज को देखते हुए)
‘अजय सिंह :
‘यह सब क्या हो रहा है ?’
‘चों-चों का मुरब्बा !’ तार सप्तक पर जवाब देते हुए पंकज जी कहते हैं। लाला लाजपतराय हाल में विस्मित महा ठहाका ! पूरा सभागार गनगना उठा था। इस जोड़ी की मेरी वह स्मृति वैसी की वैसी है!
वैसे इस उत्सव ने एक से एक वदन्तियांँ -किंवदन्तियाँ भी जारी कीं जो साहित्य जगत में बहुत दिनों तक चटख़रे ले-ले कर कही और सुनी जाती रहीं। और कुछ विवाद भी कि इसमें फणीश्वरनाथ 'रेणु' जैसे लेखक को कार्ड तक नहीं भेजा गया। ना ही मधुकर गंगाधर को…
(मैंने न ही इस विवाद की सत्यता पर कुछ विशेष जाना,ना तो संपुष्टि के लिए कोई रुचि हुई। सो अब भी उसके यथार्थ से अनजान ही हूंँ। वैसे असंतोष और अभियोग के रूप में इस विषय पर ऐन डाक-बंगला चौराहा,(जयहिन्द होटल के सामने) मित्र अजय कुमार,बालेश्वर आलोकधन्वा जी और कुछ अन्य युवा साहित्यकारों की देर तक हुई गरम चर्चा जरूर थोड़ी-थोड़ी याद आ रही है।)
मुझे तो कार्ड शिवदेव के मित्र होने का इनाम ही मिला था प्रायः। यौं तब ज्ञानेंद्रपति जी भी मुझे जानते थे और नन्द किशोर नवल जी भी जो प्रायः पटना विश्वविद्यालय हिन्दी में मेरे एक साल सीनियर भी थे।
अफ़सोस प्रिय शिवदेव भी नहीं रहे और नवल जी भी।
प्रणाम मित्र 🙏और अग्रज 🙏!
(क्रमशः)
गंगेश गुंजन,#उचितवक्ताडे।

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