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भूखे मनुष्य और उसके अभाव को पहले पड़ोसी और समाज पहचानता और कहता था। आजकल पत्रकार और अख़बार बतलाते हैं और मीडिया। हाँ समय-समय पर अपनी राजनीतिक आवश्यकता और नीयत से सरकारें अर्थात् सत्ता भी करती रहती है। °°
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Friday, June 23, 2023
भूखे मनुष्य और उसके अभाव को....
Saturday, June 17, 2023
वक़्त के हालात से घबरा गये तो जी लिए..(ग़ज़लनुमा)
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वक़्त और हालात से घबरा गयेतो जी लिए लोग के व्यवहार से उकता गयेतो जी लिए।
बदलना आदत है क़ुदरत की तो बदलेगी अभी
तुम भी जो उसकी तरह बदले नहीं तो जी लिए।
कौन है जो ये समझता है नहीं ख़ुद को ख़ुदा
रह गये इन्सान यूँ ही उम्र भर तो जी लिए।
काट दी जाए ज़ुबांँ और लाज़िमी हो बोलना
वक़्त पर चीख़े नहीं तब जिस्म से तो जी लिए।
रूठना फिर मनाना फिर रूठ जाना यार का
भूल से भी जो लगाया दिल से फिर तो जी लिए।
बहुत कुछ बदले हुए इस दौर में ज़ेह्न-ओ ज़बान
इन्क़लाबी तर्बियत* बदली नहीं तो जी लिए।
तुम नहीं समझे सियासी दौर ये तो सर्वनाश
जी चुके बदहाल बेबस लोग थे,तो जी लिए। ••
*शिक्षा,सुधार,प्रशिक्षण,ट्रेनिंग।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Thursday, June 15, 2023
ग़ज़लनुमा : ख़्वाबों का सब शीशमहल खंडहर होता है
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ख़्वाबोंका सब शीशमहल खंडहर
होता है
जो ज़मीन पर हो वो ही घर,घर
होता है।
वो क्या बोलेगा जो ख़ुदगर्ज़ी का
मारा
हरे भरे गाँव कर क़त्ल,शहर
होता है।
लाख खड़े कर लें मीनार-ओ-
ताजमहल
रहना तो हर इक का एक उमर
भर होता है।
सपने को मीठा लगता है खारा
पानी
जितनी बहें आँख उतना सरवर
होता है।
अजब नहीं लोगों को भायें सुन्दर
सड़कें
ख़ास शख़्सको पर्वत और शिखर
लगता है।
क़दम नहीं उठ पाते क्यों उन सब
के आगे
बढ़ने में लोगों को कितना डर
लगता है।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Tuesday, June 13, 2023
ग़ज़लनुमा : कहते-कहते थक जाता है झुठ्ठा भी
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कहते-कहते थक जाता है झुठ्ठा भी
सुनते-सुनते पक जाता है सच्चा भी।
अथक क़दम रहने वाले जो हुए हौसले
उनके आगे रुक जाता है रस्ता भी।
जिन आँखों का सपना बासी हो न कभी
उनकी फ़ितरत नाकामिए विवशता भी।
रिश्ते हैं तो होंगे भी जब-तब मायूस
लेकिन कर क़ायम रख मधुर सरसता भी।
हिम्मत हो जज़्बा जुनूँ मक़्सद भी हो
एक आज़ाद ज़ेह्न समाजी दस्ता* भी।
*फ़ौज की टुकड़ी,गारद।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Monday, June 12, 2023
ग़ज़लनुमा : शौक़ से इश्क़ इब्तिदा करिए
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शौक़ से इश्क़ इब्तिदा करिए
ख़ुद को ख़ुद से ही जुदा करिए।
आप बदनाम हैं जफ़ा के लिए
कभी यों वफ़ा बाख़ुदा करिए।
जान उसने भी दे दी आख़िर
रस्म ही मान कर विदा करिए।
एक से एक हैं सियासतदाँ
हाय किस-किस पे जाँ फ़िदा करिए।
बहुत हुआ ख़्वाबों से खेल
जिस्म से जान अलविदा करिए।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Saturday, June 10, 2023
ग़ज़लनुमा : एक बार फिर से देखूँ कर के
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एक बार फिर से देखूँ कर के
मौत को देखूँ मैं यूँ मर के।
रह गए डर कर जीते अबतक
रहूँ अब मैं भला क्यूँ डर के।
अनकिये रह न जायें वो सब
कहाँ जायें आधा यूँ कर के।
हो रहा कुछ न कुछ कैसा-वैसा
सुबह से आंँख दायीं क्यूँ फड़के।
हज़ारों कोस पर बोला कोई
यहाँ दिल्ली का दिल क्यूँ धड़के।
🪷
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Tuesday, June 6, 2023
कविता कोना
कविता कोना
कुछ कवि रैक से किताब चुन लेने कीतरह उतार सकते हैं कविता कुछ लाइटर से सिगरेट जला लेने की तरह कविता धूक सकते हैं ।
कुछ सिन्हा लाइब्रेरी के बाहर जमा देने वाली सर्द रात में सीट पर सिकुड़े बैठे पुस्तकालय बन्द होने की ताक में ऊंँघते-चौंकते राह देखते रिक्शा वाले की बची हुई इस उम्मीद में,किसी पढ़ाकू बाबू सवारी की प्रतीक्षा में भी। किसी लॉज के बन्द कमरे में देर तक रखी रोटी पर ठंढा होते हुए नमक से निकाल सकते हैं- मुँह और हाथ के बीच थकान की दूरी को कविता समान।
इस समय सब कुछ में अजब गड्ड मड्ड हो रहा है सबकुछ !
रन बटोरने की तरह कर रहे हैं कुछ कवि कविता और कतिपय बुद्धिमान गण
फुटबॉल के गोल दागने की तरह रिकॉर्ड तोड़ आलोचना।
माया सुन्दरी अदृश्य राजनीति एक ही स्टेडियम में एक साथ क्रिकेट,कुश्ती, हॉकी-फुटबॉल के खेल रही है और गँवई चरगोधियांँ कोटपीस- ताश। झाँव-झाँव मचा हुआ है टीवी चैनेलों पर धुर्झार ! सभी कह रहे हैं सभी को जो हो हो जाएगा आर-पार अबके बार। बाज़ार सेंसेक्स पर टुकटुकी लगाये दामी से दामी गुटका फाँक रहा है। इन्हीं के बीच इधर से उधर
यहांँ से वहांँ चूहादानी में फँसे चूहे की तरह रेंगती हुई कविता निकाल रहे हैं कुछ।किंकर्तव्यविमूढ़ों की आबादी दिनानुदिन महँगाई की तरह पसर रही है। बहुत से कवि, इनसे भी बेहतर कविता बरत रहे हैं और तमाम पोस्टरों से भर रहे हैं आम जन का असंतोष, विस्फोटी आक्रोश जन्तर मन्तर के वृक्ष ओ दीवार में।
कुछ सुजान तो जन्तर मन्तर की कविता उठा कर फ़्लैट रजिस्ट्री कराने की तरह साधते हुए प्रेस क्लबों में सुलगा सकते हैं नितान्त वक़्ती कविता -
देर रात तक ढाल सकते हैं आज की जीवन-कला !
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
