फेसबुक पर उम्मीद
‘फेसबुक पर पढ़ने रहने को अब बहुत कम रह गया है ।’-पिता ने कहा।
‘तब भी तो आप दिन भर इसी पर आँखें गड़ाए रहते हैं !’-बेटे ने कहा।
‘हाँ,क्या करूंँ,कुछ दिख भी जाय बस इस उम्मीद में !' -पिता ने कहा।
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गंगेश गुंजन। #उचितवक्ताडेस्क.
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