Wednesday, January 10, 2024

ग़ज़लनुमा : आलम में तुम भी गुंजन जी

                 🌿 🧘🌿
     दिल का वो भी क्या आलम था
     क्या आलम है दिल का  ये भी !

     धरती पर  अब क्या धरती है
     तब यह धरती क्या धरती थी।

     वो गंगा तब क्या गंगा थी
     अब कैसी  हैं ये गंगा जी।

     बचा हुआ शायद हो मेरा
      पटना भागलपुर औ राँची। 

     किन ख़्वाबों में रचे-बसे हो 
     तुम भी ना तुम भी गुंजन जी।
                       🍂🍂
                   गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, January 8, 2024

श्राप देता हूँ कि अगला जनम आपलोगों का

🌓
.    अभी जो सबसे बड़ी ख़बर निकल                  कर सामने आ रही है…

                          💥
   आजकल सौ पचास ख़बरें ही नहीं सौ दो सौ ‘सबसे बड़ी ख़बर ही निकल कर आती है।’ कोई साधारण या छोटी ख़बर तो होती ही नहीं। इतने बड़े देश के विस्तारसे दिल्ली पहुंँचते-पहुंँचते ख़बर सबसे बड़ी बन कर सामने आ जाती है। एंकरों के श्रीमुखों से बिहार के ककोलत और झारखण्ड के हुन्ड्रू झरने की तरह छल छल नि:सृत होने लगती है।
    ख़बर फिर भी एँकर को वह ख़बर उतनी बड़ी बनती हुई लगती तो एंकर गण गला फाड़ू आवाज़ के आह्वान से उसे बड़ा बना कर ही छोड़ती / छोड़ते हैं।
   तो इन तार सप्तक वाले समाचार वाचकों ने क्या सोच लिया है ?
  बहुत जी जलता है तो अब कभी कभी शक़ भी होता है कि- आपलोग कहीं विदेशी कान मशीनों की कम्पनियों के लिए मॉडलिंग तो नहीं कर रहे हैं ? पगार तो, सुनते हैं आपलोगों को अच्छी ख़ासी मिलती है !
   आपलोगों ने अच्छे भले मेरे इतने सुरीले कानों की कैसी दुर्गत कर डाली है,मेरी ही नहीं मेरी तरह का टीवी-निर्भर एक पूरा का पूरा लाचार समाज है जो दिनानुदिन और बज्र बहिर हो रहा है अतः सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं, इस सामूहिक हित में आज श्राप देता हूँ कि आपलोगों का अगला जनम
पुराने ज़माने के ग्राम-कोतबाल में हो ताकि भर रात गांँव भर ‘जागते रहो-जागते रहो’ चिकरते-बौआते बीते…

                   गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Saturday, January 6, 2024

कुछ भर मेरे मन में था : ग़ज़लनुमा

                     •
     कुछ  भर  मेरे मन में था
     बाक़ी  सब  दर्पण में था।

     मेरा मैं  तब  सुन्दर  था
     वो जब कभी नमन में था।

     चलते-फिरते कहाँ मिला
     जो एकान्त मगन में था।

     उसका ही था कॉपी राइट
     पहले मिरे छुअन में था।

     सुख का अपना होगा स्वाद
     दु:ख भी किसी सहन में था।

     नया - वया सब भ्रम ही है
     जो था प्रथम मिलन में था।

     अरुणिम अधर क्षितिज पर जो
     उषा-मृदुल चुम्बन में था।
                        ।📕।
                    गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, January 4, 2024

अपने मयार से उतरा हुआ

                      🕊️।                          उतर गया अपने मयार से मैं ख़ुद ही ये ध्यान हुआ,
ऐसे में दुश्वार हो कहीं हम तक दोस्त का आ सकना।
                       🍂🍂                                             गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क

दुःख दस्तक दे करके ख़ुद

  दु:ख दस्तक दे करके ख़ुद ही लौट
  गया होता 
  मेहमाँ को कैसे लौटाते बाहर से घर      
  बुला लिया।
                    गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्तडेस्क

Monday, January 1, 2024

मैं कोई अख़बार नहीं हूँ : ग़ज़लनुमा

.                    •
     मैं कोई अख़बार नहीं हूँ
     वो चौथा व्यापार नहीं हूँ।
                    •
     सब कुछ छूटा अभी नहीं है
     बिखरा जन आधार नहीं हूँ।
                    •
     दह बह गये तुम्हें लगता है
     कोशी का,घर-द्वार नहीं हूँ।
                    •
     जाती-आती-जाती रहती
     मैं वो भी सरकार नहीं हूँ।
                    •
     जनता का हूँ उसके घर में
     नेता  के  दरबार  नहीं  हूँ।
                    •
     सधे  हाथ में  है लगाम भी
     नया नहीं अब वो सवार हूँ।
                    •
     इतना रह  कर महानगर में
     वंचित टोला,गांँव-जवार हूँ।
                    ••
              गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

अब और इसी राह प'चलने की ज़िद करूँ

अब और इसी राह पर चलनेकी ज़िद करूँ

काँटे बिछाये राह काट ले कोई जितना।

                      ‌🕊️

                   गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।