Friday, October 14, 2022

पीले गुलाब से क्या कम भिंडी के फूल

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   पीले गुलाब से क्या कम हैं ये
   भिंडी जैसी स्वादिष्ट सब्ज़ी के
   प्यारे फूल! आप ही देखें तो।

   गाँव में : #उचितवक्ताडेस्क।                                  १५.१०.'२२

रडार से बाहर

 ⚡          रडार से बाहर            ⚡
  एक दिन अपने ही सुखों की जेल
में बन्द रह कर वे सब सड़ जाएंँगे,
देख लीजिएगा
उनकी खुशियों की आंँधी उन्हें ही
बहाकर सात समुन्दर में डाल
आएगी
  वे सभी खुशियांँ हमारे सुखों को
हड़प कर पैदा की गई हैं
ख़ुद मालिक बन कर अपनी
अलमारियों में जमा की हुई हैँ।
वक्त की भी अपनी तरह से ईडी है
अवसर पर सब का हिसाब बराबर
कर ही देती है।
    कुछ तो बड़ा ज़बर्दस्त है कि पैदा करके दिखाये जा रहे इस तिलिस्म में भयावह फ़रेब है जो
उनके भी रडार से बाहर
अभी पोशीदा है।
ग़नीमत कि फ़ोटो ग्राफ़र है,
निगेटिव को पॉज़िटिव करना
जानता है 
डार्क रूम में मौजूद है जो
किसी घड़ी कर ले सकता है यह 
काम।

और लोगों के साथ,मन में कविता
है जो
आदमी के मन का बैरोमीटर है,
और जो सदा उनके रडार से
बाहर रहती है।
                      *
                गंगेश गुंजन ‌                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Wednesday, October 12, 2022

ग़ज़ल नुमा : मताए वायदा उसका दिया है

      🌸 ग़ज़लनुमा 🌸
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 मता-ए वायदा उसका दिया है 
 ज़रा सी ज़िन्दगी में कम क्या है।
                   •
 कहेगा और कौन वो ही तो ये
 तबस्सुम है तो चश्म-ए-नम क्या है।
                   •
 मुसल्सल चल रहा है मुल्क भर जो
 मौसमे ठंढ ऐसे गरम क्या है।
                   •
 वो जो सिंहासनों पर बैठे हैं 
 थोड़े मुजरिमों पर नरम क्या है।
                    •
 क़त्ल करता है और पूछता है
 बता मक़्तूल तेरा धरम क्या है।              
                   ••                
             गंगेश गुंजन                                       #उचितवक्ताडेस्क।

Sunday, October 9, 2022

कुछ अशआर

।🌔              अष्टदल !               🌔।

हम बोलते रहे मगर समझा न वो ज़ुबाँ
ख़ामोश इक ज़रा हुए औ' सब समझ गया।
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    इश्क़ से इश्क़ किसको नहीं है
    पता चलता है जब होता है।
                    •   
      इश्क़  में  मुआवज़ेदारी
    ग़ज़ब है दौर अजब यारी।
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सफ़र में सामांँ  समेट रहा है वो यूंँ            कि जैसे बहुत पास हो उसका स्टेशन।
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रोने लगो तो दिल भी रम जाए उसी में।    
लेकिन खु़शी भी आएगी आंँसू में नहायी।
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सफ़र में साथ नहीं ख़ास कुछ मेरे असबाब
एक जुदाई है दूसरा मिलने का ख़्वाब।
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दु:खकी गाड़ीपर सुख इक थका हुआ सफ़र
ज़िन्दगी अजब उलटबांँसी है तमाशा घर।                          •
लालसा हर पल जीने की यूँ न की जाये।
कभी मरने का हौसला भी रक्खा जाये।
                        **
                  गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।                                   १०.१०.२०२२

शे'र

असर ही छीन ले दरकार नहीं है वो बहर,
न हो ग़ज़ल सुन्दर कविता हो ये ज़रूरी है।
                     🌿🌿                                             गंगेश गुंजन 
          #उचितवक्ताडेस्क।

लेखक कवि नायक...

लेखक,कवि नायक तो हो सकते हैं        कोई साधारण और कोई महान् लेकिन खलनायक नहीं हो सकते।
                     🌀                                                गंगेश गुंजन 
         #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, October 6, 2022

ग़ज़लनुमा: पुराने घर में रातें काटते हैं

🛖                                      ••
    पुराने  घर में  रातें  काटते हैं।
    काटते क्या अंँधेरा छांँटते हैं।

    रौशनी ही नहीं जब घर में अपने
    तीरगीयाँ सहर तक हाँकते हैं।

  ख़ुशी अब तक मयस्सर ही नहीं जब 
  मिले हैं दु:ख तो दुख ही बाँटते‌ हैं।

   वो जो बूढ़े हैं उस घर के दादा
   वक़्त बेवक़्त कितना खाँसते हैं।

  अजब मातम का डेरा जग हुआ है
  लोग जीने को दु:ख भर काटते हैं।

   बड़ा सुकुमार है दादी का पोता
   कहे दादी को- 'दादा डाँटते हैं।'

  किसी पल मरने वाले ज्योतिषीजी
  अजब है भाग्य मेरा बाँचते‌ हैं।

  अनर्गल करने तक कविता में हमको
  वो ख़ुद को कवि निराला आँकते हैं।

  नहीं आते अब उसके छलावों में
  रात भर खुली आँखों जागते हैं ।

  छुपा कर रौशनी रक्खेंगे कबतक।
  हम उनके अंधेरे जब फाँकते हैं।
                        •
   गंगेश गुंजन 
    -गाँव से।०७.१०.'२२.