. मैं,वही सौतार !
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भागलपुर में बचपन बीता।आनन्द गढ़ और बरारी की बंगला कोठी में,बारी बारी से।आनन्दगढ़ के बागीचे ही बागीचे थे। बरारी हाई स्कूल जाने के रास्ते में भी। जिन पर बन्दरों का उपद्रव मचा रहता। दोनों प्रकार के के बन्दर। एक तो असली बन्दर और दूसरे हम कुछ बालबृन्द बन्दर 😃! सो आम के मौसम आते ही बागीचों की रखवाली के लिए तीर-धनुषधारी संताल युवक रखे जाते थे। हम उन्हें 'सौतार' कहते थे।हमलोग एक तो आनन्दगढ़ का होने के कारण और दूसरे उन भाइयों से दोस्ती कर लेते थे और इतनी कि कभी-कभी वे हमें तीर धनुष भी बना कर देते जिन्हें घर में रखना भी छुपा कर ही पड़ता भैया के डर से। अक्सर रातों मे जब वे बाँसुरी टेरते तब का समां का अनुमान ही किया जा सकता है। वैसे मैं आज भी इस घड़ी महसूस कर पा रहा हूंँ। ऐसे होते थे वे। हम बालक तो कल्पना किया करते कि ‘हम भी सौतार होते !’
आज शब्दकोश में इनके लिए 'संताल' मिलता है,पर मेरी स्मृति आज भी सौतार' ही कहती है। मुझे तो कभी-कभी यह भी लगता है, जैसे अभी ही कि,भाषा का सबसे ज़िन्दा प्रामाणिक शब्द प्रायः वही होता है,जिसे शब्दकोश उतना नहीं नहीं जितना स्मृतियाँ,ख़ासकर हमारा बचपन’ सँजोकर रखता है।
आज जाने कहांँ से कैसे सुबह-सुबह ‘सौतार’ की याद आई।और यह भी कि मैं भी वही ‘सौतार’ हूँ ! याद आया तो मैंने मैथिली में लिखा भी-
‘प्रचण्ड रौद मे कोनो
गाछ तर ओठङ्गि क’ बैसल
तीर-धनुष लेने कलम ओगरैत-
सौतार छी हम !’
किंतु तब इतने दिनों बाद संदेह हुआ कि मैं शब्द का सही प्रयोग कर भी रहा हूंँ या इसमें कोई भूल है ? बहुत देर तक फिर से याद करता रहा और फिर से मन भी मान जाता रहा कि हां यह ठीक है। फिर भी मन नहीं माना तो सुनिश्चित करने के लिए मुझे अपने अनुज मित्र रंजन कुमार लेखक और भागलपुर के प्रसिद्ध चित्रशाला के मालिक और वर्तमान भागलपुरी साहित्यिक सरगर्मियों के जंक्शन ! ) याद प्रो०लखन लाल सिंह आरोही जी (अंगिका भाषाविद /आंदोलन के कर्मठ विद्वान)मेरे स्नेही भी बन्धु। फोन रंजन को ही किया और ज़ाहिर है बहुत ख़ुशी हुई। बहुत दिनों पर बातचीत हो रही थी तो कितनी बातें निकलीं। लेकिन संदर्भ मैंने जो बताया यह सौतार शब्द प्रयोग के केंद्र में ही।लेखक रंजन जी अंगिका के कर्मठ शब्दमर्मी हैं।
बहुत दिनों के बाद बरारी के अपने बाल-मित्र पंडित जी यानी रत्नमोहन ठाकुर और जनार्दन जी सर्राफ (जन्नू )के भावुक कर देने वाले चर्चे देर तक चलते रहे …
ख़ुश रहो कलाकार -रंजन कुमार!
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडे.
(फेसबुक ब्लाग पर।)

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