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प्रिय भाई रंजन,
मीरा जयन्ती पर अब भागलपुरमें ''मीरा महोत्सव" होता है या नहीं रञ्जन ? मारवाड़ी स्कूल प्राँगण में जो विशाल रूप में होता था। आदरणीय हरिकुञ्ज जी ही थे न सूत्रधार उसके ?
... एक बार तो उसी अवसर और भाईजी डॉ.बेचन जी की अनुकम्पा से मुझ पर भारी विपदा आन पड़ी थी। जयन्तीक समारोह में उस रात कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे माननीय सांसद भागवत झा आज़ाद जी। संचालन -डॉ.बेचन। मैं (किसी स्वाभिमान जन्य कारणसे 'सविनयअवज्ञा' पूर्वक सामान्य श्रोता वृन्द के साथ विशाल पांडाल में बैठा था। बेचन जी मुझे लगातार मञ्च पर आकर बैठने का आह्वान कर रहे थे और मैं आदरपूर्वक अनसुना किए जा रहा था।उधर डॉ बेचन जी को श्रोताओं में से मेरे लिए पर्चियांँ आ रही थीं।अवश्य ही युवाओं के आग्रह से। मंच से इसके हवाले से भी मुझे बुलावे आ रहे थे।मैं आदरपूर्वक मंच पर जाना टाले जा रहा था। डॉ बेचन जी ने किंचित खीझ के साथ ही आखिर मुझ पर रामवाण की तरह छोड़ दिया। बोले -'सभा के अध्यक्ष,आज़ाद जी का आग्रह है कि गुंजन जी मञ्च पर आकर बैठें।.’...
उसके बाद का दृश्य जो वहाँ हुआ वो तो 'जो हम जानते हैं हमीं जानते हैं'।वह धर्मसंकट काल ! ऊपर से आज़ाद जी उन दिनों मुझसे नाराज़ चल रहे थे। क्यों यह तो पता नहीं।...लेकिन सो यादें फिर कभी।
लगभग यही घटना टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल हॉल के आयोजन में हो गयी।उसमें तो मुझे सभाध्यक्ष आ. चाँद मिसिर जी की भी 'सविनय अवज्ञा' करनी पड़ी थी। प्रसंग देवेन्द्र जी सुधाकर जी के एक साहित्यिक आयोजन का था शायद। उन दिनों मेरे ये दोनों प्रिय अग्रज भी भागलपुर में मेरे ‘बाहरी आदमी’ होने की प्रच्छन्न मुहिम चला रहे थे…🤔। उस आयोजन में मुझे विधिवत् काव्यपाठ का आमंत्रण कार्ड नहीं भेजा था। कार्ड भर भेजा था। सो कवि के स्वाभिमान में मैं,काव्य पाठ करने को तैयार नहीं हुआ और वहाँ भी जे.चन्द्रशेखर (चाँद मिसिर जी ) जैसी मेरे इतने आत्मिक शुभेच्छु तक को नाराज़ करना पड़ा था…।
संभव हुआ तो कभी कहने का मन है मेरा... आप थे कि नहीं रञ्जन उस रात वहाँ मारवाड़ी स्कूल प्रांगण के ‘मीरा महोत्सव में ? तब मेरे युववाणी के बहुत से युवा तो उपस्थित थे वहाँ। युवा तुर्क दिवाकर विद्रोही,संतोष प्रीतम तो सद्य: याद आ रहे हैं। आज के प्रोफेसर अमरेन्द्र तब मेरी युववाणी के स्टार शाइर 'अमरेन्द्र घायल' हुआ करते थे और कुमार भागलपुरी तो भागलपुरी ही रहे।रामावतार राही जी(दुःखद कि अब नहीं हैं )।राही शंकर ,
'कैक्टस' साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक पुराने मेरे मित्र तो सुविधा पूर्वक उस मंच पर आसीन ही थे वहाँ। आज भी यह सवाल मन में है ही और इस बात का दुःख भी कि मुझे ही ‘वहाँ मुझे, मुझे भागलपुर में, बाहरी आदमी माना गया …और सो अपने ही आत्मीय समानधर्मी लेखक मित्रों द्वारा भी…
होली की शुभकामनाएंँ भागलपुर ।
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[आपको सम्बोधित यह पत्र मैंने कभी आपको भेजा था वह मिला था या कितने ही मेरे ऐसे लिखे आर्काइव में ही दम तोड़ते हुए में शामिल रह गये? फाईलों में आज दिख गया तो इसी शक में भेज रहा हूंँ। सस्नेह,]
-गंगेश गुंजन।
17.01.2017.

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