पानी होकर सूख गया लगता है या हो चुका सफ़ेद। वरना इस मंज़र पर आंखों से लोहू उतरा ना होता !
गंगेश गुंजन
[उचितवक्ता डेस्क]
पानी होकर सूख गया लगता है या हो चुका सफ़ेद। वरना इस मंज़र पर आंखों से लोहू उतरा ना होता !
गंगेश गुंजन
[उचितवक्ता डेस्क]
बाबा से गुनाह हुआ यह ?
⚡
अगर कीर्त्ति का फल चखना है
कलाकार ने फिर-फिर सोचा,
…….
आलोचक को ख़ुश रखना है।
- नागार्जुन, ! 🙏!
वर्तमान में महज़ एक काव्य-विनोद भर लगता हुआ यह पद,भविष्य में कभी कवि -नागार्जुन का,गुनाह तो नहीं दर्ज़ होगा ?
-गंगेश गुंजन
[उचितवक्ता डेस्क]
।। ग़ज़लनुमा ।।
गाँव अब भी समझता है शहर को खुशहाल है। अब भी जब कि शहर आकर गाँव खुद बेहाल है।
गाँव हो या शहर हो या हो भले कुछ भी कहीं । धर्म भाषा जाति मार्गी सुलगता सवाल है।
बहुत उन्नत बहुत सक्षम विश्व के हैं गुरु हम कैसा फूहड़ कितना डगमग क़ौम का हाल है।
हाथ में सबके कोई जम्हूरिअत का तमंचा शांति गायन कर रहे बुद्धिजीवी,कमाल है।
हाथ में सत्ता सरोकारों के कुछ अब है नहीं जो है इक ना इक सियासी सोच का जंजाल है।
सल्तनत बेचारगी में सैर करती टहलती टी वी चैनल ख़बर में यह मुल्क मालामाल है।
अपने दिल का दु:ख जो बोला गया मुझसे ज़रा कहे साथी ‘ ये तो अब अपना-अपना ख़याल है।’ *
गंगेश गुंजन
[उचितवक्ता डेस्क]
ग़ज़लनुमा
🌿
दर्द का रिश्ता गहरा है दुःख का इस पर पहरा है
धोखा साँप की आँखों का सुन्दर बड़ा सुनहरा है
देते हो आवाज़ किसे छाछठ साल का बहरा है
जीवन का भी पाठ अजब सबसे कठिन ककहरा है
वो अब क्यूँ कर आएगा संसद में जा ठहरा है
ताप बहुत है मौसम में टिन की छत का कमरा है।
🍁 -गंगेश गुंजन।
🍁 -गंगेश गुंजन।
स्वर्ग लिखे तो क़लम हिन्दू ,लिख के जन्नत मुसलमान है। देख-सोचकर बेहद चिंतित,विचलित ये मन परेशान है।
गंगेश गुंजन
[उचितवक्ता डेस्क]
डर की तर्कीब में एक और ईजाद। अब कोरोना से डरायेंगे तुमको।
गंगेश गुंजन
[उचितवक्ता डेस्क ]
आवारा है कविता। इसीलिए आजतक उसे अपना घर नहीं हुआ।भटकती रहती है।
गंगेश गुंजन
[उचितवक्ता डेस्क]