Thursday, December 14, 2017

मन में उपजा

स्वार्थ और विचार बहुलअपने इस देशीय समाज में जिस दिन यह धर्म,भाव समरस मिलन,यह संगम होगा,हमें वह दुनिया मिल जाएगी। इस स्वप्न में बहुत लोग अनथक हुए अपनी-अपनी आयु जी रहे हैं।

प्रयाग को महज़ भू-धार्मिक समझने की भूल न करें।

धर्मास्था से परे वह, मानव प्रकृति की चिरन्तन लोक- धारणा भी है।

Wednesday, December 13, 2017

कहिनी

कहिनी
*
हम नहि  कोनो बकवास केलौं
लीखि कहि जैबाक प्रयास केलौं

देब माफ़ी हमर समयक लोक
किछो कहि क’ जँ उदास केलौं

हम्हूंँ लोके जकाँ कै बेर  कतेक
अबल,दु:खी मन निराश  केलौं

कोनो राजाक शरण नहि गेलौं
लोक संगहिक  अभ्यास केलौं

मोन पूछैये आब कखनो काल                   
अहाँ कविता मे की खास केलौं

स’भ  प्रतिकूल समय मे संभव
कैल प्रतिरोध नहि हताश केलौं

जदपि जे कहलक मन से कैलहुंँ
ओना अनकहलो बड़ रास केलौं

स’ब सँ कहबा मे छूटि गेलनि   
से विषय हम ही टा,खास केलौं

हँ मुदा बेर पर कए  बेर एहन
भेल संभव नहि अहाँक बात केलौं

एक बेर सब टा विफल मन कें
कहि दीतहुंँ अहूंँ जे माफ़ केलौं

गुंजनक एखन तं एतबे किताब
जीवि-मरि कवितेक विश्वास केलौं                   

रचना : ५.११.२०११ / गंगेश गुंजन

Friday, December 1, 2017

रूह में उतर कर देखा जो

रूह में उतर कर उतर कर जो 
*
मैंने उसके चेहरे पर देखा
पूरा का पूरा आकर्षक विज्ञापन  था   
कुछ रंगीन परेशानियां थीं,कुछ तीखे सवाल
सब के सब उलझी हुई रस्सी की तरह गड्ड-मड्ड,
और पढ़ना मुश्किल था उसके मन को।
मैंने एक मामूली-सा सवाल किया।
वह चुप रह गया कुछ बोला नहीं
लेकिन उसकी अवस्था मुझे लगी कि
जितना बाहर है वह बिल्कुल भी नहीं है
इससे इतर है, यह जो है
मैंने उसकी रूह में झांका।
मैं उसकी रूह में उतरने की कोशिश करने लगा और देखा-वहां कितना सुंदर इतना प्यारा
इतना मुलायम एक इंसान है जो वहां भी यानी
अपनी रूह में तन्हा है। लेकिन उसके हाथ में पुरानी खुशबू की कलम है।
नाक पर टिका चश्मा है। वयस्क आंखों में बचे हुए सपने हैं। और उसमें
गुन गुनाता हुआ गाना है। वहां, उसकी रूह में एक पूरा का पूरा अलग ही संसार है।
बिल्कुल अलग और उसमें जिधर देखो उधर बच्चे खिलौनों से खेल रहे हैं।
नवयुवक बेइख्त़ियार हैं। दोस्त प्रेम के चर्चे कर रहे हैं।
वयस्क परस्पर पुराने दिनों को स्वाद ले लेकर याद कर रहे हैं और यह सब  उसकी रूह में कभी चित्र, कभी कविता, कभी गीत और कभी समूह गान के रूप में चल रहा होता है।
अजीब-सा तिलिस्म रखा है।
मरने-मार डालने तक की गर्म बहस,नंगे शमशीर की तरह  खाली हाथ !
इसके चेहरे और इसके रूप में कितना बड़ा कितना बड़ा फासला है।
मैं उसकी रूह से पूछता हूँ -’कैसे संभालते हो तुम ?’
वह मुस्कुराता है जैसे, कोई अच्छा बहुत अच्छा या सबसे अच्छा इंसान मुस्कुराता है और
और जिसकी पूजा अर्चना करता है वह उसके कदमों में ईश्वर की तरह उसकी आज्ञा का
इंतजार करता है उसका टहल बजाने के लिए। वह यूँ निश्चिंत है जैसे,
दुनिया की सबसे अच्छी मां उसे अपनी गोद में लेकर सबसे अच्छी संतान की तरह          
सृष्टि की सबसे दिव्य लोरी गा कर सुना रही है और वह नंद नंदन ! नन्ही- नन्ही पलकों में
निंदिया रहे पूरी दुनिया पर मुस्कुरा रहा है।
और अपनी रूह दिखा रहा है, जैसे -
अर्जुन को दिखाया था,अपना विराट विश्वरूप !
चेहरे से अलग उसकी रूह तो पूरा का पूरा
एक ब्रह्मांड है
परम शांत ज्ञानवान है ।
यह कैसा इनसान  है !
*
-गंगेश गुंजन। 27 March, 2016.


Wednesday, November 29, 2017

शे-एर

हल्कान था जी यूं ही सुलूके समाज से
उसनेे भी आज लिख दिया आभार,या ख़ुदा !
*
-गंगेश गुंजन
३० नवंबर,२०१७ ई.

Thursday, November 23, 2017

छाउर-(२)

छाउर.(दू)
*
हाथ मे मैल आ कचकच करत छाउर।
बसातक उधियायल आंखि मे पड़ल तं
सहजहिं कुटकुटायत।
मुदा माछ बनबय में सबसं बेसी काजक रहय।
छाउरे लगा क’ घीचल जाइत छल तहिया
कटाह लोकक जीह।
कहबी मे सेहो कहां बांचलए।
राति-बिराति ठाम-कुठाम क’ देने बिलाड़िक नेड़ी कें
तत्काल झांपि देल जाइत छल,छाउरे सं
मूत-गोबर सं गिल रहि गेल गाय-बड़दक थैर पर छीटल जाय छल छाउर।जल्दी रुक्ख करै लेल माटि।
मां कहलक तं बाड़ी में कोबी-भांटाक गाछ पर तं कतेको बेर हम स्वयं छिटने छी-चूल्हि आ घूरक छाउर।
दतमनिक अभाव आ मार्निंग स्कूलक हड़बड़ी मे
कए बेर छाउरे दातमनि करैत रही हमरा लोकनि
गामक इसकुलिया विद्यार्थी सब।जाइ वाटसन स्कूल ।
छाउरो आब लुप्त होइत वन्य प्राणीक प्रजाति जकां भ’ रहलय। बेरा-बेरी विदा भ’ चलि जा रहल गाम मे बूढ़-पुरान लोक जकां।
मिझायल घूरक छाउरे पर घोकरिया क’ पड़ि-सूति
जड़काला राति बितबैत रहय गामक अनेरुआ कुकूर!
     इतिहास भ’ जायत।

-गंगेश गुंजन । २४.११.२०१७ ई.

Wednesday, November 22, 2017

छाउर

छाउर

*
इतिहासक छाउर सं,
आंखि कुटकुटाइत रहैये एखनो ।
एखनहुं उड़ि-उधिया‌ क’ अबैत रहैये बेसी काल,
ई छाउर कोनो ने कोनो श्मशान सं,क़ब्रिस्तान सं
अबैये आ करेज में पैसि क’
भरि अंतर्रात्मा बिर्ड़ो उठा दैये।
गंध सेहो कर’ लगैए चिरायन-चिरायन
करिते रहि जाइए दिनक दिन।
जीह हौंड़ैत रहैये, रद्द होयबा धरि ओकाइत रहैये कंठ।

आंखिक समस्या मुदा बेसी जटिल अछि।
एना बेर-बेर आंखि कुटकुटयबाक कोन उपाय ?
आंखिक डाक्टर कहैत छथि-
‘इतिहासक छाउर सं कुटकुटाय वाला ई आंखि
अबाह भ’ गेलय। एकर आपरेशन करबाउ।
एकरा तुरंत निकलबाउ आ दोसर लेंस लगबाउ।नव आंखि बनबाउ।अपना कें‌ अप-डेट करू।’

की करी ? मानि लेबाक चाही- डॉक्टरक सुझाव‌ ?
-गंगेश गुंजन

Monday, November 13, 2017

दु:ख दिल से सहा नहीं जाता !

दु:ख दिल से सहा नहीं जाता
और  उससे कहा  नहीं जाता

कौन अपना बचा है गाँवों में
सुन के दौड़ा यहाँ चला आता

बारहां सुख को निकलते देखा
घरके ग़म से ही धकेला जाता

हम भी रहते उसीकी बस्ती में
चैन में मन मेरा  भी इतराता

काश होती  बची कहीं  तासीर
आँख में अपनी भी लहू आता

वह जो बदला तो इस क़दर किअब                
मैं भी उसके  लिए कहाँ जाता

कोंपलें  फूटनी हैं अगली रुत
एक हसरत कि देखकर जाता
🌱
रचना: 9 फरवरी,2013.
-गं.गुंजन