नहीं लगें कभी हालात सम्भलने वाले
दिलों के वलवले अब वो न उभरने वाले
यहां तो कुछ भी बकवास हो रहा है अभी
यहाँ तो सियासत में कुछ भी कहने वाले
बात वक़्ती है महज़ राह-ए-बदगुमानी भर
बारहाँ सम्भले हैं वो जो सम्भलने वाले
एक कश्ती नहीं,दरिया भर का है मसला
किसी भी पल जो मौजों से उलझने वाले
कोई इक शख़्स नहीं कारवाँ का जज़्बा हो
और चल भी पड़ें तो कहाँ मानने वाले
घाव जो ज़ाहिर हैं उन्हें तो पहचानते हैं
फ़िक्र तो अनदीखे दिल हैं दुखाने वाले
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गंगेश गुंजन,

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