💢
१.
ग़मगु़सारों की भरी महफ़िल में चश्म-ए-नम कहीं
देखने वाला नहीं दीखा हमें वह दीदावर।
२.
जान-ए-महफ़िल भी नहीं जिस शब रही
क़हक़हे थे कम न रक़्श-ए-बज़्म ही बेजान था।
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(दोनों आज़ाद मगर आज एक साथ आमद) गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क.
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