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कहां दिखता है कभी ईश्वर या ख़ुदा कोई।
महज़ एहसास भर में देखिये,कितना दम है !
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गंगेश गुंजन
Sunday, May 5, 2019
शे'र : कहां दिखता कभी ईश्वर.
Saturday, May 4, 2019
बालिग़ प्रेम !
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बालिग़ होकर प्रेम सद्गृहस्थ हो जाता है।कहीं का नहीं रहता है।गृहस्थी में ही प्रेम की यह परिणति होती है।
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🌻🌻 गंगेश गुंजन
Friday, May 3, 2019
मत पत्र
। मत-पत्र ।
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लोकतंत्र की राजनीति में सत्ता-परिवर्तन तबे पर सिंक रही रोटी
पलटने जैसा नहीं है,अच्छा है।
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उचित वक्ता डेस्क
Thursday, May 2, 2019
मैत्री अऔर अनुग्रह
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मैत्री जब अनुग्रह दिखने लगे तो
उस प्रगाढ़ संबंध पर भी पुनर्विचार करने में तनिक भी देर नहीं करनी चाहिए।
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गंगेश गुंजन
Wednesday, May 1, 2019
मज़दूर दिवस
मज़दूर दिवस
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एक घूंट प्यास का चुकाया है दाम
उम्र भर बेच बाप-दादा का नाम ।
औसत सुख के लिए बहाये हैं ख़ून
रोटी की वजह किए जल्लादी काम।
हम भी चल-चल के थके हारे बहुत
हमको भी चाहिए था दो पल विश्राम।
कौन सुने कौन छुए अपने ये घाव
जो इस जीवन ने दिए हमें ठाम-ठाम।
ज़ंजीरी सभ्यता के थे वे मोहरे
और मैं बना रहा था एक रहे आम।
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गंगेश गुंजन.
