स्थानीय दैनिक में एक समाचार छपा है -
‘सकरी को हराकर जयनगर सेमीफाइनल में’।
यह पढ़ कर मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। सकरी का हारना। इस बात से मेरा खेल-स्वाभिमान आहत है। सकरी हार कैसे सकता है?असंभव !
विजयी जयनगर भी मेरे किसी ग़ैर राज्य या देश का नहीं है। सकरी और जयनगर दोनों ही मेरे आजू-बाजू हैं। दोनों तरफ लगभग समान दूरी पर। उत्तर का जयनगर एक ही ओर सिग्नल वाला रेल स्टेशन,जहां गए भी तो जाने कितने बरस बीत गए। उसी तरह सकरी गए हुए भी। फिर ? मेरी समझ में यह नहीं आता कि तब फिर सकरी का हारना मुझे क्यों बुरा लगा? याद आया है सकरी चीनी मिल प्रबंधन के खेल का वह फ़ुटबॉल मैदान! इसमें देखे हुए कितने ही मैच।खेल। लेकिन आज तो मुझे यह भी नहीं मालूम कि वह फुटबाल फील्ड है भी या किसी व्यावसायिक सोसायटी कालोनी की भेंट चढ़ चुका।फिर?
और तो कोई कारण नहीं। सिवाय इसके कि वहां दहौड़ा है। और दहौड़ा मेरे मित्रम् का गांव है। दीदी का सासुर भी। बचपन के बहुत दिन और अवसर मित्र के साथ वहां की स्थानीय बाल आवारगी में अभिभावकों की डांट-पीट के बावजूद अच्छे गुज़रे हैं। कैसे भूल सकता हूं। लेकिन आज तो मित्रम् भी यहां नहीं रहता। कभी दिल्ली कभी काठमाण्डौ करता रहता है। अलबत्ता बड़े शौक़ से गांव में सभी सुविधाओं वाला नया सुन्दर घर बना रखा है। ताला लटका रहता है।बंद।
दीदी भी कहां रहती हैं अब यहाँ।अपने बच्चों के साथ कभी रांची,कभी भागलपुर कभी मुंबई में रहती हैं। फिर इस सकरी से जहां दहौड़ा गांव है,अब मेरा क्या रिश्ता ?
सकरी की हार फिर से चुभी-
...कितने गोल से हारा होगा ? मैंने तसल्ली की कि ज्यादा से ज़्यादा जयनगर एक गोल से जीता होगा।इससे अधिक नहीं। फिर खीझ है- सकरी हारे या जीते ! इससे मुझे ? खीझा तो लेकिन चाहकर भी रोक नहीं पाया। बचा हुआ समाचार जो पढ़ने लगा तो पाता हूँ कि मैच विकेट और रन का यानी क्रिकेट का था !
-'वही तो ! फुटबाल में सकरी कैसे हार सकता है भला?
और क्रिकेट को कौन पूछता है।असली तो खेल 'फुटबाल’ है। उसमें सकरी नहीं न हारा है। मैंने ख़ुशी की लंबी सांस भरी है।
इस अहसास के साथ ही अब मैं अपना अभिमान सुरक्षित महसूस कर रहा हूँ।
*
-गंगेश गुंजन।१८.२.’१८.
Sunday, February 18, 2018
स्थानीय दैनिक में एक समाचार पढ़ कर
Friday, February 16, 2018
कितना छोटा उन्वान हुआ
क्या कुछ टूट गया इक पल में
🍂
फिर नजरें हैं झुकी कि उसका फिर हम पर एहसान हुआ
दो पल ही के लिए भले मेरे घर वो मेहमान हुआ ना उसके ही दिल में ना मेरे ज़ेह्न को है कुछ याद
क्या कुछ टूट गया इक पल में क्या अपने दरम्यान हुआ
अब फ़ुर्सत के लाले हैं हरदम सांसत में जान रहे कैसे ज़ालिम वक्त में हमको मिलने का अरमान हुआ
हम भी तो अब मन के मारे बैठे हैं तब से तनहा
किए तसल्ली यह कि उसका जीनातो आसान हुआ
रिश्तोंके खिलवाड़ में आख़िर वो भी क्या शातिर निकला
और देखिए इसमें भी मैं ही कितना नादान हुआ
अब तो फ़क़त शिकायत की क़श्ती में बैठे अलग-अलग
दुःख की बड़ी कहानी का कितना छोटा उन्वान हुआ !
🍁🍁
(गंगेश गुंजन) 10 अप्रिल,2014 ई.
अब की दुनिया कैसी दुनिया
ग़ज़ल-सी
*
अबकी दुनिया कैसी दुनिया
अलग-अलग एक-सी दुनिया।
लहू के छींटे भरा है दामन
यहां से वहां ख़ूनी दुनिया।
सुख - सुविधा के बनते पर्वत
एक तरफ़ अध नंगी दुनिया।
बच्चों की अंधियारी बस्ती
माँ-बहनों की जलती दुनिया।
अंतरिक्ष तक सफ़र संभाले
धरती भर कंगाली दुनिया।
उन होठों से मुस्काते हैं
इन अधरों से गाली दुनिया।
कितने सभ्य समाचारों की
कैसी जंगल वाली दुनिया।
बुद्धि और विज्ञान से उजली
वाह री ऐसी काली दुनिया।
जुड़ी - जुड़ी है युद्ध के लिए
शान्ति-कामना वाली दुनिया।
महाशक्ति से महाशक्ति के
समझौतों की साली दुनिया।
वहशी चाहत छद्म विचारों
की बनती रूपाली दुनिया।
आधा मधु और आधे विष की
घुली-मिली यह प्याली दुनिया।
पी लेने को देखो गुंजन
दौड़ पडी मतवाली दुनिया।
-गंगेश गुंजन.
Wednesday, February 7, 2018
सफ़र में सामान
मेरे सफ़र में साथ ख़ास नहीं कुछ असबाब
एक जुदाई है और दूसरा मिलने का ख़्वाब।
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०९ नवं.२०१५./ गुंजन g.
Sunday, February 4, 2018
राजपथ पर साहित्य
राजपथ पर साहित्य की सवारी सुभ्यस्त अति बौद्धिकों के तर्क में ही संभव हैे अन्यथा यह एक जुमलेबाज़ी भर है।
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गंगेश गुंजन,५फ़रवरी,२०१८ ई.
Saturday, February 3, 2018
कविता सृष्टि का प्रारूप
कविता नई सृष्टि,नये ब्रम्हांड का प्रारूप (सिनोप्सिस) है !
-गंगेश गुंजन।
०३फ़रवरी,२०१८ ई.
Thursday, February 1, 2018
हमारा लोकतंत्र
लोकतंत्र
*
मैं जिस ज़मीन पर खड़ा हूं मेरी नहीं है।
कभी भी खिसक सकती है पैर के नीचे से।
यह जमीन उस लोकतंत्र की है जो भी खुद
अपनी ज़मीन पर खड़ा नहीं,
किसी न किसी राजनीतिक दल के कंधे पर रहता है।
जैसे ही सत्ता बदलती है,लोकतंत्र भी बदल कर
उसी के आकार-प्रकार और स्वभाव-धर्म का हो जाता है।
हमारा लोकतंत्र स्वदेशी है, कि
बुद्धि-विचार की तरह आयातित ?
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-गंगेश गुंजन।
