Wednesday, October 12, 2016

चाहने से भी हो जाता है

चाहने  से   क्या हो  जाता है
कोई  अपना ही हक़ पाता है

जो कोई  दूसरों  को  ठगता  है
कभी तो ख़ुद भी ठगा जाता है

मेरे  घर  आकर आए दिन वह
क्या न इल्ज़ाम लगा जाता  है

मैं  तो   ख़ामोश सह जाता  हूँ
वो  मेरी  ख़ामशी   भुनाता  है

जाने सच के करीब जा-जाकर
क्यूँ यह  ख़ुद्दार  लौट आता  है

अब तो उसका लिखा हुआ गाना
भूल से भी  यह मन न   गाता   है

उसने  तो गीत  लिखा था   मेरा
भला  गंगेश   क्यूँ    बुलाता   है
*
-गंगेश गुंजन 

Saturday, September 24, 2016

ग़म अगर  है  तो  बँटवारा   हो 

ग़म अगर  है  तो  बँटवारा   हो  / 
कुछ हो मेरा  ज़रा  तुम्हारा हो  //

आज भी जीना क्यूँकर मुश्किल / 
ज़रा जो  दोस्त  का  सहारा  हो //

दूर  तक चार  सिम्त  पानी   है  /
एक  उम्मीद  है   किनारा   हो  //

सहे नखरे   बड़े   उठाए   नाज़  /
अब अंदेशा  है कि  गवारा  हो  //

आह  माज़ी  पुकारता  है   मुझे/
वो  ज़िन्दगी  वही   दुबारा   हो //

हरेक  लम्हा   बदरूप   बेजान  /
रही हसरत खुशनुमा प्यारा हो //

ख़ुद तो माँ के  हुए  ना बाबा के /
मेरा  बच्चा   मगर  हमारा   हो  //
*
१२ मई,२०१५ .
-गंगेश  गुंजन .

Thursday, September 22, 2016

जनता बुड़ि-बकलेल !

ढेलमासुक  हम ढेप  भेल  छी।
खलिया गाड़िक खेप भेल छी।।

यार-दोस्त सम्बन्धिक  परिकठ।
माटि-मलहमक लेप भेल छी।।

एते  पैघ   आबादीक   गामक ।
गनल-गुथल अभिशेष भेल छी।।

परिवेशक  वन  आ झाँखुर   सँ ।
अपनहि मे हम कोनो  जेल  छी।।

न्यायालय केर कोनो  दोख  की।
बिनु अपराधो बन्द    भेल  छी।।

टीशन  बीचक  घन  अन्हार  मे।
इंजिन  भङ्गठल  रेल  भेल  छी।।

लोकतंत्र  केर   मंदिर - मस्जिद।
एक  बेर    संसदो   गेल    छी।।

संविधान    बनबैत   सभा    घर। 
तकरहि हम बूड़ि-बकलेल  छी।।

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-गंगेश गुंजन। 10.03.’16.

Monday, August 26, 2013

के कहबा ले के सुनैत अछि

*
के कहबा लए के सुनैत अछि
सब अपने ताले नचैत अछि

भरल  गरीबी भूख  अशिक्षा
धनक ऎ अंबार अछैत अछि

ओ हँसि रहला सब कनैत अछि
गाम-गाम एहिना जियैत अछि

ओ सतबय अपना  प्रभुता सँ
ई निरीह जनता सहैत अछि

एकसर  आ  एकान्ती  पड़ितो
ककरो लग ने क्यो अबैत अछि

-गंगेश गुंजन
5 अगस्त, 2013 ई.