Tuesday, December 10, 2024

समाज में एक तीसरा नव यथार्थ !

🌖  समाज में कोई तीसरा नव यथार्थ
                       🌀
अच्छे-अच्छे लोग भी इस परिस्थिति को समझ नहीं पा रहे हैं या अपनी पूर्वग्रही अकड़ में आँखें बन्द किए हुए हैं ? जन जीवन असमानता की एक नयी तबाही की जटिल दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है ।
   आज के लोकतंत्र को नया पाठ तो
    दरकार नहीं ?
                         🌾
                     गंगेश गुंजन                                       #उचितवक्ताडेस्क।                                      १८.०४.'२२.

Sunday, December 8, 2024

'चाँद निकलेगा मगर हम न उधर देखेंगे '

🌜   ‘चांँद निकलेगा मगर हम ना उधर देखेंगे’

हमारे ज़माने के फिल्मी गाने भी कमाल के होते थे।एक गाना बहुत चला था ‘चांँद निकलेगा मगर हम न उधर देखेंगे।’
जहाँ तक ध्यान है फ़िल्म में बहुत अच्छी मीना कुमारी टाइप अभिनेत्री ने गाया था। उस वक्त फिल्म में ऐसे रूठे हुए दर्दीले गाने नायक और नायक दोनों ही गाया करते थे। कभी तो बम्बई और दिल्ली में एक साथ और कभी अकेले-अकेले। 
यह तब का अपने आप में एक लोकप्रिय तकनीकी हुनर था।
लेकिन यह गीत ‘चांँद निकलेगा मगर हम न  उधर देखेंगे’ जो गाया गया था उसके अंजाम भी अजीबो ग़रीब आते रहते थे अखबार से लेकर दिलदार महफ़िलों के शगूफ़ों तक पर चढ़ के… मेरे ही सहपाठी,साथियों के साथ कुछ कुछ ऐसा गुजरात कि याद करके आज भी दिल भर आता है।
तो उस वक़्त भी और आज तक ‘चांँद’ का तो खैर कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन चाँद को नहीं देखने वाले की जिद ने उनको कहीं का नहीं छोड़ा। कुछ एक जो बच निकले पता नहीं वह क्या होकर किस तरफ़ निकले।क़िस्मत से कुछ और भी बच गये हों तो प्रभु ही जानें आजकल किस हाल में हैं...                                   🌛
                   गंगेश गुंजन 
               #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, December 6, 2024

झूठ: एक उत्पाद !

🌎।               झूठ : एक उत्पाद !
                                 •
      झूठ एक वैश्विक उत्पाद है।लोग खुले दिल से अपनी-अपनी पसन्द का ब्राण्ड इस्तेमाल कर रहे हैं। अपने यहांँ आजकल यह माल इतना लोकप्रिय है कि सब्ज़ी मसाले की तरह प्रायः सब की रसोई में व्याप्त है। क्या राजनीति,क्या सामाजिक-कार्य,क्या धार्मिक या साहित्य,कला और संस्कृति-कर्म,पत्रकारिता ! और क्या आभासी प्रबौद्धिक उपक्रमों के क्षेत्र ! 
  अर्थ तो इन सभी का जनक ही ठहरा।  
                       ।🌓।
                   गंगेश गुंजन           
              #उचितवक्ताडेस्क।

Tuesday, December 3, 2024

'शब्दकोश : अभी बचा है एक चरित्र धान !

                      📕 | 📓
               ‘शब्दकोश : अभी बचा है एक चरित्रवान!'
                           °
एक मात्र शब्दकोष अब समाज में यथार्थ बचा है। वह निष्पक्ष,तटस्थ,प्रकृतिस्थ बच गया है जो गहरे विशाल समुद्र के समान शान्त रहता है।पूछिए तो ही उचित बतलाता है। उसके हृदयांगन में आदरपूर्वक क़रीने से अपने आधिकारिक क्रम से सभी गुण,सभी भाव, धर्म,समस्त विचार के उदात्त और अवदात्त शब्द समान आसन पर बैठे रहते हैं। सत्य और झूठ अपने स्थान पर कायम हैं। तथाकथित सामाजिक सभ्य-असभ्य,श्लील-अश्लील शब्द अपनी बारी में समान अधिकार से उपस्थित रहते हैं।किसी से किसी को घृणा नहीं द्वेष या वैर नहीं। दुराव छुपाव नहीं। राग द्वेष सब समान। आप इसी से सोचें कि राग-द्वेष शब्द विधिवत् होने के बाववजूद यहाँ कोई आपसी वैमनस्य नहीं है। एक व्यवस्था है। सबको मान्य है। जाने कब से सक्रिय शान्त चलती जा रही है।स्टेशनों पर रेल गाड़ी में चढ़ते-उतरते यात्रियों की तरह ही नये शब्द चढ़ते रहते हैं।अपनी अपनी सीट पर इत्मीनान से बैठ जाते हैं।
                    📕 | 📓
                  गंगेश गुंजन 
               #उचितक्ताडेस्क।

Thursday, November 28, 2024

एक दो पँतिया

  बाढ़-सी आए कोई नदी बहा ले जाये
इस बंजर में मुझसे बंजर रहा नहीं जाये।                          ...कोई नदी बहा ले जाये...
                         🌫️
                    गंगेश गुंजन  
                  #उचितवक्ताडे.

Sunday, November 24, 2024

रिश्तों के ड्राइंग रूम में

🍂           रिश्तों के ड्राइंग रूम में  !
      रिश्तों के ड्राइंग रूम में तभी तक रहें जब तक कि बजते-बोलते-साज़ या कम से कम गाते हुए ट्रांजिस्टर रेडियो लगें कि कोई पुराना ग्रामोफोन सेट। कोई एक चीज़ बन कर बिना स्पर्श किए जाते हुए-बेआवाज़ बने कभी ना टिकें।
   जिस पल ऐसा लग जाय शानदार ढंग से रुख़्सत हो लें।
                               🍁                                                गंगेश गुंजन 
                     #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, November 14, 2024

छुड़कुल्ला बनाम शगूफ़ा।

मैथिलीक ‘छुड़कुल्ला’ संँ बेसी ललित आ व्यञ्जनाक शब्द ‘शिगूफ़ा’ छैक? कहै जाउ तँ। तथापि,

   अपने ध्यान देबै जे प्रसंग अयला पर कय गोटय मातृभाषा प्रहरी लोक सेहो ‘शगूफ़े लिखता / लिखती, ‘छुड़कुल्ला’ नहिं। 

  एक दिन एही बाटे नीक संँ नीक भाषाक रस सौरभ सुखा क’ सिठ्ठी भ’ जाइ छै।                              🌺!🌺                                               गंगेश गुंजन                                        #उचितवक्ताडे.


Sunday, November 10, 2024

..पहिने अपन हयब साबित कर' पड़ैत छैक

🌎||   
          लेखक के पहिने 
          हयब सिद्ध कर’ पड़ैत छैक। 
                        •
 लेखक केँ पहिने लेखक हयब सिद्ध कर’ पड़ैत छैक।योग्य-अयोग्य,श्रेष्ठ कि साधारण से तंँ ओकर समाज,विद्यमान आ भविष्यक समाज,ओइ भाषा- संस्कृतिक समाज निर्णय करैत छैक।अकारण नहिं जे भरि जीवन लेखक अपन साहित्य मे समग्र मानवीय करुणा आनि सकय,लोक समाज भरि ओकर असरिक उदात्त संचार क’ सकय तकरे साधैत रहि जाइत छथि। 
  एखन ई डिजिटल युग मे पर्यंत साहित्य ताही अर्थ में साधना बनल रहि गेलय।   
                        📕
                  गंगेश गुंजन    
                #उचितवक्ताडे.

Wednesday, October 30, 2024

इस दीपावली पर : एक दू पँतिया

     जितने तेल-दीप-बाती से 
     एक दिवाली भर मनती है,
     उतने से तो और एक संसार 
     उजाला हो सकता है !
                  शुभ दीपावली !
                         ।🔥।
                     गंगेश गुंजन 
                #उचितवक्ताडेस्क।

Sunday, October 27, 2024

कविता की बुद्धिजीविता...

           कविता की बुद्धिजीविता 
                        ❄️
  कविता के कुछ दु:ख,कवि के दिमाग़ी होते हैं,काल्पनिक और लगभग कृत्रिम। 
लेकिन इसी बात का पाठक को आभास भी नहीं होता।असल कविता में इस काल्पनिकता को स्वाभाविक,विश्वसनीय और सहज साधारण बना सकने के अनुभूतिप्रवण कौशल में ही कवि,कवि होता है।
    बरजोरी की कविता को पढ़ने-सुनने पर सामान्य पाठक को सीधे महसूस हो जाता है।सो चाहे विचारों से फड़कती हुई नयी कविता की शक्ल में हो अथवा  गीत,ग़जल के साँच-ढांँचे में। इसके लिए बुद्धजीवी होना कोई ज़रूरी नहीं।
                       🌜🌛
                    गंगेश गुंजन 
                  #उचितवक्ताडे.

Tuesday, October 22, 2024

अतीत से प्यार

अतीत से बहुत प्यार है तो उसे अपना सादा कैनवास बनाइए ! वर्तमान पर भविष्य रचिये।  
                            🛖
                      गंगेश गुंजन         
                   #उचितवक्ताडे.

Monday, October 14, 2024

मेरे समकालीन रचनाकारो !

🪻🪻।       मेरे समकालीन रचनाकारो !          
                            •
  मेरे कुछ समकालीन और प्रतिभाशाली लेखक-कवि का वर्तमान लेखन इतना विरक्त करता है कि कई दफ़े दिल करता है उन्हें कह दूँ कि अब वे अपने प्राप्त साहित्यिक यश की रक्षा करें और ‘कुछ भी’ के बल पर यों ही ‘कुछ भी’ लिखना- कहना बन्द कर देना चाहिए। कारण कि जिनकी बोलती,नाचती-गाती और कहती हुई प्रासंगिक रचनाएंँ पढ़ता आया हूँ उन्हीं की कलम से ऐसी उथली राजनीति, छिछला संकुचित धर्म-कर्म बोध और विकलांग जातीय ग्रंथि के नाम पर ऐसी ऐसी गूंगी,लंगड़ी और कुरूप लिखते जाना और सो दिनचर्या की तरह ताबरतोड़ फेसबुक समेत ऐसे तमाम माध्यमों पर लगभग रोज़ चिपकाते चलना बेचैन और विरक्त करता रहता है।फेसबुक इस अर्थ में बेहद पकाऊ हो गया है।
    उन्हें कह ही नहीं पाता मैं। अब आज अभी यह शैली अपनाई है और अनुरोध कर रहा हूँ ‘विश्राम लो मित्र! हुआ। बहुत हुआ,अब विश्राम ही लो!’   
     यदि मेरे वैसे रचनाकार मित्र भी इसी तरह मुझे कहें तो मैं इसपर आदर पूर्वक विचार करूँगा,आत्मालोचन करूँगा और सप्रसंग कर गुज़रना ही चाहूंँगा।
                      🌵😔🌵                              
                      गंगेश गुंजन                                        #उचितवक्ताडे.

दो : दोपंतिया

                       |🌫️|

लौटना बढ़ने से आगे बहुत था आसान  लेकिन                                            बन्द गलियों के शहर में लौट कर हम    कहाँ जाते।                                                                   (२).                     उम्मीदकी दीवार का प्लास्टर उतर रहा अब झलकने लग पड़े कंकाल ईंटों की दरारों से।

                   गंगेश गुंजन                                         #उचितवक्ताडे.                              (फेसबुक पर १३.१०.'२४ 

Friday, September 20, 2024

दो पँतिया :

कोई ये आख़िरी नहीं है ग़म क्या कीजै
बचा है इश्क़ तो जनाज़े भी और उठेंगे।

                  गंगेश गुंजन 
            #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, September 16, 2024

'....नाराज़ हैं आसानियाँ ! ' (दो पँतिया)

जब से मेरी हो गई है
 मुश्किलों से दोस्ती, 
      पूछिए मत किस क़दर नाराज़ हैं 
           आसानियाँ !
                          🌼
                     गंगेश गुंजन
                #उचितवक्ताडेस्क।

ख़ुशफ़हमी के इलाक़े

❄️!❄️            ख़ुशफ़हमी के इलाक़े •              
           कवि ही नहीं,बहुत से आलोचक और विद्वानों को भी अक्सर यह ख़ुशफ़हमी रहती है कि वे सर्वथा मौलिक और महान लिख और कह रहे हैं।
  स्वाभाविक है।वे क्या समाज से बाहर हैं?                                              
                          |🌜?🌛| 
                        गंगेश गुंजन 
                     #उचितवक्ताडे.

Friday, September 13, 2024

विचार -पंथ कारवाँ में

                  'विचार-पंथ' 
मैं अपने विचारपंथ-कारवांँ में सिपाही नहीं,साधारण जन कारसेवक हूँ।
                    ।🌱।
               गंगेश गुंजन 
         #उचितवक्ताडेस्क.

Wednesday, September 11, 2024

दो पँतिया : किसी के चाहने न घाहने से.

किसी के चाहने न घाहने से क्या होगा
बदल के ही रहेगी यह दुनिया देखियेगा।

               गंगेश गुंजन  
            #उचितवक्ताडे.

Monday, September 2, 2024

ग़ज़लनुमा : दिल कुछ ऐसा अफ़साना लिख

                   🍂🌸🍂
       दिल ऐसा कुछ अफ़साना लिख
       सुख हर शख़्स के सिरहाना लिख।

       बँटे हुए  दु:ख के भी इलाक़े
       सबको कुछ-कुछ वीराना लिख।

       ख़ुदा गवाही से बढ़ कर के 
       रूह दिखा दे खुल जाना लिख।

       मिले  हुए  हो गए बहुत दिन 
       'कल रेस्त्राँ में आ जाना' लिख।
                      गंगेश गुंजन 
                   #उचितवक्ताडे.

ग़ज़लनुमा : दिल कुछ ऐसा अफसाना लिख

                     🍂🌸🍂
       दिल ऐसा कुछ अफ़साना लिख
       सुख हर शख़्स के सिरहाना लिख।

       बँटे हुए  दु:ख के भी इलाक़े
       सबको कुछ-कुछ वीराना लिख।

       ख़ुदा गवाही से बढ़ कर के 
       रूह दिखा दे खुल जाना लिख।

       मिले  हुए  हो गए बहुत दिन 
       'कल रेस्त्राँ में आ जाना' लिख।
                     गंगेश गुंजन 
                #उचितवक्ताडेस्क.

Saturday, August 31, 2024

फेसबुक पर कविता !

                   फेबु पर कविता !
फेसबुक पर आइ-कालि मिझाएल दीप जकाँ कविता बेसी भेटत आ कय टा बिनु लेसल दीप सन कविता।       
                     गंगेश गुंजन  
                #उचितवक्तडेस्क।

Thursday, August 29, 2024

हम सहरसा छी !

   ⛈️         हम सहरसा छी !
   काल्हि मुख़्तार आलम जीक सहरसा पोस्ट आकर्षित कयलक। हमरा स्मृति मे तँ १९७२-७३ई.क सहरसा अछि।सब सँ पहिने महिषीए गेल रही-राजकमल जी सँ स्मृति-भेंट ओ आदरणीया शशि भाभी जी केँ प्रणाम करऽ! 
  ई तँ सर्वथा नऽव सहरसा। सोचितहिं रही कि मित्र समाधान प्रसाद जीक फ़ोन आयल।किंचित स्मृति उदास किन्तु उल्लसित तंँ रहबे करी कि अपन सदाबहार अंदाज़ मे मित्रवर टोकलनि -
‘बड़ी कोमल स्वर भाषा फूट रही है कवि जी। का बात है ?’
‘एहन कोनो बात नै बन्धु परन्तु हँ, एखनहिं राजकमलजी,मायानन्दजी, जयानन्दजीक सहरसाक नवका फोटो देखलिऐ से कनी भावुक ठीके छी ! उचिते हेतैक यदि साहित्यिके टा नहिं,ई सहरसा सबजन रुचिक देशव्यापी ध्यानाकर्षक ‘पर्यटन स्थान’ बनि जइतैक…!’
‘कने ओ फ़ोटो पठाउ तंँ हमरो। देखिऐ हमहूँ कनी।’ 
ओ कहलनि अर्थात् हुकुम देलनि। हमहूँ तत्काल तामिल कयल। फोटो पठा देलिअनि आ प्रतीक्षा कर’ लगलौं। देखी समाधान बाबू कोन बम फोड़ै छथि।कि
पिठ्ठे पर फ़ोन आयल। कहलनि -
‘कवि जी,ई वैह सहरसा यौ जे सहरसा एक समय मे कोसीक बाढ़ि आ नोर सँ नहायल मैथिली साहित्य संँ बहैत छलय?’ 
 हमरा तँ एकर कोनो जवाब नहिफूरल। समाधान बाबूक ऐ पूछब पर यद्यपि तखने सँ गुनधुनि मे छी। 
  कोय गोटय कहि सकैत छी जे सहरसा द’ समाधान प्रसाद से किएक टिपलनि ?
  दुर्भाग्य जे प्रिय महाप्रकाश तँ छथिहे नहिं। तखन 
प्रो० नवीन अहाँ?
वियोगी जी? 
प्रो.सुभाष अहाँ? 
अहाँ प्रो.महेंद्र ?
                         🌼|🌼
                      गंगेश गुंजन 
                 #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, August 26, 2024

ख़ामोशी से डर लगता है : ग़ज़लनुमा

🌜🌛
       ख़ामोशी से  डर लगता है
       घर गपशप में घर लगता है।

       यह आलम है  तन्हाई का
       लम्हा एक पहर लगता है।

       जो कहते हैं बदले दुनिया 
       कुछ में तो गड़बड़ लगता है।

       इसके भी अफ़सोस करें क्या
       मेरा  गाँव  शहर  लगता  है।

       दुनिया को इस ढब से बदले  
       लोकतंत्र,तो  डर  लगता  है।

       हरियाली भर से उदास इक 
       पंछी बिना शजर लगता है।

       हम आजू -बाजू रहते हैं
       दूर-दूर  में घर  लगता है।

       थकन उम्र की कहे सहर अब 
       जब सूरज सिर पर लगता है।

       बहुत ख़ास की तर्क़-ए-मुहब्बत
       मुश्किल और बसर लगता है।
     🌛             ⛪🛖             🌜
      
                    गंगेश गुंजन
                 #उचितवक्ताडे.
                     25.8.'24.

Sunday, August 25, 2024

प्रोफ़ेसर कर्मेंदु शिशिर : जन्मदिन बधाई !

° 
    जिन कुछ ऊँचे कारणों से समकालीन हिन्दी साहित्य मुझे ऐसा श्रेष्ठ और श्लाघनीय रहा है उनमें प्रोफ़ेसर कर्मेन्दु शिशिर हैं एक। अन्य भाषा को भी ऐसा लेखक उपलब्ध है या नहीं, मुझे नहीं पता। 
    किन्तु सब होते हुए भी,काश ! मैथिली भाषा को भी एक प्रोफ़ेसर कर्मेन्दु शिशिर मिलता ! बहुत दिनों की यह मेरी अपेक्षा रही है बल्कि प्रतीक्षा।
    आज कर्मेन्दु जी का जन्मदिन है। बधाई देता हूंँ और एक अग्रज की असीम मंगलकामनाएँ देता हूँ । 💐
                   गंगेश गुंजन 
             #उचितवक्ताडेस्क।
       फ़ोटो : उवडे अभिलेखागार।

Saturday, August 24, 2024

नहिं रहैत छैक कोय तँ...

                          🌼                                          नहिं रहैत छैक कोय तँ…
  कोइ जखन नहिं रहल तँ की रहैत छैक 
कोनो कोठली,कोठलीक पलंग,खाट- चौकी,बइसैक कुर्सी रिक्त रहैत छैक। 
बहुत दिन सँ एकहि ठाम गेंटल टेबुल पर किछु किताब रहैत छैक
एक टा कम्प्यूटर,किछु फाईल 
ककरो नंबर सब सँ भरल मोबाइल फ़ोन
रहैत हेतैक।
  क्रमशः ओकर लुप्त होइत बोल,भाव- भंगिमा ओ मिझाइत आकृति रहैत छैक।

हँ किछु टटका स्मृति सेहो रहैत छैक जे तत्काल लोक,समाज कें शोक मनयबाक काज आबि जाइत छैक आ आगाँ बर्खी इत्यादिक।
सम्प्रति फेसबुक सहित समस्त संचार माध्यम मे एक-दू दिन धार कात ओकर धधराक फ़ोटोमय शोकक उद्गार आ समाचार छपैत रहैत छैक… 
  देबाल पर माला पहिरने फोटो सेहो रहि जा सकैत छैक किछु बर्ख,ककरो नहिं रहलाक बाद।
 सेवा-समर्पित अपन लोकक शोकरिक्त समय,सम्भव जे समकालीन कय टा समानधर्मी प्रतिद्वंद्वी हल्लुक भेल अमानवीय हृदय रहैत छैक।
ककरा लय कतेक,की केहन कतेक रहि जाइत छैक ?
जकरा लय रहि जाइत छैक ओ सब टा नहिं रहि जाएब मे ओकरे टा मूर्त्त 
किछु गपशप करैत प्रस्तरीभूत मौन समय रहैत छैक जे  
विशेष लोक रहने सभ्य समाजक सभा सोसाइटीक मनाओल जाइत पुण्य तिथि- संस्कृति मे बजैत छैक
   किछु बर्ख धरि 
   बर्खीक भोज मे 💐   
                      गंगेश गुंजन 
                    #उचितवक्ताडे.

Sunday, August 18, 2024

दो पँतिया : दो ऐबों ने मुझको आख़िर...

  दो ऐबों ने मुझको आख़िर छोड़ा नहीं          कहीं का।
  सल्तनतों की मुलाज़िमत और शाइरी से 
   इश्क़ ने।
                         🌼🌼 
                      गंगेश गुंजन। 
                 #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, August 15, 2024

ग़ज़लनुमा : उस बार किससे साविक़ा पड़ा था मेरा...

🌻🌻
      🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾
 उस बार किससे साबका़ पड़ा था मेरा
 इस बार हुआ किससे ये राब्ता मेरा।

इतना महज़ कहा तो टोके है रहनुमा-
'कब से लगा सियासत में चस्का' मेरा।

आते उधर से देख के वो पूछने लगा 
'किस एमपी से मिलकर आना हुआ' मेरा।

चालाक मिरा रहबर कितना है देखिए 
मैं बेवक़ूफ बेसबब चेहरा झिंपा मेरा।

कहने में हिचके क्यों जयहिन्द भी जु़बान 
नेता अपन ही क्षेत्र का अनजान क्या मेरा।

बाज़ू उठाये ऊंँचा रेशम का झंडा 
हँसता है देख खादी तिरंगा मेरा।
                     🌾🌼🌾         
                    गंगेश गुंजन 
                       #उवडे.
               १५ अगस्त,२०२४.

Friday, August 9, 2024

बाँग्लादेश है या मेरा गाँव है धधकता हुआ!

🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥। 
       बाँग्ला देश या मेरा गाँव है 
               धधकता हुआ?
अभी बाँग्लादेश-विपदा का जल रहा  परिवेश देख कर मुझे बचपन के अपने गाँव की बेसंभाल याद आई है।कच्चे फूस घरों की बस्तियों में अक्सर आग लग जाती थी। विकराल अगिलग्गी !
   तब वही नहीं अगल-बगल सभी गाँवों में अगलग्गी का भय पसर जाता था। कोहराम मच जाता। खढ़मास तो हर साल इस अगिलग्गी के लिए रिजर्व-सा ही मान कर चला जाता था।
   मेरे गाँव के किसी भी टोले में ‘उतरवारी टोला’ हो कि पुबारी टोला अगलग्गी होती तो हम बालकों का मन तब जिस प्रकार भयभीत हो उठता और हम दहलने लगते थे,अभी इसे देख कर ठीक वैसा-वैसा ही महसूस हो रहा है। सद्य: भ्रम हो रहा है जैसे मेरे गाँव के पछवारी टोले में आग लगी है और इसकी ऊँची चौड़ी लपटें आसमान की तरफ लपक रही हैं। हवा के साथ इससे उड़ कर कुकराहे (ख़ास छोटी चिनगारियाँ जो फूस में पलक झपकते ही सुलगा देती हैं) मेरे टोले,फिर पास के मंगरौनी-मंगर पट्टी गांँव की तरफ़ पहुँच सकती हैं। फिर उधर राँटी तक। ऐसे में माँ के हुक्म पर एक घड़ा पानी लिए फूस के अपने घर की बाहरी बरेड़ी पर ठीक बीच में बैठा हूँ। कब किस तरफ़ से उड़ कर कुकराहा आ जाये  जिसे तुरत बुझा सकूंँ। तीसरी-चौथी में पढ़ने वाले छात्र थे तब हम।
   मेरे देश से इतनी दूर जलता हुआ यह बाँगलादेश,आख़िर किस तरह अपने गाँव का टोला लग रहा है ?
                      🔥|🔥         
                    गंगेश गुंजन 
                #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, August 5, 2024

भवभूति विश्वास वाले लोग!

🛖

                  भवभूति-विश्वास का घर 
                                   °°
  डिजिटल युग में अनाज के गठ्ठरों की तरह रखी जा रही हैं किताबें,कभी बड़ी टंकियों में जमा पानी की तरह,कहीं अपने-अपने प्रकाशकों की साँठ गाँठ और प्रतीकों मेंं तैयार कूट पाण्डुलिपियों की फाइलें,रेत की मानिन्द ट्रकों में लादकर बहाये जा रहे हैं भाषा में- शब्द !
   साहित्य माफ़ियाओं के समय में गझिन राजनीति की छल-छल व्याख्याओं से इर्द-गिर्द घिरे हुए डगमग,बौद्धिक- --टापू-विचार भले ही अभी लेकिन फिर भी 
         ग़नीमत है !
भ्रम में हैं भवभूति-विश्वास वाले कलमकार !
                       ❄️
                 गंगेश गुंजन 
            #उवडे.१२.६.’२४.

Sunday, August 4, 2024

ग़ज़लनुमा : सबका ठौर ठिकाना था

🌼|
     सब का ठौर ठिकाना था
     कोई  इक बेगाना था।

     ऋतुएँ  भी वे रूठ गयीं 
     जिनका कुल अफ़साना था।

     कैसी मार वक़्त की थी
     किसका यह जुर्माना था।

     हमने तो समझा न कभी
     रिश्ता फ़क़त निभाना था।

     किसका था गुनाह वो फिर 
     सबब वही बतियाना था।

     क्यूँकर भला तवक़्को अब 
     याद  करें  याराना था।

     अकसर गुंजन भूल गये
     किसको क्या बतलाना था।
                    🌴🌴 
                 गंगेश गुंजन 
                     #उवडे.
                   ३१मई,'२४.

Thursday, August 1, 2024

लोकतंत्र का मण्डप !

🛖                  लोकतंत्र का मंडप !
  चीज़ें अपनी जगह हों तो अच्छी लगती हैं 
सबकुछ रखने का सलीक़ा है। 
बर्तन बर्तनों की जगह और अनाज 
अनाजों की तरह रखे हों।
किताबें किताबों की तरह रहें 
डिग्रियांँ भी उसी तरह,जिन्हें हैं।
सम्मान और प्रतीक चिह्न सब अपनी हैसियत और इज़्ज़त से घर में ऊँचे पर कहीं सजे रहें।
वृक्ष वनस्पतियाँ हवाओं की तरह रखी जाने वाली झूमती हुई हरियाली में। 
पक्षी को उनके स्वभाव और इच्छा के ही अनुरूप।
मवेशी को मवेशी के ही योग्य पाला जाना
ठीक होता है। और मनुष्य को बस्तियों घरों में मनुष्य की तरह रखा जाना चाहिए। 
   संसार तभी मुकम्मल घर होता है और व्यवस्थापक घर का रखवाला-
     सद्गृहस्थ कहलाता है।
                            . 
                       गंगेश गुंजन,
                  #उचितवक्ताडेस्क।
                        १०जून,’२४.

Sunday, July 28, 2024

ग़ज़लनुमा : यौन हुआ एक उम्र तक सहरा हुआ

❄️
  यौं हुआ एक उम्र भर सहरा हुआ 
  हक़ पे सब सुल्तान का पहरा हुआ।

  जंग अपनी जान पर हम कर गये
  जीत का किसको मगर सेहरा हुआ।

  लग रहा हर सिम्त सब चुपचाप हैं 
  रहनुमा अपना अलग बहरा हुआ।

  देखने से तो लगें सब हैं राह पर  
  मगर रस्ता ख़ुद कहीं ठहरा हुआ।

  कह दिया क्या सुबह ने आकर मुझे
  सामने सब कुछ लगे उजड़ा हुआ।

  यूंँ तो टुकड़े बादलों के मेघ में
  घर का सामाँ सब लगे बिखरा हुआ।

  आप भी तो सोचते कुछ कलमकार
  आपके लफ़्जों पे क्या ख़तरा हुआ।
                         ❄️   
                    गंगेश गुंजन 
        #उचितवक्ताडे.०७.फरवरी,’२४.

Thursday, July 25, 2024

ग़ज़लनुमा : होगी सहर उजाला होगा.

💥
       होगी सहर उजाला होगा 
   समय  जगाने वाला होगा।
 
      अपने भी घर होगा वो सब 
   सुबह सुबह मतवाला होगा।

       भूख लगे में रोटी चावल 
   का भर पूर निवाला होगा।

       महज़ धर्म की राजनीति पर  
   दूर नहीं दिन ताला होगा।

       गुंजन जी क्यों फ़िक्रमंद हों 
   दुःख का अब दीवाला होगा।
                     °°
               गंगेश गुंजन, 
                २७.५.’२४.

Wednesday, July 24, 2024

ग़ज़लनुमा : धुँधलका और बढ़ने दो ज़रा -सा

🌫️
     धुंधलका और  बढ़ने दो  ज़रा-सा
     मज़ा कुछ और बढ़ जाये मज़ा का।

     बहुत संकोच में लगता है दिनकर 
     महिन आँचल ओढ़े  कुहासा  का।

     सर्द से गर्म फिर ठंढी जुदाई
     बढ़ाए दर्द जिस्म-ओ-दिल का ख़ासा

     झाँकना यौं  दुबक  के सूरज का
     लगे बीमार को इक भरोसा-सा।

     एक मासूम हैरत आसमाँ पर
     दोपहर में सूरज है  दीया-सा।
                          °
     गंगेश गुंजन,०७.फ़रवरी,’२४.
         #उचितवक्ताडेस्क।

Sunday, July 21, 2024

ग़ज़लनुमा : कौन अपना दिखाई देता है

                  ❄️
  कौन अपना दिखाई देता है
  वही सपना दिखाई देता है।

  अभी अभी बैठा एक परिन्दा 
  डार कंँपना दिखाई देता है।

  छोड़ के जा रही है रेल कोई
  हाथ हिलना दिखाई देता है।

  भूल ही जाता माज़ी भी न क्यूँ
  कोई रोना सुनाई देता है।

  धूप से तप रही दुपहरी में 
  कौन जाता दिखाई देता है।
                  •
           गंगेश गुंजन 
             #उवडे.

Friday, July 19, 2024

ग़ज़लनुमा : रुआँसी मुस्कुराहट है

🌼              रुआंँसी मुस्कुराहट है !
     रुआंँसी मुस्कुराहट है
     कोइ अपशकुन आहट है।

     जमा हुए सब के सब मेहमान
     सबके सुल्तान की बुलाहट है।

     बाप की मैयत,जनाज़े की
     शादियों वाली सजावट है।

     महज़ चीजें नहीं,आदमी की
     ज़मीर में कहीं मिलावट है।

     असर उसूलों का हो कैसे 
     हुई जैसी इसमें गिरावट है।

     उनकी आवाज़ क्यूँ हुई ढीली
     इन्क़लाब में क्यूँ हकलाहट है।

     सभी उसूल तो हैं यों मुर्दा  
     और तेवर में गर्माहट है।
 
     कुछ हैं बीमार ही ज़्यादा बीमार
     डॉक्टर में भी घबराहट है।   
 
     जंग अंजामदेह हो ज़रूरी नहीं 
     अबके जीते में तिलमिलाहट है।
                          ❄️ 
                     गंगेश गुंजन 
                  #उचितवक्ताडे.

Thursday, July 18, 2024

एहतियात

💤💥               एहतियात  !
     
  एहतियातन अब छड़ी लेकर घूमने निकलता हूंँ लेकिन हर कदम मन में यह अंदेशा रहता है-कुत्ते के भय से आक्रान्त होकर अपनी सुरक्षा में मैं उसे इस भारी छड़ी से आघात ना कर डालूँ जिसका हत्था पीतल और पेंदी लोहे की है। 
क्योंकि ऐसा होना ना तो असंभव है और ना अस्वाभाविक।
   संचय और संग्रह भी आदमी कहने को तो भावी जीवन की सुरक्षा के एहतियात में ही आरम्भ करता है।
   क्या हो जाता है सो सभ्यता में युद्ध और शान्ति का इतिहास ही बतलाता है। एक सामाजिक व्यवस्था को वह कैसे और अहाँ तक ले जाता है ?
    एहतियात जरूरी और अच्छा है लेकिन ,
    एहतियात के साथ बरतने पर ही।
                           •• 
                      गंगेश गुंजन,
                   #उचितवक्ताडे.

Friday, July 12, 2024

दो पंतिया : तीन शे'र

                     °°
     बहर दुरुस्त बड़ा  मौजूं है 
     शायरी पस्त थकी हारी है।

     अजब सदी है बद्ज़ेह्नी तो
     चौदवीं इकिस्वीं प' भारी है।

     बिना ज़ेबर भी सुन्दर क़ाबिल 
     क्यूँकि लड़की सो बेचारी है।
                          •
                   गंगेश गुंजन  
                #उचितवक्ताडे.

Thursday, July 11, 2024

टूट-टूट रहे पुलों के बारे में

                        ⛈️
 हर रोज़ जिस सवाल से टकरा रहे थे हम 
 पाकर जवाब दोस्त का सिर थाम के बैठे।                             °° 
                    टूट रहे पुल !
 दिलचस्प है कि पुल का मज़ाक़ वे लोग भी उड़ा रहे हैं जो पुलों पर से पार होकर ही राजनीति से होते हुए कार्पोरेटी एन.जी. ओ.,लेकर साहित्य पत्रकारिता तक में इतने बड़े हुए हैं।
            बहुत ज़रूरी नोट कि :
विराट पुल निर्माण-घोटाले की तो भर्त्सना करता हूँ मैं।
                  गंगेश गुंजन 
                #उचितवक्ताडे.

Tuesday, July 9, 2024

उम्मीद: एक अमृत औषध

                          🌱  
  उम्मीद एक ऐसी दवा है जिसकी एक्स्पायरी 
  तारीख नहीं होती।इसीलिए आप पाते हैं कि
  अपने मन की बेहतर दुनिया बनने-बनाने 
  वाला मनुष्य का स्वप्न आज भी बचा हुआ,
  क़ायम है। वरना तो इतिहास कालचक्र के 
  लगातार इस दर्दनाक दौर में अबतक इसे मर 
  जाना चाहिए था।
                             🌱🌱
                    #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, July 8, 2024

ग़ज़लनुमा : कुछ गुज़रता है और कुछ...

                          ••
       कुछ गुज़रता है और कुछ गुज़ारते हैं 
       बोझ हम एकेक दिन यों उतारते हैं।

       किसी उन्माद ग्रस्त सियासत में अब
       एक दूजे की टोपी भर उछालते है।

     सामने अभीके प्रश्नोंका उमड़ा सैलाब 
     और वो हसरत से माज़ी निहारते हैं।

       नाम भूले हुए भी ज़माना गुज़रा 
     हुए जो तन्हा तो उसी को पुकारते हैं।

       आज तो देख-सुन के दिल में आया 
       चलें संसद भवन जा कर बुहारते हैं।
                             •
                      गंगेश गुंजन                                           #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, June 17, 2024

असली ज़्यादा ईद का चाँद

     नक़ली ज़्यादा कवि के चाँद !
     असल अवाम ईद का चाँद !                                         °                                                   गंगेश गुंजन        
                 #उचितवक्ताडे.

Sunday, June 16, 2024

काश! अफ़वाह ही उड़ा जाता कोई

                         काश !  
'शाम तक वर्षा होगी' अफ़वाह ही उड़ा देता यह कोई ! 
आख़िर इतनी अफ़वाहें तो बहती ही रहती हैं फेसबुक पर!
                          * 
                    गंगेश गुंजन।                                      #उचितवक्ताडेस्क।.

Tuesday, June 11, 2024

* जीनियस *

🔥।               जीनियस 
 किस दिन कितनी देर और कहांँ किस लिए उदास हुआ था,एक कवि इसको दिन,बेला, समय और तारीख़ समेत हू-ब-हू 
    याद रखता है।
    कवि,
    फोकट में जीनियस नहीं होता है।
                          ••
                   गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, June 7, 2024

दू पँतिया : चाकर जकाँ रहैए ओहो...

चाकर जकाँ रहैए ओहो,सबहक अपन -अपन मालिक छै। 
भ्रम छल हमरा नऽव युवक बड़ स्वाभिमानी होइत अछि।
                       • 
                गंगेश गुंजन 
            #उचितवक्ताडेस्क .

Thursday, June 6, 2024

पृथवी किताब नहीं

                   पृथवी
 पृथ्वी कोई किताब नहीं जिसका दूसरा संस्करण छाप लिया जाय।                                              • 
                 गंगेश गुंजन 
            #उचितवक्ताडेस्क।

बड़ा झूठ उससे भी बड़ा झूठ !

                      ||🌗||
  सामने के स्थापित झूठ से और बड़ा झूठ गढ़ने की होड़ मची है।इस राजनैतिक दौर में सबसे बड़ा झूठ स्थापित करने की प्रतिद्वंद्विता का विकट समय चल रहा है।टीवी,यूट्यूब चैनेल्स सहित तेज़ रफ़्तार फेसबुक-व्हाट्सएप इसके मुखर मंच हैं।
   सत्य निर्वासित है। और नेपथ्य में है।   
                    🌚🌱🌚
                   गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Wednesday, June 5, 2024

सोसायटी में वटवृक्ष पूजा: वीडियो

🌳🌳
.......अब इस दृश्य पर हम मुग्ध हों कि अपने-अपने सिर धुनें यह हम पर निर्भर है।
                        🌿🌿
(वीडियो: सोसायटी में वटवृक्ष पूजा।)                              गंगेश गुंजन 
                #उचितवक्ताडेस्क।

सबके सब गोदी के बच्चे !

🌒       
...इन दिनों ऐसा क्यों आभास हो रहा कि बच्चे सभी गोदी के ही हैं। सब के सब इस या उस गोदी के ही बच्चे लगते हैं।अपने पाँवों पर खड़े होकर चलता हुआ शायद ही कोई बच्चा दिखाई दे रहा है। 
  लेकिन तब ग़नीमत है कि समाज अब भी ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ विचारवान लोगों से बिल्कुल रिक्त नहीं हो गया है। 
                        ।💥।                                             गंगेश गुंजन 
                  #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, June 3, 2024

अवकाश पर फेसबुक !

।।        फेसबुक छुट्टी पर अवकाश        ।।
 आज तो फेसबुक छुट्टिये पर होगा काहे कि सब चुनाव परिणाम जिज्ञासु लोग उद्वेग में अपने आँख-कान और चित्त केन्द्रित किये हुए उपलब्ध मीडिया माध्यमके सम्मुख शुद्ध साधनाकी मुद्रा में बकोध्यानम् ही होंगे !
     हे लोकतंत्र! 
     सबको सबके मन का सुनाना।
     शुभकामना। शुभेच्छु -
                    गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Sunday, June 2, 2024

शुभशुभ कर जनहित में जारी : चार जून।

                     ⚡⚡
  फिलहाल तो देसी आकाश में दो सत्यों का ऐसा घटाटोप अंधकार घहराता हुआ पसर गया है कि अच्छी-अच्छी आँखों की ज्योति चुन्धियाई हुई है। पूरा फेसबुक, यूट्यूब चैनेल तो ब्याने से ठीक पहले वाली भैंसकी तरह लदबदाया हुआ है। 
   गणतंत्र ज्ञानियों की भविष्यवाणी है कि चार जून को सीधे बादल फटने वाला है। सो,
जनहित में ही यह सूचना यहांँ शुभ-शुभ कर जारी की जा रही है। इसमें कोई राजनीति नहीं है न यह किसी गोदी से दी जा रही है।                विशुद्ध जनतावादी है। 
                          🌊|🌊
    बहुत दिनों पर एक सत्य सचमुच घटित होने वाला है जिसकी शुभ तिथि -४ जून बताई जाती है। 
                      गंगेश गुंजन                                      #उवडे.२जून,'२४.

Saturday, June 1, 2024

अभागा समय है।

बहुत अभागा समय है यह।
अपने दुःख को हास्यास्पद बना रहा है।
                       📕                                                गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, May 30, 2024

एक अत्यावश्यक सूचना !

           एक अत्यावश्यक सूचना !
                         *
     अगले 4 जून तक देश का दिमाग़               स्थगित है।                
                        ! 😁!                                        सूचना जनहित में जारी।                                  गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।

निर्लिप्त सा झूठ

⚡⚡।    बहुत निर्लिप्त-सा
वह भी झूठ ही बोल रहा है
जिसके विरुद्ध,पूरी पेशेवर ताक़त से
किसी की वफ़ादारी में ही
तस्किरा कर रहा है।
बड़े शानदार अंदाज़ में अपने झूठ से
दूसरे सच का शिकार कर रहा है।
लैश हैं हमारे समय के कतिपय चिंतक, कवि-कलाकार और विचारक।
उतने ही निस्पृह लेकिन ये
साधारण जन भी हैं जो अपनी सरल स्वच्छ हृदयता के साथ, महज़ रखने के लिए
सत्य का मान रखते रहते हैं ।
अपने स्वजन का कहना मान कर सब सुनते हैं, और भरोसे से बरतते हैं।
प्रेरित हो जाते हैं और किसी तरफ धकेल दिए जाते हैं।
जिधर भी ठेल कर भेजे जाते हैं
उधर ही किन्हीं तिलिस्मी माहिरों के हाथों
सूर्यास्त तक ठगे जाते हैं।
दो तेवर-ओ-अंदाज़ में एक तरफ पहले और दूसरी तरफ दूसरे जुमले और भाषा में पगे जाते हैं ठगे जाते हैं।
अपनी-अपनी ताक़त लगाये,चल-चल कर अपने-अपने भरोसे पर जा मत्था टेकते हैं
अनगिन लोग !
       गणतन्त्र को फिर सिर नवाते हैं।
तो क्या सभ्य सुभ्यस्थों का महावन हो गया लोकतंत्र!
°°
कहाँ है वह महाद्वार जहाँ
कोई पहला सूर्योदय कब से न प्रतीक्षा में खड़ा है,हम जिसे सदी भर हसरतों से तकते हैं ! 
                               ••
                        गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Saturday, May 25, 2024

नगण्य गण्य नगण्य

आपके लिए जो व्यक्ति नगण्य है देशके संविधान में वह भी आपके बराबर ही गण्य है।फेसबुक .पर किसीको हेय समझने-कहने की असभ्यता करने से बचें। यह लोकतंत्र है।

                गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, May 24, 2024

ग़ज़लनुमा: हुस्न और इश्क तो बेआब हुए बैठे हैं

हुस्न और इश्क़ तो बेआब हुए बैठे हैं
अब भी शाइर वही आदाब लिए बैठे हैं।

हाथ होने थे नर्म फूल जो पसन्दीदे बदशकल बेरहम तेज़ाब लिए बैठे हैं।

हाय इस मौसम में भी बद्ज़ेह्नी छायी
ज़ौक़-ए-हथियार में रबाब लिए बैठे हैं।

हम भी किस बात पे यूंँ फ़िक्रज़दा हो बैठे
वो ख़ुश बहुत क्या नाया’ब लिये बैठे हैं।

मसअला नाज़ुक है और ये ऐसे ग़ाफ़िल
खौलते वक़्त में क्या ख़्वाब लिए बैठे हैं।

ज़ोर से जिनको आवाज़ ही उठानी थी
वही ज़ुबान तक जनाब सिये बैठे हैं।

बहुत नहीं भी पर वे सब जो अपने हैं
हाथ में शरारे बेताब लिए बैठे हैं।
                       •
           गंगेश गुंजन २०.५.'२४.

            #उचितवक्ताडेस्क।

Wednesday, May 22, 2024

ईश प्रार्थना !

🌾🌾           ईश प्रार्थना !
                           •• 

आप तो ईश्वर हो
बिना बिजली के रह सकते हो
हमें अंधेरे में बहुत डर लगता है
हम इन्सान हैं न।
अपनी विशाल सजावट को ज़रा कम करके थोड़ी बिजली हमारी बस्ती में भी नहीं भेज सकते ?
आप तो ख़ुदे दैवी आलोक से उद्भासित हैं।
   ईश्वर होकर इतना तो कर ही सकते हैं।
ठीक आपके पास में ही तो हैं हम।
कोई बहुत दूर भी नहीं है-
हमारी यह ग़रीब बस्ती। 
उम्र में बहुतेरे राजनेताओं की नानी-दादी से भी बड़ी है।
पिचहत्तर-अस्सी साल से यह भी अंधेरे में खड़ी है।
     अभी तनिक और डरी है।
                        ❄️
                   गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क.

Thursday, May 16, 2024

ग़ज़लनुमा : होगा कभी किसी दिन ज़िक्र...

❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️

    होगा कभी किसी दिन ज़िक्र ज़माने का
    पहला नाम आएगा इस दीवाने का।

    अभी किनारा कर ले कोई जो जितना
    कबतक नाम छुपेगा किस परवाने का।

    दुनियादारी सब दरकारों से बाहर
    किसे दर्द याराना वक़्त बिताने का।

    एक जन्म में ही लगता सबकुछ बासी
    कशिश नहीं कुछ कहीं करे जी जाने का।

    उलझे रिश्ते भी कितने सुन्दर थे, अब
    हुनर भूल बैठे हम दोस्त रिझाने का।

    मैंने क्या किसने सोचा होगा कल यह
    जो अंजाम हुआ ख़ुशहाल फ़साने का।

    कल तक था अपने लोगों का,अपना घर
    नयी सियासत में है गाँव सयाने का। 
                          ।📕।                                               गंगेश गुंजन 
                  #उचतवक्ताडेस्क.

Monday, May 13, 2024

दो पँतिया : जिस सफ़र की याद में

     जिस सफ़र की याद में मरते रहे 

     सुनोगे तो ज़िक्र से ही रो पड़ोगे।

🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂

                  गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Sunday, May 12, 2024

ग़ज़ल नुमा : सुख भी बोझल करता है...

🍂
      सुख भी बोझिल करता है
      मेरा  दिल  यह  कहता है।

      ग़ैर  नहीं  लगने   लगता   
      दुःख गर ज़्यादा टिकता है।

      जिसको भूल चुका हूँ मैं
      वह  मेरे  ग़म  सहता है।

      गरम लहू कुछ यादों का
      ठंढे  तन  में  बहता  है।

      रहते - रहते   सहरा  में
      मन भी रमने लगता  है।
                      •
               गंगेश गुंजन                                       #उचितवक्ताडेस्क।                                   रचना : १२.५.'२४.

निर्मम बेडौल सच...

🍂       ओ भाग्यशालिओ      !
    कितने ही लोग अभागे हैं। उनकी बदौलत ही आप भाग्यशाली बने हुए हैं।
  ऐसी समाज व्यवस्था का यह बेडौल  और निर्मम सच आपको
      भाग्यशालियो !
            समझना चाहिए।

                 ।🌾🛖🌾।                                         गंगेश गुंजन                                   #उचितवक्ताडेस्क।

दो पँतिया : कह रहे थे उम्र के वो आख़िरी लम्हे मुझे...

कह रहे थे उम्र के वो आख़िरी            लम्हे मुझे ।                                     और तो गुज़री भली ही इश्क़                थोड़ा कम किया ।

                   🌼🌼                                            गंगेश गुंजन                                   #उचितवक्ताडेस्क।

Saturday, May 11, 2024

दो पंतिया : आ गये अनगिन सड़क पर...

आ गये अनगिन सड़क पर और कुछ      अब मालदार।

बेबसी में तिलमिलाए सब सियासी          वफ़ादार । 

                 गंगेश गुंजन।                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, May 10, 2024

दो पंँतिया : रह लेते ज कर अब गुंजन।

                        |🌈     
        रह लेते जा कर अब गुंजन,  
    और कहीं तो अच्छा था.
बेसुकून वक़्तों में माँगे
         दिल अब कोई और दहर।
                          🌊
                      गंगेश गुंजन                                   #उचितवक्ताडेस्क.

Wednesday, May 8, 2024

ग़ज़ल नुमा : इसमें या उस दरिया जाय

                    🌓
      इसमें या उस दरिया  जाय
      किस दरिया जा डूबा जाय।

      एक तरफ़ अंधी धतकर्मी
      दूजा जिसको मन गरिआय।

      सन्तन को भी सत्य कहांँ अब
      झूठ-मूठ ही अधिक सुहाय।

      एक तो अर्जित भर वैभव
      दूजा सबकुछ रहा लुकाय।

      अचरज क्या अखबारों में
      दानवीर कल कथा छपाय।

      सब असनान बाथरूम में 
      को जा के गंगा में नहाय।

      क्या सूझै जब ख़ाली पेट
      किस बज़ार में करे उपाय।
                     🙊🙊
                 गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Tuesday, May 7, 2024

नैतिकता का हथियार और राजनीति

नैतिकता के हथियार से राजनीति की लड़ाई हास्यास्पद सोच है।

                         .🌓.                                               गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Sunday, May 5, 2024

किछु दु पंँतिया

                     । 📔।
      लाल कलम में कारी मोसि
      सावधान  किछु दुर्घट हयत।
                     •
  जहिए संँ लीख’ लगलै कवि लाल
कलम सँ कारी बात
  तहियेसँ जनता पर बढ़लै
केहने-केहने दन आघात।
                     •
     सब  दिन  क्यो सम्राटो  नहि
     सम्राजो सब एक दिन जाइछ।
                     •
              गंगेश गुंजन                          ‌        #उचितवक्ताडेस्क।

Saturday, May 4, 2024

घृणा : ईंधन

🔥।               नफ़रत : ईंधन .
  सृष्टि में अकार्यक शायद ही कुछ है यहाँ तक कि आदमी की नफ़रत।
जिस प्रकार मनुष्य की बिष्ठा से भी गैस,ऊर्जा तैयार की जा सकती है और रात भर उससे रौशनी के खम्भे में जलते हुए अंधेरी सड़कों पर प्रकाश फैलाया जा सकता है,जाड़ों मे तापने योग्य जलावन और खाना पकाने में ईंधन की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है तो इतनी विशाल घृणा को भी वाँछित ऊर्जा में परिवर्तित क्यों नहीं किया जा सकता। सकारात्मक बेहतर बहुत कुछ ? बजाय इसके कि सुबह से शाम,रात तक हम अपनी नफ़रतें व्यर्थ ही यहांँ-वहांँ जुगाली करते और थूकते फिरें ?
  बहुत कुछ नहीं भी हो यह फेसबुक किन्तु ख़ामख़्वाह कोई उग़ालदान भी नहीं है।ऐसे में भाषा भी तो प्रभावहीन होती जा रही है। सहलाये या आघात करे अपना काम तुरत करने पर ही भाषा भाषा है।
सिर्फ वर्तमान विद्यमान ढोना ही तो इसका काम नहीं।भविष्य ज़्यादा निर्भर है इसमें।

     स्वतंत्रता भी तो हम गूंगी नहीं- भाषा में पाते हैं।
                        🌿
                  गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, May 2, 2024

दो पँतिया : बहुत छोटा घर हमारा...

बहुत छोटा घर हमारा अभी तक        एकान्त था।                                      एक बच्चा आ गया यह घर                    बड़ा लगने लगा।         

                गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Wednesday, May 1, 2024

मज़दूर दिवस:

    ये ही काँधे हैं इन पर बैठा है सूरज 
    ये ही बाज़ू हैं सभी नक्शे बनाते हैं।                               💥                                         #उचितवक्ताडेस्क।                                  गंगेश गुंजन                                      मज़दूर दिवस।

Monday, April 29, 2024

ग़ज़ल नुमा : लोकतंत्र का महासमर है पहली बार..

                       🌻
    लोकतंत्रका महासमर है अबकी  बार
    कौन किधर है पता कहाँ है अबकी बार।

    पहले से ही 'जाति न पूछो साधू'-संकट
    ज़्यादा और धुआँ छाया है अबकी बार ।
   
    छुपे एजेंडे हैं तैयार प्रलोभन के
  दीन हीन दिग्भ्रमित बुद्धि,जन अबकी बार।

    विजय पताका सजे-धजे सब दोनों ओर
    दोनों तरफ़ हतप्रभ जनता अबकी बार।

    वोटतंत्र की लोकतंत्र की अबके जाँच
   धुंध दिमाग़ों वाली जनता अबकी बार ।

    चारो  तरफ  घुमड़ता मंज़र सोच में है
    बिखरी अपनीही पहचानें अबकी बार।

    रोटी-शिक्षा-स्वास्थ्य सड़क से भी ऊपर
    सब के आगे जात धरम है अबकी बार।

    सोच,सेहत से जाग्रत-मन लोगों के भी
    क्यूंँ विचार हैं कुंद वोट में अबकी बार।

    'पंचन की सब बात मेरे सिर-आँखिन पर,
     खूंँटा लेकिन इहैं गड़ी' है अबकी बार।

    चैनेल  हकलाये - बौराये - से अखबार
    दोहरे - तिहरे बोलों वाले  अबकी बार।
                          🌻
                     गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Tuesday, April 23, 2024

दो पँतिया : याराना तो रौशन मैंने ऋतुओं का ....

    याराना तो रौशन मैंने                              ऋतुओं का अलबेला देखा,
          जाती हुई सौंप कर अपना,                         सब अगली सखि को जाती है।                              🌸🌿                                           गंगेश गुंजन                                       #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, April 22, 2024

...दो पँतिया : जी हुज़ूर करते रहते हो

                         •                              वो तो ख़ैर लुभा जाता है महज़ खिलौने पर,बच्चा है,                                        तुम क्यों बड़े तोप बुधिजीवी,जी हज़ूर करते रहते हो? 

                    गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, April 19, 2024

पिता पुत्रक संदेशा-देशी

         पिता-पुत्रक संदेशा-संदेशी                                       । •।                          बेटा बड़ भावना सँ पिता लय विशेष प्रकार ओ विन्यासक कुल्फी लेने गेलाह। हाथ मे दैत कहलथिन -’ ई खास तरहक कुल्फी अछि पिताजी। भरिसक नै खेने हयब। हाले मे बजार मे अयलैए।’

स्वाभाविके जे पिता परम प्रसन्न होइत ग्रहण करैत फ्रिज मे रखबौलनि। गपशप परिवारी चर्चात्यादिक बाद बेटा आँफिस चलि गेलथिन।
बुढ़ा के कुल्फी मन पड़लनि। बुढ़ी के कहलनि ‘फ्रिज सँ दिअ तँ ओ कुल्फी।’ पत्नी तुरन्त थम्हौलथिन। पहिने तँ माटिक कनिये टा सुन्दर लोटकीक कुल्फी विन्यास भरि मन देखलनि। फेर सुआदि -सुआइद चम्मच सँ खाय लगलाह। मने मन दिव्य स्वादी विन्यासक प्रशंसा करैत पूरा तृप्त भ’ क’ समाप्त कयलनि।प्रशंसा आ उद्गार मे बिना एको रती बिलम्ब कयने बेटा कें व्हाट्सएप्प पर लिखलन्हि;
‘ई लोटकी कुल्फी तँ जुलुम स्वादिष्ट निकलल। वाह रे वाह। एकरा लोभे तँ रोज़ा राखल जा सकैए यौ।’
‘से तँ आब अगिले साल ने पिताजी !’ बेटा चोट्टहि कहलथिन।
ऐ बेर ई सीजनक तँ आब बीति गेल।’
बेटो तंँ हुनके, पिताक प्रशंसा संदेश मे असली निहितार्थ कें नीक जकाँ बुझैत त्वरित लीखि क’ पठौलनि। पढ़ि क’
पुरना मन पिताक मिज़ाज जकाँ मुंँह नै लटकनि।
‘से बड़ दिव मन पाड़लौं बेटा। मुदा एकर दोकानो आब अगिले सीज़न मे खुजतै की ?’ पिता पुत्र कें अओर त्वरित लीखि पठौलनि।
तुरन्ते हँसैत इमोजी वला संदेश पठबैत बेटा प्रणामी इमोजी सेहो पठौलथिन।
   किन्तु एहि प्रकरणक एक टा अओर पाठ सुनल गेलय।से ई जे- साँझ खन बेटा वैह ब्राण्ड दू टा कुल्फी लेने अयलखिन आ कहलखिन जे सोचै छी पिताजी जे दू टा क’ रोज़ अहाँ लय उठौना क’ दी। भोरे क’ द जाएल करत। पिता कें बिहुँसैत कहलथिन आ आगाँ ई जे ‘हमरा सब लेल परम हर्खक बात जे अहाँ कें पसिन्न पड़ल।ओना तँ किछुओ केहनो आनू तँ अहाँ के नहिएँ पसिन्न पड़ैत रहैए।’ फेर माय कें देखैत पुछलनि- ‘नै माँ ?’ माय समर्थनियांं बिहुँसलथिन।

‘हँ यौ। से अहाँ ठीके कहलौं।से हमर स्वभाव अछि।’ कहैत पिता लोटकी कुल्फी कें नेना जकाँ आतुर भ’ देखैत पुत्र के कहलनि- ‘परन्तु से एखन छोड़ू। कुल्फी अनेरे  पघिल क’ सेरा रहलय। पहिने ई लाउ।’
   पिता के कुल्फी दैत माय सङ्गे पुत्र हँसलाह। इति प्रकरणम्।
                    🌿😃🌿
              #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, April 18, 2024

मतदानी दोहा

लोकतंत्र कृशकाय है बलशाली       हनुमान,                                  

अपने मत का इसीलिए सदा रखें अभिमान ।                          •                                 गंगेश गुंजन 

              #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, April 12, 2024

ग़ज़ल नुमा : सुख की कुछ मत पूछा कर

                  °🌿°
     सुख की कुछ मत पूछा कर
     दु:ख भर मुझसे साझा कर।
                    °
     पूरा जाम मुझे मत दे
     इसमें आधा-आधा कर।
                    °
     क्यों चाहे दिल तू मुझ से
     पागल प्रेम ज़ियादा कर।
                    °
     राजनीति से बढ़-चढ़ कर
     ज़ेहन कहे तमाशा कर।
                    °  
     एक पराजय से बैठा 
     जय के पीछे भागा कर।
                    °
     है तो दे माँगे उसको
     लेकिन तू मत माँगा कर।
                    °
     सोये हैं थक कर बाबा
     नागा अब तू जागा कर।
                     ••
               गंगेश गुंजन                                       #उचितवक्ताडेस्क।

Sunday, April 7, 2024

गिरना - उठना

गिरने में कुछ वक़्त नहीं लगता। सम्हलने-उठने में कितनी देर और कोशिश लगती है !
                            ..
                     गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, March 29, 2024

अर्जेंट केजरीवाल यूट्यूब एंकर

   टीवी पर कोई कन्या एँकर कह रही थीं       अचानक सुना- 'अर्जेंट केजरीवाल पर         किसी ने नोटिस ही लिया।'
   अब मेरे कान भी धोखा देने लगे क्या ? 

                 गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, March 28, 2024

ग़ज़लनुमा सुबह सी आई है मुश्किल...

                         📕
सुबह-सी आयी है मुश्किल शाम जैसी चल गई
कुल मिलाकर ज़िन्दगी की रात यूँ
ही ढल गई।

चाँदनी और अमावस-से फ़ैसले
जिसने लिए
कुल मिलाकर सबको उसकी
आरज़ू ही छल गई।

बहुत छोटा ही सा घर था मगर
उसमें देखिए
कुल मिलाकर आठ दशकों
ज़िन्दगानी पल गई।

और दिन होता तो हम भी भूल ही
जाते मगर
कुल मिलाकर आज की तन्हाई
लेकिन खल गई।

हौसले तो पस्त थे किसने भी यह
सोचा था कि
कुल मिलाकर साँस आख़िर जा
रही समहल गई।
                             ••
                 #उचितवक्ताडेस्क।

Wednesday, March 27, 2024

सर्वोच्चता -ग्रन्थि !

🌈               सर्वोच्चता-ग्रंथि  !
  समाज के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को अपना होना कितना श्रेष्ठ होना चाहिए ? जबतक मनुष्य का यह मन मिज़ाज नहीं पहचाना जाता तब तक कोई भी समाज-व्यवस्था प्रति द्वन्द्विता मुक्त अतः निष्पक्ष नहीं बन सकती है। चाहे कोई भी अंश या पूर्ण पक्षधर सिद्धांत और व्यवहार हो,किसी चेतन जाग्रत मानव समाज में मुकम्मल और सर्वमान्य हो ही नहीं सकता। हरेक प्रत्यक्ष या परोक्ष संघर्ष यहीं पर है।
   सर्वश्रेष्ठता की अदम्य चाहत ही इच्छित मानवता के विकासकी सीमा है। और सो परम्परा की भाषा में बड़ी मायावी है।
                        📓                                              गंगेश गुंजन                                   #उचितवक्ताडेस्क।

दो पंँतिया

बहुत तपिश में लम्बा रस्ता दूर तलक छाया न जल,

बेपनाह प्यास में आये आँसू और    पसीना काम।

                 गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।

पाखण्ड

🌊                       

                    पाखण्ड !
चरित्र का सर्वोच्च अभिनय है- पाखण्ड।जीवन के नाटक में यह बुद्धि-चतुर व्यक्ति से ही सम्भव है। पाखण्ड सामूहिक शायद होता है। 
                         °°                                                गंगेश गुंजन 
                #उचितवक्ताडेस्क।

Tuesday, March 26, 2024

समय: एक दृश्याँकन : लैडस्केप

🌀            समय: एक दृश्याँकन
                             🌼
एक राजनीतिक पार्टी के बड़े नेता को भ्रष्टाचार के आरोपमें गिरफ़्तार किया जाता है।
प्रवक्ता कहते हैं - ‘अमुक भ्रष्ट सरकार ने हमारे महान् नेता को ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तार किया है।’
सरकारी प्रवक्ता अपनी शालीनता से इस आरोप को सिरे से ख़ारिज़ कर देते हैं।  
तीसरा पक्ष इसपर और भी उच्चस्वर में,और ताक़त के साथ,गिरफ़्तार पार्टी नेता के लिए सहमत- सहानुभूति में और भी तीखे विरोध का वक्तव्य जारी करता करता है।
  महानगरों में बाज़ाप्ता विचारक- बुद्धिजीवी गण निरन्तर लिख-बोल कर इस पर मौजूदा राजनीतिक विश्लेषण,समाजशास्त्रीय टिप्पणियाँ कर रहे हैं।
  साधारण जनता बेचारी सुन-सोच सोचकर विकट दुविधा में फँसी हुई है-
‘आख़िर इन में कौन ग़लत,और पाक -साफ़ कौन है ?
   और जो मॉल-मीडिया है,मोटा-                
मोटी अपना मस्त-तटस्थ
है                    ...

(यह ऊहापोह में पड़े साधारण जन के मौजूदा मानस की चर्चा भर है। कोई राजनीतिक टिप्पणी नहीं।)
                    गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, March 25, 2024

अब तक मुझे लगता था

🕊️🕊️
अभी हाल-हाल तक मैं अपना निजी दुख चुटकियों में दफ़्न कर लेता था।हाँ समूह, सामाजिक दुःख और समस्यायें अवश्य मेरे मानस को देरतक आन्दोलित रखती थीं जब तक किसी न किसी रूप में वह अभिव्यक्त न हो जाए। लेकिन इधर पाता हूंँ कि छोटा से छोटा निजी भी दुःख ज़ब्त करने में असमर्थ होने लगता हूँ।और ये अनुभव इतना उद्वेलित करता है कि अक्सर सहमा रहता हूंँ।
                    🌊
शीश से पैर तक वो धुंध में लिपटा लगा मुझे,
दिल्ली में भी अपने गाँव तक सिमटा लगा मुझे।
                   गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

मेरी मित्रता सूची

😆               मेरी मित्रता सूची
  मेरी मित्रता सूची पाँच हजार में तीन-चार कम तो कब न हो चुकी। पूरे पाँच हज़ार मैंने होने ही नहीं दिया है। ये तीन-चार मैंने बुद्धिमानी से रिक्त रख छोड़े हैं। यह सोच कर कि क्या पता कभी प्रधान मंत्रीजी का ही मैत्री-प्रस्ताव आ जाय तब क्या करूँगा ? अथवा रूस के राष्ट्रपति अमरीका के राष्ट्रपति का ? क्योंकि इस कारण पहले के किसी मित्र को अमित्र तो नहीं कर सकता
।वैसे सुनते हैं कि कुछ लेखकों को सौभाग्यवश यदि किसी बड़े लेखक का मैत्री-प्रस्ताव आ जाता है तो ऐसी परिस्थिति में वे विद्यमान मित्र सूची में अनुपातत: छोटे और अनुपयोगी लेखक को आकंठ भरी हुई अपनी मित्रता सूची से निकाल कर बड़े के लिए आदर पूर्वक आसन ख़ाली कर देते हैं। बिठा लेते हैं। 
                    गंगेश गुंजन                                   #उचितवक्ता होली डेस्क।

Friday, March 22, 2024

झूठ का लोकतान्त्रिक नागरिक अधिकार

                        •                           ‌झूठ को सच होने का नागरिक अधिकार प्राप्त है कि नहीं ? विश्व के समुन्नत लोकतंत्र क्या कहते हैं?

(एक दिग्भ्रान्त साधारण जनकी जिज्ञासा है यह।) 

                गंगेश गुंजन                                         #उ.व.डे.

Thursday, March 21, 2024

होने में

°°              होने में
होना ही पर्याप्त नहीं होता। राजनेता और विचारक ही नहीं,कितने कवि तक को जाग्रत और क्रान्तदर्शी लगने के लिए दिखते भी रहना पड़ता है- अनवरत।सामाजिक चेतना और परिवर्तन कामी मन मिज़ाज और जुझारूपन के कुछेक आक्रोश उद्घोष के शब्दों का बार-बार प्रयोग करते रहना पड़ता है।मंचों पर दुहरानी पड़ती हैं - परिवर्तन के लिए सामाजिक प्रतिबद्धताएँ। बाँधकर दिखानी ही पड़ती हैं-सामूहिक मुठ्ठियाँ लाल-लाल आँखें।                                                🔥
                 गंगेश गुंजन।                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, March 18, 2024

कुछ अच्छे और आवश्यक कवि !

📔।        अच्छे और आवश्यक कवि !

   कुछ बहुत अच्छे और आवश्यक कवि भी अब निजी आक्रोश और प्रतिशोध की कविताएंँ लिखने और मज़े लेते हुए लगते हैं।
आख़िर ये इस पर क्यों उतर आये हैं ?         
                 गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Sunday, March 17, 2024

ख़ुद्दारी

ख़ुद्दार इन्सान का कोई भगवान भी
नहीं होता है।
                      •
              गंगेश गुंजन                                   #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, March 14, 2024

ग़ज़लनुमा : गिना चुना अफ़साना लिख

📔
    गिना चुना अफ़साना लिख
    जो भी लिख पैमाना लिख।

    हो जिसका लिखना खेला
    तू साहित्य निभाना लिख।

    शम्मा पर कहने में शे-ए-र
    पागल इक परवाना दिख।

    जीवन की लिख रहा किताब
    सफ़ा सफ़ा वीराना लिख।
                        
    भटकी हुई सियासत को
    जन-मन से बेगाना लिख।

    सेठों को लिख मस्ताना
    शायर को दीवाना लिख।

    लोगों ने ठुकराया है
    तू लेकिन अपनाना लिख।

    यह धुंधला मैला तो है
    कल का समय सुहाना लिख।

     गु़रबत लिख हथियारे जंग
     कल को नया ज़माना लिख।                                       । 📔।                                           गंगेश गुंजन                                          रचना:                                          १२/१३मार्च,२०२४.

                 #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, March 11, 2024

एक दो पँतिया

एक जुगनू दिखा अमावस की आधी रात

हुआ एहसास उम्रकै़द में सच ज़िन्दा है।

              गंगेश गुंजन                                  #उचितवक्ताडेस्क।

Wednesday, March 6, 2024

काल काल के कवि !

📔          काल-काल के कवि !
                            •
  हम उस काल के रचनाकार हैं जब हमारा कवि होना पाठक, श्रोता समाज तय करता था। हमें ख़ुद को कवि साबित नहीं करना पड़ता था। कवि होने का कोई प्रबन्ध नहीं करना पड़ता था। वह कार्य हमारी रचना करती थी। सम्पादक समाज ही हमें कवि-लेखक की यथोचित मान्यता और स्वीकृति दे कर महिमा से मंडित करता था।मान्यता के लिए अनियंत्रित उतावलापन नहीं था। किसी किसी भी यश या मान्यता के याचक शायद ही होते थे।
  आजकल समाज की यह भूमिका भी स्वयं कवि ने ही उठा रक्खी है। फेसबुक समेत तमाम डिजिटल सामाजिक माध्यम के अभिमंच की बहती गंगा ने इसे और भी सरल सुलभ कर दिया है।सम्प्रति रचनाकार स्वयं सिद्ध हो रहे हैं।
  अधिकतर कवि अपने आभामंडल स्वयं निर्मित करते रहते हैं।                                                      📒                                               गंगेश गुंजन                                    उचितवक्ताडेस्क।

एक दू पँतिया

बहुत उदास भी मौसम में फूल खिलते हैं
नहीं मिली ज़मीं तो आसमां से मिलते हैं।
                      🕊️
                गंगेश गुंजन।                                 #उचितवक्ताडेस्क।६.३.'२४.

Tuesday, March 5, 2024

असली नक़ली प्रगतिशीलता

क्षेत्र कोई भी हो,लिखी,पढ़ी और फेसबुक पर समझी जा रही सारी प्रगतिशीलता असली नहीं। इनमें ज्य़ादा तो नक़ली हैं।                               •                                                   गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Wednesday, February 28, 2024

दुर्लभ संजीवनी दृश्य : दादी-पोती।

                दादी - पोती                                               🌼|                             ऐसे दुर्लभ संजीवनी-दृश्य और इस महाकाल में? केवल पार्क में ही मिलेंगे आपको। टहलने के लिए ही सही,जरूर निकला करिए।

...अवश्य ही एक पोती अपनी दादी को सहारा दिए सैर करा रही है ! 
             जीयो बिटिया !
                     🌳 

(पार्क में की एक फोटो जिसमें पोती बहुत वृद्ध दादी को सैर करा रही है)

               गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, February 23, 2024

तीन दो पँतिया

                     🌒
दुखियों का दरबार लगाना आता है
वैभव  का  अम्बार  दिखाना आता है।

सुने किसी की वो कुछ नहीं उसे भाये
उसे फ़क़त अपना फ़र्माना आता है।

फुंसी भर मुश्किल को कर दे घाव बड़ा
फिर उसको कैंसर कर देना आता है।
                 🌈|🌈
         #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, February 22, 2024

उजला हुआ कवि

 विकट काले समय पर
  लाल क़दमों से चलता गया कवि !
                      उजला हुआ कवि।
                          🌄

 (मैथिलीमे एक टा बहुत पहिनेक फेबु पोस्ट।)
                     गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

                     २३.०२.'२४.

Monday, February 19, 2024

दो पंँतिया: याद कभी मुझको भी कर लोगे..

  याद कभी मुझको भी कर लोगे                  तो कितना ख़र्चा होगा, 
  एक ग़रीब का जी जुड़ाएगा                      और तुम्हें भी दुआ लगेगी। 
            गंगेश गुंजन                                   #उचितवक्ताडेस्क।

Sunday, February 18, 2024

फेसबुक पर लोग सब

     📕🌿      फेसबुक पर लोग सब !
फेसबुक पर कुछ लोग छींकते हैं
कुछ लोग खाँसते हैं
कुछ लोग हँसते हैं
कुछ लोग बोलते हैं
कुछ लोग चीख़ते हैं
कुछ लोग गाते हैं।
कुछ रोते-कलपते हैं
कुछ लिखते-पढ़ते हैं
कुछ लोग अपना स्वास्थ्य बुलेटिन होते हैं तो कुछ लोग अपनी उपलब्धियों का कैलेन्डर होते हैं।
कुछ लोग अपना सफ़रनामा पढ़वाते हैं,
कुछ अपनी दिनचर्या बतलाते हैं
कुछ लोग अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों का नगाड़ा बजाते हैं
कुछ कथित तथाकथित परिवर्तन के नारे लगाते हैं।
कुछ किन्हीं का स्तवन लिखते हैं
कुछ उनकी भर्त्सना करते हैं
कुछ उपदेश देते हैं
कुछ उपदेश लेते हैं
फेसबुक पर कुछ लोग वैद्य भी होते हैं
वैसे ही कुछ लोग हकीम होते हैं,जैसे कुछ लोग बड़े-छोटे अस्पतालों के डाक्टर होते हैं।
कुछ लोग विशेषज्ञ होते हैं
कुछ विशेषज्ञों के भी विशेषज्ञ होते हैं।
कुछ लोग सहानुभूति-भिक्षुक होते हैं
कुछ लोग शुभाकाँक्षा के थोक वितरक होते हैं
फेसबुक पर कुछ लोग लेखक-कवि होते हैं
कुछ लोग, कवि-लेखक होने वाले होते हैं

फेसबुक पर सब लोग इतने अपने होते हैं कि सबलोग सबलोग की दैनिक बाट जोहते हैं।
फेसबुक पर कुछ लोग गांँव कुछ नगर होते हैं
कुछ दालान और नगरों के ड्राइंग रूमों में अकेले बैठे बुजुर्ग से खाँसते बोलते हैं
वे कुछ लोग बुरे मौसम में बच्च़ों को घर से बाहर नहीं निकलने की हिदायत देते रहते हैं।
फेसबुक पर जवान होते हुए किशोर उनसे चिढ़ते रहते हैं।
और तो और,कुछ लोग इस पर कुछ भी लिखे हुए को कविता ही समझ लेते हैं।

फेसबुक पर कुछ लोग इतना अच्छा लिखते हैं कि वह अच्छा कुछ लोग,दिल से पढ़ते हैं।
कुछ लोग तो इतना सुन्दर लिखते हैं कि कुछ लोग उनके लिखने का                   इन्तज़ार करते रहते हैं।                                               ।📕।

                  गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।

Saturday, February 10, 2024

दो पँतिया : धोखे भी शामिल हैं यहाँ...

धोखे भी हैं शामिल यहांँ जीने के हुनर में

जीना है अगर ख़ास कर के मेट्रो नगर में।

                      । 🌒।                                            गंगेश गुंजन                                  #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, February 8, 2024

दिल्ली पुस्तक मेला १०-१८.२.'२४.

पुस्तक मेला

    (१०फरवरीसे१८फरवरी-’२४ई.)

आगामी विश्व पुस्तक मेला,कवि-लेखकों की आने वाली पुस्तकों और प्रकाशनों पर( की खुशामद करती हुई सी)दनादन फेसबुक प्रदर्शित टिप्पणियांँ की बारिश में भीगते पढ़ते हुए मुझे तो लगता है बहुत से लेखकों को पुस्तक मेला जाने में भारी र्अहिचकिचाहट भी होगी। जिन लेखक कवियों की कोई भी पुस्तक, किसी भी प्रकाशन के किसी भी स्टॉल पर प्रदर्शित नहीं दिखने वाली है वे अपनी निरीहता तुच्छता की ग्रंथि से पीड़ित भी हो सकते हैं। जब उनकी किताब ही नहीं छपी है तो वे कहाँ के लेखक,कैसा प्रकाशन और किन महाभागों के कर कमलों से भव्य विमोचन ?उसके समाचार ! सो मुझे तो ज़बरदस्त आशंका है कि इस संकोच और ग्रंथि में बहुत सारे लेखक कवि कहीं पुस्तक मेला जाने से ही न परहेज़ कर लें।

  विज्ञापन विस्फोट का यह परिदृश्य इस दफ़े कुछ और नया है। इधर हर बार यह प्रवृत्ति कुछ और बढ़-चढ़ कर विस्तार से बाजार होती और करती हुई दिखाई देती है। 

     बहरहाल मैं तो जाऊँगा क्योंकि आजतक किसी पुस्तक मेले के मौक़े पर मेरी कोई पुस्तक छप कर आयी ही नहीं। 

मुझे तो उसका स्वाद भी पता नहीं है।😆।

   लेकिन जाऊंँगा ही इसका इससे भी बड़ा और कारण है। वह यह है कि एक समय में एक स्थान पर इकट्ठे इतनी गुणवत्ता,संख्या और मात्रा में पुस्तकें और अध्ययन अध्यापन संबंधी सामग्रीकोसद्य: देख पाना क्या सबको नसीब हो जाता है ? कितने भी प्राचीन और बड़े पुस्तकालय में चले जायें तो भी ?

  तो अगर ऐसा अवसर आ रहा है तो उसे कैसे ज़ाया कैसे होने दूंँगा। इतनी पुस्तकें एक साथ देखकर आंँखों को बहुत दिनों के लिए तृप्ति और राहत मिल जाती है।

     और वे वरिष्ठ-कनिष्ठ आत्मीय प्रिय साहित्यकार साथी जिनसे,एक ही शहर में रहते हुए भी कितने कितने दिनों तक नहीं मिल पाते उनसे भी भेंट होने का सम्भव आनन्द ! यह आशा तो और विशेष है।

   मिलते हैं ।आते हैं । शुभकामना।          📕📕📕📕📕📕📕📕📕📕📕📕

                 गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Tuesday, February 6, 2024

दो पंँतिया : इस अलाव में ताब नहीं अब...

  इस अलाव में ताब नहीं अब
  सभी शरारे बुझे लग रहे।
  और सर्द होते मौसम में थर-थर               क़लम तो और अशुभ है।                                     🔥|🔥                                           गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।

दो पँतिया : देवता सब पुराने हो गये हैं

                    📔

      देवता सब पुराने हो गए  हैं

      आदमी अब सयाने हो गए हैं।

                 गंगेश गुंजन                                   #उचितवक्ताडेस्क।

Saturday, February 3, 2024

दो पंँतिया : मक़बूल तो इस दौर में कुछ

मक़बूल तो इस दौर में कुछ भी          कहाँ रहा,                                       इक शाइरी पे नाज़ था सो जा             रही बाज़ार।                                                         🌊🌊                                            गंगेश गुंजन।                                 #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, February 2, 2024

श्रेष्ठता के पैमाने

📕            श्रेष्ठता के पैमाने 
  सभी श्रेष्ठता अपनी वास्तविक गुणवत्ता पर ही टिकी हो यह ज़रूरी नहीं है। साहित्य में तो और भी नहीं। यहांँ तो और बहुत सूक्ष्म,  कूटनीतिक स्तर तक बौद्धिक कुशलता से संस्थापित होते हैं। अधिकतर ऊंँचाई और श्रेष्ठता भी अक्सर,संगठनात्मक प्रक्षेपण और प्रायोजित होती हैं। कभी विचारधारा, कभी पारस्परिक स्वार्थ और प्रवृत्ति मूलक लाभकारी योजना में। वैसे दुर्भाग्य से ऐसी तुच्छताओं के संकीर्ण संगठन साहित्य कलाएंँ और प्रबौद्धिक समाजों में अधिक ही सक्रिय रहते हैं। इनके कारण प्रतिगामी विचार और कार्य को अदृश्य और बहुत सूक्ष्म रूप में पर्याप्त ताक़त मिलती रहती है। दिलचस्प कहें या दोहरा दुर्भाग्य यह है कि मीडिया-माध्यमों में ये ही वर्ग,साहित्य की मशाल होने का भी दम भरते दृष्टिगोचर होते हैं।
  इनके पीछे अति महत्वाकांँक्षी नवसिखुओं की शोभायात्रा भी चलने लगती है।
   आप माने रह सकते हैं :
   अपवाद का तिनका !
                               💥                                                गंगेश गुंजन 
                    #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, January 26, 2024

ग़ज़लनुमा : यादों से पहले माज़ी का मंज़र

                    🌼

यादों से  पहले माज़ी का मंज़र था
बाद नदी के आगे एक समन्दर था।

सजी धजी मीना बाज़ार व' मोहतरमा
और सामने कोई खड़ा क़लन्दर था।

अभी-अभी तो नेता की मजलिस छूटी
और अभी ही भड़का कोई बवंडर था।

अबके भी बादल बरसे बिन लौट गये
धरती  के आगे  शर्मिन्दा अम्बर था।

अन्देशे हर सू क्या अनहोनी हो जाए
ऐसे में इक फ़ोन अजाना नंबर था।
                          ••
                    गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Tuesday, January 23, 2024

शे-एर नुमा : सिमट कर रह गया लगता है

सिमट कर धँस गया लगता है जीवन ही सियासत में 

अभी तो गीत गाना इश्क़ होना,चाय भी  सियासत है।

                    ••                                             गंगेश गुंजन                                  #उचितवक्ताडेस्क।

Monday, January 22, 2024

चित्त इतना क्यों है उद्विग्न आज?

      किस अज्ञात बेचैनी से चित्त                       बहुत उद्विग्न है आज।

                     गंगेश गुंजन                                          २२.०१.'२४

Friday, January 19, 2024

मेघाच्छन्न प्रतिबद्धताओं में

💨         मेघाच्छन्न प्रतिबद्धताओं में 

     लिख पढ़ की दृष्टि से प्रतिबद्ध
रचनाकारों का अभी अकाल काल चल रहा लगता है। सच और यथार्थ तो फिलहाल दलीय राजनीतिक सत्ताओं के मीडियाओं की लुक्का छिप्पी भर बन गया है। सार्वजनिक जीवनके सभी यथार्थ किसी न किसी राजनीतिक सत्ता की ही उपज भर प्रचारित होने रहने के कारण अपने-अपने सकल प्रतिबद्ध अपनी ज़िद से ही तमाम चैनेलों पर पक्षीय यथार्थ गढ़ कर सेवायें दे रहे हैं।काम चला रहे हैं।ऐसा सिर्फ़ साहित्य में ही नहीं, प्रखर उग्र पत्रकारिता में भी आम लगता है। साधारण जन के लिए तो यह और खतरनाक है।आख़िर उनका भी तो कोई अपना पक्ष है। इस घटाटोप को वे क्या समझें और करें ? किस तरफ देखें,जायँ।
  जाने किनके पास अपना अपना कैसा विश्वस्त सूचना-तंत्र है कि वे भरदेशी समाज राजनैतिक सच्चाइयों को आर-पार देख परख लेते हैं,समझ लेते हैं और मन मुताबिक़ कहने के लिए सान्ध्य सत्यों की भी बारात भी सजा लेते हैं। आश्चर्य होता है।
साधारण जन और सिर्फ़ लेखक इसमें बौआ जाता है। भटक जाता है।उसमें तो
किंकर्तव्यविमूढ़ता की परिस्थिति व्याप्त है।
    पत्रकारिता तो ख़ैर रोज़मर्रे की खेती है लेकिन इस घनी अनिश्चितता के दौर में कुछ दिनों तक कविता लिखना स्थगित नहीं रखा जा सकता ? मैंने तो सोचा है।
               #उचितवक्ताडेस्क।