🌖 समाज में कोई तीसरा नव यथार्थ
🌀
अच्छे-अच्छे लोग भी इस परिस्थिति को समझ नहीं पा रहे हैं या अपनी पूर्वग्रही अकड़ में आँखें बन्द किए हुए हैं ? जन जीवन असमानता की एक नयी तबाही की जटिल दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है ।
आज के लोकतंत्र को नया पाठ तो
दरकार नहीं ?
🌾
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क। १८.०४.'२२.
Tuesday, December 10, 2024
समाज में एक तीसरा नव यथार्थ !
Sunday, December 8, 2024
'चाँद निकलेगा मगर हम न उधर देखेंगे '
Friday, December 6, 2024
झूठ: एक उत्पाद !
Tuesday, December 3, 2024
'शब्दकोश : अभी बचा है एक चरित्र धान !
Thursday, November 28, 2024
एक दो पँतिया
Sunday, November 24, 2024
रिश्तों के ड्राइंग रूम में
🍂 रिश्तों के ड्राइंग रूम में !
रिश्तों के ड्राइंग रूम में तभी तक रहें जब तक कि बजते-बोलते-साज़ या कम से कम गाते हुए ट्रांजिस्टर रेडियो लगें कि कोई पुराना ग्रामोफोन सेट। कोई एक चीज़ बन कर बिना स्पर्श किए जाते हुए-बेआवाज़ बने कभी ना टिकें।
जिस पल ऐसा लग जाय शानदार ढंग से रुख़्सत हो लें।
🍁 गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
Thursday, November 14, 2024
छुड़कुल्ला बनाम शगूफ़ा।
मैथिलीक ‘छुड़कुल्ला’ संँ बेसी ललित आ व्यञ्जनाक शब्द ‘शिगूफ़ा’ छैक? कहै जाउ तँ। तथापि,
अपने ध्यान देबै जे प्रसंग अयला पर कय गोटय मातृभाषा प्रहरी लोक सेहो ‘शगूफ़े लिखता / लिखती, ‘छुड़कुल्ला’ नहिं।
एक दिन एही बाटे नीक संँ नीक भाषाक रस सौरभ सुखा क’ सिठ्ठी भ’ जाइ छै। 🌺!🌺 गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडे.
Sunday, November 10, 2024
..पहिने अपन हयब साबित कर' पड़ैत छैक
Wednesday, October 30, 2024
इस दीपावली पर : एक दू पँतिया
Sunday, October 27, 2024
कविता की बुद्धिजीविता...
Tuesday, October 22, 2024
अतीत से प्यार
Monday, October 14, 2024
मेरे समकालीन रचनाकारो !
दो : दोपंतिया
|🌫️|
लौटना बढ़ने से आगे बहुत था आसान लेकिन बन्द गलियों के शहर में लौट कर हम कहाँ जाते। (२). उम्मीदकी दीवार का प्लास्टर उतर रहा अब झलकने लग पड़े कंकाल ईंटों की दरारों से।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडे. (फेसबुक पर १३.१०.'२४
Friday, September 20, 2024
दो पँतिया :
Monday, September 16, 2024
'....नाराज़ हैं आसानियाँ ! ' (दो पँतिया)
ख़ुशफ़हमी के इलाक़े
Friday, September 13, 2024
विचार -पंथ कारवाँ में
Wednesday, September 11, 2024
दो पँतिया : किसी के चाहने न घाहने से.
Monday, September 2, 2024
ग़ज़लनुमा : दिल कुछ ऐसा अफ़साना लिख
ग़ज़लनुमा : दिल कुछ ऐसा अफसाना लिख
Saturday, August 31, 2024
फेसबुक पर कविता !
Thursday, August 29, 2024
हम सहरसा छी !
Monday, August 26, 2024
ख़ामोशी से डर लगता है : ग़ज़लनुमा
Sunday, August 25, 2024
प्रोफ़ेसर कर्मेंदु शिशिर : जन्मदिन बधाई !
Saturday, August 24, 2024
नहिं रहैत छैक कोय तँ...
Sunday, August 18, 2024
दो पँतिया : दो ऐबों ने मुझको आख़िर...
Thursday, August 15, 2024
ग़ज़लनुमा : उस बार किससे साविक़ा पड़ा था मेरा...
Friday, August 9, 2024
बाँग्लादेश है या मेरा गाँव है धधकता हुआ!
Monday, August 5, 2024
भवभूति विश्वास वाले लोग!
Sunday, August 4, 2024
ग़ज़लनुमा : सबका ठौर ठिकाना था
Thursday, August 1, 2024
लोकतंत्र का मण्डप !
Sunday, July 28, 2024
ग़ज़लनुमा : यौन हुआ एक उम्र तक सहरा हुआ
Thursday, July 25, 2024
ग़ज़लनुमा : होगी सहर उजाला होगा.
Wednesday, July 24, 2024
ग़ज़लनुमा : धुँधलका और बढ़ने दो ज़रा -सा
Sunday, July 21, 2024
ग़ज़लनुमा : कौन अपना दिखाई देता है
Friday, July 19, 2024
ग़ज़लनुमा : रुआँसी मुस्कुराहट है
Thursday, July 18, 2024
एहतियात
Friday, July 12, 2024
दो पंतिया : तीन शे'र
Thursday, July 11, 2024
टूट-टूट रहे पुलों के बारे में
Tuesday, July 9, 2024
उम्मीद: एक अमृत औषध
Monday, July 8, 2024
ग़ज़लनुमा : कुछ गुज़रता है और कुछ...
Monday, June 17, 2024
असली ज़्यादा ईद का चाँद
Sunday, June 16, 2024
काश! अफ़वाह ही उड़ा जाता कोई
Tuesday, June 11, 2024
* जीनियस *
Friday, June 7, 2024
दू पँतिया : चाकर जकाँ रहैए ओहो...
Thursday, June 6, 2024
पृथवी किताब नहीं
बड़ा झूठ उससे भी बड़ा झूठ !
Wednesday, June 5, 2024
सोसायटी में वटवृक्ष पूजा: वीडियो
सबके सब गोदी के बच्चे !
Monday, June 3, 2024
अवकाश पर फेसबुक !
Sunday, June 2, 2024
शुभशुभ कर जनहित में जारी : चार जून।
Saturday, June 1, 2024
अभागा समय है।
Thursday, May 30, 2024
एक अत्यावश्यक सूचना !
निर्लिप्त सा झूठ
⚡⚡। बहुत निर्लिप्त-सा
वह भी झूठ ही बोल रहा है
जिसके विरुद्ध,पूरी पेशेवर ताक़त से
किसी की वफ़ादारी में ही
तस्किरा कर रहा है।
बड़े शानदार अंदाज़ में अपने झूठ से
दूसरे सच का शिकार कर रहा है।
लैश हैं हमारे समय के कतिपय चिंतक, कवि-कलाकार और विचारक।
उतने ही निस्पृह लेकिन ये
साधारण जन भी हैं जो अपनी सरल स्वच्छ हृदयता के साथ, महज़ रखने के लिए
सत्य का मान रखते रहते हैं ।
अपने स्वजन का कहना मान कर सब सुनते हैं, और भरोसे से बरतते हैं।
प्रेरित हो जाते हैं और किसी तरफ धकेल दिए जाते हैं।
जिधर भी ठेल कर भेजे जाते हैं
उधर ही किन्हीं तिलिस्मी माहिरों के हाथों
सूर्यास्त तक ठगे जाते हैं।
दो तेवर-ओ-अंदाज़ में एक तरफ पहले और दूसरी तरफ दूसरे जुमले और भाषा में पगे जाते हैं ठगे जाते हैं।
अपनी-अपनी ताक़त लगाये,चल-चल कर अपने-अपने भरोसे पर जा मत्था टेकते हैं
अनगिन लोग !
गणतन्त्र को फिर सिर नवाते हैं।
तो क्या सभ्य सुभ्यस्थों का महावन हो गया लोकतंत्र!
°°
कहाँ है वह महाद्वार जहाँ
कोई पहला सूर्योदय कब से न प्रतीक्षा में खड़ा है,हम जिसे सदी भर हसरतों से तकते हैं !
••
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Saturday, May 25, 2024
नगण्य गण्य नगण्य
आपके लिए जो व्यक्ति नगण्य है देशके संविधान में वह भी आपके बराबर ही गण्य है।फेसबुक .पर किसीको हेय समझने-कहने की असभ्यता करने से बचें। यह लोकतंत्र है।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Friday, May 24, 2024
ग़ज़लनुमा: हुस्न और इश्क तो बेआब हुए बैठे हैं
हुस्न और इश्क़ तो बेआब हुए बैठे हैं
अब भी शाइर वही आदाब लिए बैठे हैं।
हाथ होने थे नर्म फूल जो पसन्दीदे बदशकल बेरहम तेज़ाब लिए बैठे हैं।
हाय इस मौसम में भी बद्ज़ेह्नी छायी
ज़ौक़-ए-हथियार में रबाब लिए बैठे हैं।
हम भी किस बात पे यूंँ फ़िक्रज़दा हो बैठे
वो ख़ुश बहुत क्या नाया’ब लिये बैठे हैं।
मसअला नाज़ुक है और ये ऐसे ग़ाफ़िल
खौलते वक़्त में क्या ख़्वाब लिए बैठे हैं।
ज़ोर से जिनको आवाज़ ही उठानी थी
वही ज़ुबान तक जनाब सिये बैठे हैं।
बहुत नहीं भी पर वे सब जो अपने हैं
हाथ में शरारे बेताब लिए बैठे हैं।
•
गंगेश गुंजन २०.५.'२४.
#उचितवक्ताडेस्क।
Wednesday, May 22, 2024
ईश प्रार्थना !
🌾🌾 ईश प्रार्थना !
••
आप तो ईश्वर हो
बिना बिजली के रह सकते हो
हमें अंधेरे में बहुत डर लगता है
हम इन्सान हैं न।
अपनी विशाल सजावट को ज़रा कम करके थोड़ी बिजली हमारी बस्ती में भी नहीं भेज सकते ?
आप तो ख़ुदे दैवी आलोक से उद्भासित हैं।
ईश्वर होकर इतना तो कर ही सकते हैं।
ठीक आपके पास में ही तो हैं हम।
कोई बहुत दूर भी नहीं है-
हमारी यह ग़रीब बस्ती।
उम्र में बहुतेरे राजनेताओं की नानी-दादी से भी बड़ी है।
पिचहत्तर-अस्सी साल से यह भी अंधेरे में खड़ी है।
अभी तनिक और डरी है।
❄️
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क.
Thursday, May 16, 2024
ग़ज़लनुमा : होगा कभी किसी दिन ज़िक्र...
❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️
होगा कभी किसी दिन ज़िक्र ज़माने का
पहला नाम आएगा इस दीवाने का।
अभी किनारा कर ले कोई जो जितना
कबतक नाम छुपेगा किस परवाने का।
दुनियादारी सब दरकारों से बाहर
किसे दर्द याराना वक़्त बिताने का।
एक जन्म में ही लगता सबकुछ बासी
कशिश नहीं कुछ कहीं करे जी जाने का।
उलझे रिश्ते भी कितने सुन्दर थे, अब
हुनर भूल बैठे हम दोस्त रिझाने का।
मैंने क्या किसने सोचा होगा कल यह
जो अंजाम हुआ ख़ुशहाल फ़साने का।
कल तक था अपने लोगों का,अपना घर
नयी सियासत में है गाँव सयाने का।
।📕। गंगेश गुंजन
#उचतवक्ताडेस्क.
Monday, May 13, 2024
दो पँतिया : जिस सफ़र की याद में
जिस सफ़र की याद में मरते रहे
सुनोगे तो ज़िक्र से ही रो पड़ोगे।
🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Sunday, May 12, 2024
ग़ज़ल नुमा : सुख भी बोझल करता है...
🍂
सुख भी बोझिल करता है
मेरा दिल यह कहता है।
ग़ैर नहीं लगने लगता
दुःख गर ज़्यादा टिकता है।
जिसको भूल चुका हूँ मैं
वह मेरे ग़म सहता है।
गरम लहू कुछ यादों का
ठंढे तन में बहता है।
रहते - रहते सहरा में
मन भी रमने लगता है।
•
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क। रचना : १२.५.'२४.
निर्मम बेडौल सच...
🍂 ओ भाग्यशालिओ !
कितने ही लोग अभागे हैं। उनकी बदौलत ही आप भाग्यशाली बने हुए हैं।
ऐसी समाज व्यवस्था का यह बेडौल और निर्मम सच आपको
भाग्यशालियो !
समझना चाहिए।
।🌾🛖🌾। गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
दो पँतिया : कह रहे थे उम्र के वो आख़िरी लम्हे मुझे...
कह रहे थे उम्र के वो आख़िरी लम्हे मुझे । और तो गुज़री भली ही इश्क़ थोड़ा कम किया ।
🌼🌼 गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Saturday, May 11, 2024
दो पंतिया : आ गये अनगिन सड़क पर...
आ गये अनगिन सड़क पर और कुछ अब मालदार।
बेबसी में तिलमिलाए सब सियासी वफ़ादार ।
गंगेश गुंजन। #उचितवक्ताडेस्क।Friday, May 10, 2024
दो पंँतिया : रह लेते ज कर अब गुंजन।
|🌈
रह लेते जा कर अब गुंजन,
और कहीं तो अच्छा था.
बेसुकून वक़्तों में माँगे
दिल अब कोई और दहर।
🌊
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क.
Wednesday, May 8, 2024
ग़ज़ल नुमा : इसमें या उस दरिया जाय
🌓
इसमें या उस दरिया जाय
किस दरिया जा डूबा जाय।
एक तरफ़ अंधी धतकर्मी
दूजा जिसको मन गरिआय।
सन्तन को भी सत्य कहांँ अब
झूठ-मूठ ही अधिक सुहाय।
एक तो अर्जित भर वैभव
दूजा सबकुछ रहा लुकाय।
अचरज क्या अखबारों में
दानवीर कल कथा छपाय।
सब असनान बाथरूम में
को जा के गंगा में नहाय।
क्या सूझै जब ख़ाली पेट
किस बज़ार में करे उपाय।
🙊🙊
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Tuesday, May 7, 2024
नैतिकता का हथियार और राजनीति
नैतिकता के हथियार से राजनीति की लड़ाई हास्यास्पद सोच है।
.🌓. गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Sunday, May 5, 2024
किछु दु पंँतिया
। 📔।
लाल कलम में कारी मोसि
सावधान किछु दुर्घट हयत।
•
जहिए संँ लीख’ लगलै कवि लाल
कलम सँ कारी बात
तहियेसँ जनता पर बढ़लै
केहने-केहने दन आघात।
•
सब दिन क्यो सम्राटो नहि
सम्राजो सब एक दिन जाइछ।
•
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Saturday, May 4, 2024
घृणा : ईंधन
🔥। नफ़रत : ईंधन .
सृष्टि में अकार्यक शायद ही कुछ है यहाँ तक कि आदमी की नफ़रत।
जिस प्रकार मनुष्य की बिष्ठा से भी गैस,ऊर्जा तैयार की जा सकती है और रात भर उससे रौशनी के खम्भे में जलते हुए अंधेरी सड़कों पर प्रकाश फैलाया जा सकता है,जाड़ों मे तापने योग्य जलावन और खाना पकाने में ईंधन की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है तो इतनी विशाल घृणा को भी वाँछित ऊर्जा में परिवर्तित क्यों नहीं किया जा सकता। सकारात्मक बेहतर बहुत कुछ ? बजाय इसके कि सुबह से शाम,रात तक हम अपनी नफ़रतें व्यर्थ ही यहांँ-वहांँ जुगाली करते और थूकते फिरें ?
बहुत कुछ नहीं भी हो यह फेसबुक किन्तु ख़ामख़्वाह कोई उग़ालदान भी नहीं है।ऐसे में भाषा भी तो प्रभावहीन होती जा रही है। सहलाये या आघात करे अपना काम तुरत करने पर ही भाषा भाषा है।
सिर्फ वर्तमान विद्यमान ढोना ही तो इसका काम नहीं।भविष्य ज़्यादा निर्भर है इसमें।
स्वतंत्रता भी तो हम गूंगी नहीं- भाषा में पाते हैं।
🌿
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Thursday, May 2, 2024
दो पँतिया : बहुत छोटा घर हमारा...
बहुत छोटा घर हमारा अभी तक एकान्त था। एक बच्चा आ गया यह घर बड़ा लगने लगा।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Wednesday, May 1, 2024
मज़दूर दिवस:
Monday, April 29, 2024
ग़ज़ल नुमा : लोकतंत्र का महासमर है पहली बार..
🌻
लोकतंत्रका महासमर है अबकी बार
कौन किधर है पता कहाँ है अबकी बार।
पहले से ही 'जाति न पूछो साधू'-संकट
ज़्यादा और धुआँ छाया है अबकी बार ।
छुपे एजेंडे हैं तैयार प्रलोभन के
दीन हीन दिग्भ्रमित बुद्धि,जन अबकी बार।
विजय पताका सजे-धजे सब दोनों ओर
दोनों तरफ़ हतप्रभ जनता अबकी बार।
वोटतंत्र की लोकतंत्र की अबके जाँच
धुंध दिमाग़ों वाली जनता अबकी बार ।
चारो तरफ घुमड़ता मंज़र सोच में है
बिखरी अपनीही पहचानें अबकी बार।
रोटी-शिक्षा-स्वास्थ्य सड़क से भी ऊपर
सब के आगे जात धरम है अबकी बार।
सोच,सेहत से जाग्रत-मन लोगों के भी
क्यूंँ विचार हैं कुंद वोट में अबकी बार।
'पंचन की सब बात मेरे सिर-आँखिन पर,
खूंँटा लेकिन इहैं गड़ी' है अबकी बार।
चैनेल हकलाये - बौराये - से अखबार
दोहरे - तिहरे बोलों वाले अबकी बार।
🌻
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Tuesday, April 23, 2024
दो पँतिया : याराना तो रौशन मैंने ऋतुओं का ....
याराना तो रौशन मैंने ऋतुओं का अलबेला देखा,
जाती हुई सौंप कर अपना, सब अगली सखि को जाती है। 🌸🌿 गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Monday, April 22, 2024
...दो पँतिया : जी हुज़ूर करते रहते हो
• वो तो ख़ैर लुभा जाता है महज़ खिलौने पर,बच्चा है, तुम क्यों बड़े तोप बुधिजीवी,जी हज़ूर करते रहते हो?
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Friday, April 19, 2024
पिता पुत्रक संदेशा-देशी
पिता-पुत्रक संदेशा-संदेशी । •। बेटा बड़ भावना सँ पिता लय विशेष प्रकार ओ विन्यासक कुल्फी लेने गेलाह। हाथ मे दैत कहलथिन -’ ई खास तरहक कुल्फी अछि पिताजी। भरिसक नै खेने हयब। हाले मे बजार मे अयलैए।’
स्वाभाविके जे पिता परम प्रसन्न होइत ग्रहण करैत फ्रिज मे रखबौलनि। गपशप परिवारी चर्चात्यादिक बाद बेटा आँफिस चलि गेलथिन।
बुढ़ा के कुल्फी मन पड़लनि। बुढ़ी के कहलनि ‘फ्रिज सँ दिअ तँ ओ कुल्फी।’ पत्नी तुरन्त थम्हौलथिन। पहिने तँ माटिक कनिये टा सुन्दर लोटकीक कुल्फी विन्यास भरि मन देखलनि। फेर सुआदि -सुआइद चम्मच सँ खाय लगलाह। मने मन दिव्य स्वादी विन्यासक प्रशंसा करैत पूरा तृप्त भ’ क’ समाप्त कयलनि।प्रशंसा आ उद्गार मे बिना एको रती बिलम्ब कयने बेटा कें व्हाट्सएप्प पर लिखलन्हि;
‘ई लोटकी कुल्फी तँ जुलुम स्वादिष्ट निकलल। वाह रे वाह। एकरा लोभे तँ रोज़ा राखल जा सकैए यौ।’
‘से तँ आब अगिले साल ने पिताजी !’ बेटा चोट्टहि कहलथिन।
ऐ बेर ई सीजनक तँ आब बीति गेल।’
बेटो तंँ हुनके, पिताक प्रशंसा संदेश मे असली निहितार्थ कें नीक जकाँ बुझैत त्वरित लीखि क’ पठौलनि। पढ़ि क’
पुरना मन पिताक मिज़ाज जकाँ मुंँह नै लटकनि।
‘से बड़ दिव मन पाड़लौं बेटा। मुदा एकर दोकानो आब अगिले सीज़न मे खुजतै की ?’ पिता पुत्र कें अओर त्वरित लीखि पठौलनि।
तुरन्ते हँसैत इमोजी वला संदेश पठबैत बेटा प्रणामी इमोजी सेहो पठौलथिन।
किन्तु एहि प्रकरणक एक टा अओर पाठ सुनल गेलय।से ई जे- साँझ खन बेटा वैह ब्राण्ड दू टा कुल्फी लेने अयलखिन आ कहलखिन जे सोचै छी पिताजी जे दू टा क’ रोज़ अहाँ लय उठौना क’ दी। भोरे क’ द जाएल करत। पिता कें बिहुँसैत कहलथिन आ आगाँ ई जे ‘हमरा सब लेल परम हर्खक बात जे अहाँ कें पसिन्न पड़ल।ओना तँ किछुओ केहनो आनू तँ अहाँ के नहिएँ पसिन्न पड़ैत रहैए।’ फेर माय कें देखैत पुछलनि- ‘नै माँ ?’ माय समर्थनियांं बिहुँसलथिन।
‘हँ यौ। से अहाँ ठीके कहलौं।से हमर स्वभाव अछि।’ कहैत पिता लोटकी कुल्फी कें नेना जकाँ आतुर भ’ देखैत पुत्र के कहलनि- ‘परन्तु से एखन छोड़ू। कुल्फी अनेरे पघिल क’ सेरा रहलय। पहिने ई लाउ।’
पिता के कुल्फी दैत माय सङ्गे पुत्र हँसलाह। इति प्रकरणम्।
🌿😃🌿
#उचितवक्ताडेस्क।
Thursday, April 18, 2024
मतदानी दोहा
लोकतंत्र कृशकाय है बलशाली हनुमान,
अपने मत का इसीलिए सदा रखें अभिमान । • गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
Friday, April 12, 2024
ग़ज़ल नुमा : सुख की कुछ मत पूछा कर
°🌿°
सुख की कुछ मत पूछा कर
दु:ख भर मुझसे साझा कर।
°
पूरा जाम मुझे मत दे
इसमें आधा-आधा कर।
°
क्यों चाहे दिल तू मुझ से
पागल प्रेम ज़ियादा कर।
°
राजनीति से बढ़-चढ़ कर
ज़ेहन कहे तमाशा कर।
°
एक पराजय से बैठा
जय के पीछे भागा कर।
°
है तो दे माँगे उसको
लेकिन तू मत माँगा कर।
°
सोये हैं थक कर बाबा
नागा अब तू जागा कर।
••
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Sunday, April 7, 2024
गिरना - उठना
Friday, March 29, 2024
अर्जेंट केजरीवाल यूट्यूब एंकर
Thursday, March 28, 2024
ग़ज़लनुमा सुबह सी आई है मुश्किल...
📕
सुबह-सी आयी है मुश्किल शाम जैसी चल गई
कुल मिलाकर ज़िन्दगी की रात यूँ
ही ढल गई।
चाँदनी और अमावस-से फ़ैसले
जिसने लिए
कुल मिलाकर सबको उसकी
आरज़ू ही छल गई।
बहुत छोटा ही सा घर था मगर
उसमें देखिए
कुल मिलाकर आठ दशकों
ज़िन्दगानी पल गई।
और दिन होता तो हम भी भूल ही
जाते मगर
कुल मिलाकर आज की तन्हाई
लेकिन खल गई।
हौसले तो पस्त थे किसने भी यह
सोचा था कि
कुल मिलाकर साँस आख़िर जा
रही समहल गई।
••
#उचितवक्ताडेस्क।
Wednesday, March 27, 2024
सर्वोच्चता -ग्रन्थि !
🌈 सर्वोच्चता-ग्रंथि !
समाज के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को अपना होना कितना श्रेष्ठ होना चाहिए ? जबतक मनुष्य का यह मन मिज़ाज नहीं पहचाना जाता तब तक कोई भी समाज-व्यवस्था प्रति द्वन्द्विता मुक्त अतः निष्पक्ष नहीं बन सकती है। चाहे कोई भी अंश या पूर्ण पक्षधर सिद्धांत और व्यवहार हो,किसी चेतन जाग्रत मानव समाज में मुकम्मल और सर्वमान्य हो ही नहीं सकता। हरेक प्रत्यक्ष या परोक्ष संघर्ष यहीं पर है।
सर्वश्रेष्ठता की अदम्य चाहत ही इच्छित मानवता के विकासकी सीमा है। और सो परम्परा की भाषा में बड़ी मायावी है।
📓 गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
दो पंँतिया
बहुत तपिश में लम्बा रस्ता दूर तलक छाया न जल,
बेपनाह प्यास में आये आँसू और पसीना काम।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
पाखण्ड
🌊
पाखण्ड !
चरित्र का सर्वोच्च अभिनय है- पाखण्ड।जीवन के नाटक में यह बुद्धि-चतुर व्यक्ति से ही सम्भव है। पाखण्ड सामूहिक शायद होता है।
°° गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
Tuesday, March 26, 2024
समय: एक दृश्याँकन : लैडस्केप
🌀 समय: एक दृश्याँकन
🌼
एक राजनीतिक पार्टी के बड़े नेता को भ्रष्टाचार के आरोपमें गिरफ़्तार किया जाता है।
प्रवक्ता कहते हैं - ‘अमुक भ्रष्ट सरकार ने हमारे महान् नेता को ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तार किया है।’
सरकारी प्रवक्ता अपनी शालीनता से इस आरोप को सिरे से ख़ारिज़ कर देते हैं।
तीसरा पक्ष इसपर और भी उच्चस्वर में,और ताक़त के साथ,गिरफ़्तार पार्टी नेता के लिए सहमत- सहानुभूति में और भी तीखे विरोध का वक्तव्य जारी करता करता है।
महानगरों में बाज़ाप्ता विचारक- बुद्धिजीवी गण निरन्तर लिख-बोल कर इस पर मौजूदा राजनीतिक विश्लेषण,समाजशास्त्रीय टिप्पणियाँ कर रहे हैं।
साधारण जनता बेचारी सुन-सोच सोचकर विकट दुविधा में फँसी हुई है-
‘आख़िर इन में कौन ग़लत,और पाक -साफ़ कौन है ?
और जो मॉल-मीडिया है,मोटा-
मोटी अपना मस्त-तटस्थ
है ...
(यह ऊहापोह में पड़े साधारण जन के मौजूदा मानस की चर्चा भर है। कोई राजनीतिक टिप्पणी नहीं।)
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Monday, March 25, 2024
अब तक मुझे लगता था
🕊️🕊️
अभी हाल-हाल तक मैं अपना निजी दुख चुटकियों में दफ़्न कर लेता था।हाँ समूह, सामाजिक दुःख और समस्यायें अवश्य मेरे मानस को देरतक आन्दोलित रखती थीं जब तक किसी न किसी रूप में वह अभिव्यक्त न हो जाए। लेकिन इधर पाता हूंँ कि छोटा से छोटा निजी भी दुःख ज़ब्त करने में असमर्थ होने लगता हूँ।और ये अनुभव इतना उद्वेलित करता है कि अक्सर सहमा रहता हूंँ।
🌊
शीश से पैर तक वो धुंध में लिपटा लगा मुझे,
दिल्ली में भी अपने गाँव तक सिमटा लगा मुझे।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
मेरी मित्रता सूची
😆 मेरी मित्रता सूची
मेरी मित्रता सूची पाँच हजार में तीन-चार कम तो कब न हो चुकी। पूरे पाँच हज़ार मैंने होने ही नहीं दिया है। ये तीन-चार मैंने बुद्धिमानी से रिक्त रख छोड़े हैं। यह सोच कर कि क्या पता कभी प्रधान मंत्रीजी का ही मैत्री-प्रस्ताव आ जाय तब क्या करूँगा ? अथवा रूस के राष्ट्रपति अमरीका के राष्ट्रपति का ? क्योंकि इस कारण पहले के किसी मित्र को अमित्र तो नहीं कर सकता
।वैसे सुनते हैं कि कुछ लेखकों को सौभाग्यवश यदि किसी बड़े लेखक का मैत्री-प्रस्ताव आ जाता है तो ऐसी परिस्थिति में वे विद्यमान मित्र सूची में अनुपातत: छोटे और अनुपयोगी लेखक को आकंठ भरी हुई अपनी मित्रता सूची से निकाल कर बड़े के लिए आदर पूर्वक आसन ख़ाली कर देते हैं। बिठा लेते हैं।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ता होली डेस्क।
Friday, March 22, 2024
झूठ का लोकतान्त्रिक नागरिक अधिकार
• झूठ को सच होने का नागरिक अधिकार प्राप्त है कि नहीं ? विश्व के समुन्नत लोकतंत्र क्या कहते हैं?
(एक दिग्भ्रान्त साधारण जनकी जिज्ञासा है यह।)
गंगेश गुंजन #उ.व.डे.
Thursday, March 21, 2024
होने में
°° होने में
होना ही पर्याप्त नहीं होता। राजनेता और विचारक ही नहीं,कितने कवि तक को जाग्रत और क्रान्तदर्शी लगने के लिए दिखते भी रहना पड़ता है- अनवरत।सामाजिक चेतना और परिवर्तन कामी मन मिज़ाज और जुझारूपन के कुछेक आक्रोश उद्घोष के शब्दों का बार-बार प्रयोग करते रहना पड़ता है।मंचों पर दुहरानी पड़ती हैं - परिवर्तन के लिए सामाजिक प्रतिबद्धताएँ। बाँधकर दिखानी ही पड़ती हैं-सामूहिक मुठ्ठियाँ लाल-लाल आँखें। 🔥
गंगेश गुंजन। #उचितवक्ताडेस्क।
Monday, March 18, 2024
कुछ अच्छे और आवश्यक कवि !
📔। अच्छे और आवश्यक कवि !
कुछ बहुत अच्छे और आवश्यक कवि भी अब निजी आक्रोश और प्रतिशोध की कविताएंँ लिखने और मज़े लेते हुए लगते हैं।
आख़िर ये इस पर क्यों उतर आये हैं ?
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Sunday, March 17, 2024
Thursday, March 14, 2024
ग़ज़लनुमा : गिना चुना अफ़साना लिख
📔
गिना चुना अफ़साना लिख
जो भी लिख पैमाना लिख।
हो जिसका लिखना खेला
तू साहित्य निभाना लिख।
शम्मा पर कहने में शे-ए-र
पागल इक परवाना दिख।
जीवन की लिख रहा किताब
सफ़ा सफ़ा वीराना लिख।
भटकी हुई सियासत को
जन-मन से बेगाना लिख।
सेठों को लिख मस्ताना
शायर को दीवाना लिख।
लोगों ने ठुकराया है
तू लेकिन अपनाना लिख।
यह धुंधला मैला तो है
कल का समय सुहाना लिख।
गु़रबत लिख हथियारे जंग
कल को नया ज़माना लिख। । 📔। गंगेश गुंजन रचना: १२/१३मार्च,२०२४.
#उचितवक्ताडेस्क।
Monday, March 11, 2024
एक दो पँतिया
एक जुगनू दिखा अमावस की आधी रात
हुआ एहसास उम्रकै़द में सच ज़िन्दा है।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Wednesday, March 6, 2024
काल काल के कवि !
📔 काल-काल के कवि !
•
हम उस काल के रचनाकार हैं जब हमारा कवि होना पाठक, श्रोता समाज तय करता था। हमें ख़ुद को कवि साबित नहीं करना पड़ता था। कवि होने का कोई प्रबन्ध नहीं करना पड़ता था। वह कार्य हमारी रचना करती थी। सम्पादक समाज ही हमें कवि-लेखक की यथोचित मान्यता और स्वीकृति दे कर महिमा से मंडित करता था।मान्यता के लिए अनियंत्रित उतावलापन नहीं था। किसी किसी भी यश या मान्यता के याचक शायद ही होते थे।
आजकल समाज की यह भूमिका भी स्वयं कवि ने ही उठा रक्खी है। फेसबुक समेत तमाम डिजिटल सामाजिक माध्यम के अभिमंच की बहती गंगा ने इसे और भी सरल सुलभ कर दिया है।सम्प्रति रचनाकार स्वयं सिद्ध हो रहे हैं।
अधिकतर कवि अपने आभामंडल स्वयं निर्मित करते रहते हैं। 📒 गंगेश गुंजन उचितवक्ताडेस्क।
एक दू पँतिया
Tuesday, March 5, 2024
असली नक़ली प्रगतिशीलता
क्षेत्र कोई भी हो,लिखी,पढ़ी और फेसबुक पर समझी जा रही सारी प्रगतिशीलता असली नहीं। इनमें ज्य़ादा तो नक़ली हैं। • गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Wednesday, February 28, 2024
दुर्लभ संजीवनी दृश्य : दादी-पोती।
दादी - पोती 🌼| ऐसे दुर्लभ संजीवनी-दृश्य और इस महाकाल में? केवल पार्क में ही मिलेंगे आपको। टहलने के लिए ही सही,जरूर निकला करिए।
...अवश्य ही एक पोती अपनी दादी को सहारा दिए सैर करा रही है !
जीयो बिटिया !
🌳
(पार्क में की एक फोटो जिसमें पोती बहुत वृद्ध दादी को सैर करा रही है)
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Friday, February 23, 2024
तीन दो पँतिया
🌒
दुखियों का दरबार लगाना आता है
वैभव का अम्बार दिखाना आता है।
सुने किसी की वो कुछ नहीं उसे भाये
उसे फ़क़त अपना फ़र्माना आता है।
फुंसी भर मुश्किल को कर दे घाव बड़ा
फिर उसको कैंसर कर देना आता है।
🌈|🌈
#उचितवक्ताडेस्क।
Thursday, February 22, 2024
उजला हुआ कवि
विकट काले समय पर
लाल क़दमों से चलता गया कवि !
उजला हुआ कवि।
🌄
(मैथिलीमे एक टा बहुत पहिनेक फेबु पोस्ट।)
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
२३.०२.'२४.
Monday, February 19, 2024
दो पंँतिया: याद कभी मुझको भी कर लोगे..
Sunday, February 18, 2024
फेसबुक पर लोग सब
📕🌿 फेसबुक पर लोग सब !
फेसबुक पर कुछ लोग छींकते हैं
कुछ लोग खाँसते हैं
कुछ लोग हँसते हैं
कुछ लोग बोलते हैं
कुछ लोग चीख़ते हैं
कुछ लोग गाते हैं।
कुछ रोते-कलपते हैं
कुछ लिखते-पढ़ते हैं
कुछ लोग अपना स्वास्थ्य बुलेटिन होते हैं तो कुछ लोग अपनी उपलब्धियों का कैलेन्डर होते हैं।
कुछ लोग अपना सफ़रनामा पढ़वाते हैं,
कुछ अपनी दिनचर्या बतलाते हैं
कुछ लोग अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों का नगाड़ा बजाते हैं
कुछ कथित तथाकथित परिवर्तन के नारे लगाते हैं।
कुछ किन्हीं का स्तवन लिखते हैं
कुछ उनकी भर्त्सना करते हैं
कुछ उपदेश देते हैं
कुछ उपदेश लेते हैं
फेसबुक पर कुछ लोग वैद्य भी होते हैं
वैसे ही कुछ लोग हकीम होते हैं,जैसे कुछ लोग बड़े-छोटे अस्पतालों के डाक्टर होते हैं।
कुछ लोग विशेषज्ञ होते हैं
कुछ विशेषज्ञों के भी विशेषज्ञ होते हैं।
कुछ लोग सहानुभूति-भिक्षुक होते हैं
कुछ लोग शुभाकाँक्षा के थोक वितरक होते हैं
फेसबुक पर कुछ लोग लेखक-कवि होते हैं
कुछ लोग, कवि-लेखक होने वाले होते हैं
फेसबुक पर सब लोग इतने अपने होते हैं कि सबलोग सबलोग की दैनिक बाट जोहते हैं।
फेसबुक पर कुछ लोग गांँव कुछ नगर होते हैं
कुछ दालान और नगरों के ड्राइंग रूमों में अकेले बैठे बुजुर्ग से खाँसते बोलते हैं
वे कुछ लोग बुरे मौसम में बच्च़ों को घर से बाहर नहीं निकलने की हिदायत देते रहते हैं।
फेसबुक पर जवान होते हुए किशोर उनसे चिढ़ते रहते हैं।
और तो और,कुछ लोग इस पर कुछ भी लिखे हुए को कविता ही समझ लेते हैं।
फेसबुक पर कुछ लोग इतना अच्छा लिखते हैं कि वह अच्छा कुछ लोग,दिल से पढ़ते हैं।
कुछ लोग तो इतना सुन्दर लिखते हैं कि कुछ लोग उनके लिखने का इन्तज़ार करते रहते हैं। ।📕।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Saturday, February 10, 2024
दो पँतिया : धोखे भी शामिल हैं यहाँ...
धोखे भी हैं शामिल यहांँ जीने के हुनर में
जीना है अगर ख़ास कर के मेट्रो नगर में।
। 🌒। गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Thursday, February 8, 2024
दिल्ली पुस्तक मेला १०-१८.२.'२४.
पुस्तक मेला
(१०फरवरीसे१८फरवरी-’२४ई.)
आगामी विश्व पुस्तक मेला,कवि-लेखकों की आने वाली पुस्तकों और प्रकाशनों पर( की खुशामद करती हुई सी)दनादन फेसबुक प्रदर्शित टिप्पणियांँ की बारिश में भीगते पढ़ते हुए मुझे तो लगता है बहुत से लेखकों को पुस्तक मेला जाने में भारी र्अहिचकिचाहट भी होगी। जिन लेखक कवियों की कोई भी पुस्तक, किसी भी प्रकाशन के किसी भी स्टॉल पर प्रदर्शित नहीं दिखने वाली है वे अपनी निरीहता तुच्छता की ग्रंथि से पीड़ित भी हो सकते हैं। जब उनकी किताब ही नहीं छपी है तो वे कहाँ के लेखक,कैसा प्रकाशन और किन महाभागों के कर कमलों से भव्य विमोचन ?उसके समाचार ! सो मुझे तो ज़बरदस्त आशंका है कि इस संकोच और ग्रंथि में बहुत सारे लेखक कवि कहीं पुस्तक मेला जाने से ही न परहेज़ कर लें।
विज्ञापन विस्फोट का यह परिदृश्य इस दफ़े कुछ और नया है। इधर हर बार यह प्रवृत्ति कुछ और बढ़-चढ़ कर विस्तार से बाजार होती और करती हुई दिखाई देती है।
बहरहाल मैं तो जाऊँगा क्योंकि आजतक किसी पुस्तक मेले के मौक़े पर मेरी कोई पुस्तक छप कर आयी ही नहीं।
मुझे तो उसका स्वाद भी पता नहीं है।😆।
लेकिन जाऊंँगा ही इसका इससे भी बड़ा और कारण है। वह यह है कि एक समय में एक स्थान पर इकट्ठे इतनी गुणवत्ता,संख्या और मात्रा में पुस्तकें और अध्ययन अध्यापन संबंधी सामग्रीकोसद्य: देख पाना क्या सबको नसीब हो जाता है ? कितने भी प्राचीन और बड़े पुस्तकालय में चले जायें तो भी ?
तो अगर ऐसा अवसर आ रहा है तो उसे कैसे ज़ाया कैसे होने दूंँगा। इतनी पुस्तकें एक साथ देखकर आंँखों को बहुत दिनों के लिए तृप्ति और राहत मिल जाती है।
और वे वरिष्ठ-कनिष्ठ आत्मीय प्रिय साहित्यकार साथी जिनसे,एक ही शहर में रहते हुए भी कितने कितने दिनों तक नहीं मिल पाते उनसे भी भेंट होने का सम्भव आनन्द ! यह आशा तो और विशेष है।
मिलते हैं ।आते हैं । शुभकामना। 📕📕📕📕📕📕📕📕📕📕📕📕
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Tuesday, February 6, 2024
दो पंँतिया : इस अलाव में ताब नहीं अब...
दो पँतिया : देवता सब पुराने हो गये हैं
📔
देवता सब पुराने हो गए हैं
आदमी अब सयाने हो गए हैं।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Saturday, February 3, 2024
दो पंँतिया : मक़बूल तो इस दौर में कुछ
मक़बूल तो इस दौर में कुछ भी कहाँ रहा, इक शाइरी पे नाज़ था सो जा रही बाज़ार। 🌊🌊 गंगेश गुंजन। #उचितवक्ताडेस्क।
Friday, February 2, 2024
श्रेष्ठता के पैमाने
📕 श्रेष्ठता के पैमाने
सभी श्रेष्ठता अपनी वास्तविक गुणवत्ता पर ही टिकी हो यह ज़रूरी नहीं है। साहित्य में तो और भी नहीं। यहांँ तो और बहुत सूक्ष्म, कूटनीतिक स्तर तक बौद्धिक कुशलता से संस्थापित होते हैं। अधिकतर ऊंँचाई और श्रेष्ठता भी अक्सर,संगठनात्मक प्रक्षेपण और प्रायोजित होती हैं। कभी विचारधारा, कभी पारस्परिक स्वार्थ और प्रवृत्ति मूलक लाभकारी योजना में। वैसे दुर्भाग्य से ऐसी तुच्छताओं के संकीर्ण संगठन साहित्य कलाएंँ और प्रबौद्धिक समाजों में अधिक ही सक्रिय रहते हैं। इनके कारण प्रतिगामी विचार और कार्य को अदृश्य और बहुत सूक्ष्म रूप में पर्याप्त ताक़त मिलती रहती है। दिलचस्प कहें या दोहरा दुर्भाग्य यह है कि मीडिया-माध्यमों में ये ही वर्ग,साहित्य की मशाल होने का भी दम भरते दृष्टिगोचर होते हैं।
इनके पीछे अति महत्वाकांँक्षी नवसिखुओं की शोभायात्रा भी चलने लगती है।
आप माने रह सकते हैं :
अपवाद का तिनका !
💥 गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
Friday, January 26, 2024
ग़ज़लनुमा : यादों से पहले माज़ी का मंज़र
🌼
यादों से पहले माज़ी का मंज़र था
बाद नदी के आगे एक समन्दर था।
सजी धजी मीना बाज़ार व' मोहतरमा
और सामने कोई खड़ा क़लन्दर था।
अभी-अभी तो नेता की मजलिस छूटी
और अभी ही भड़का कोई बवंडर था।
अबके भी बादल बरसे बिन लौट गये
धरती के आगे शर्मिन्दा अम्बर था।
अन्देशे हर सू क्या अनहोनी हो जाए
ऐसे में इक फ़ोन अजाना नंबर था।
••
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Tuesday, January 23, 2024
शे-एर नुमा : सिमट कर रह गया लगता है
सिमट कर धँस गया लगता है जीवन ही सियासत में
अभी तो गीत गाना इश्क़ होना,चाय भी सियासत है।
•• गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
Monday, January 22, 2024
चित्त इतना क्यों है उद्विग्न आज?
Friday, January 19, 2024
मेघाच्छन्न प्रतिबद्धताओं में
💨 मेघाच्छन्न प्रतिबद्धताओं में
लिख पढ़ की दृष्टि से प्रतिबद्ध
रचनाकारों का अभी अकाल काल चल रहा लगता है। सच और यथार्थ तो फिलहाल दलीय राजनीतिक सत्ताओं के मीडियाओं की लुक्का छिप्पी भर बन गया है। सार्वजनिक जीवनके सभी यथार्थ किसी न किसी राजनीतिक सत्ता की ही उपज भर प्रचारित होने रहने के कारण अपने-अपने सकल प्रतिबद्ध अपनी ज़िद से ही तमाम चैनेलों पर पक्षीय यथार्थ गढ़ कर सेवायें दे रहे हैं।काम चला रहे हैं।ऐसा सिर्फ़ साहित्य में ही नहीं, प्रखर उग्र पत्रकारिता में भी आम लगता है। साधारण जन के लिए तो यह और खतरनाक है।आख़िर उनका भी तो कोई अपना पक्ष है। इस घटाटोप को वे क्या समझें और करें ? किस तरफ देखें,जायँ।
जाने किनके पास अपना अपना कैसा विश्वस्त सूचना-तंत्र है कि वे भरदेशी समाज राजनैतिक सच्चाइयों को आर-पार देख परख लेते हैं,समझ लेते हैं और मन मुताबिक़ कहने के लिए सान्ध्य सत्यों की भी बारात भी सजा लेते हैं। आश्चर्य होता है।
साधारण जन और सिर्फ़ लेखक इसमें बौआ जाता है। भटक जाता है।उसमें तो
किंकर्तव्यविमूढ़ता की परिस्थिति व्याप्त है।
पत्रकारिता तो ख़ैर रोज़मर्रे की खेती है लेकिन इस घनी अनिश्चितता के दौर में कुछ दिनों तक कविता लिखना स्थगित नहीं रखा जा सकता ? मैंने तो सोचा है।
#उचितवक्ताडेस्क।