Friday, July 13, 2018

ग़रीबों के लिए स्वास्थ्य सेवा

ग़रीबों के लिए स्वास्थ्य सेवा : सर्वोच्च न्यायालय।
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माननीय सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना सुकून पहुंचाता है कि अब निजी अस्पतालों में गरीबों को भी मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा मिलेगी। नियमानुसार सरकारी ज़मीनों पर बने और मुनाफा कमा रहे इन प्राइवेट अस्पतालों को गरीबों के लिए यह सुविधा सुनिश्चित करनी पड़ेगी। यही सुकून का समाचार है । लेकिन साथियो, आपको नहीं लगता कि यह समाचार भी महज़ समाचार बनकर रहेगा ? क्योंकि जिस देश में सुखी और संपन्न मध्य वर्ग के बहुत से लोग,वंचितों और निम्न वर्गीय सुविधाओं को छीन-हड़प कर और अधिक सुविधा से जीने के आदी (एडिक्ट)बन चुके हैं वे क्या ग़रीबों के हक़ में हो रही इस सुविधा को हड़पने से बाज़ जाएंगे ? उन्हें और अधिक धनवान जो होना है।और जो गरीब हैं उन्हें यह तो मालूम ही नहीं कि उनकी अधिकार और चाहत क्या हैं? और वे देश की पूरी व्यवस्था में कहां हैं? सो मुझे तो लगता है अभी वंचितों और गरीबों के लिए आये हर्ष में सबसे बड़ा खलनायक 10% विश्व के भारतीय अमीर नहीं,बल्कि उनके निकटतम 70% निम्न मध्य वित्त वे लोभी लोग हैं जो और धनी होना चाहते हैं। यही है कल आएगा अब यह कैसे बदलेंगे इंतजाम इसका भी होना चाहिए बहरहाल,शुभकामना तो है उम्मीद भी। देखना चाहिए!
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- गंगेश गुंजन 10 जुलाई 2018

Friday, July 6, 2018

। कहक्कर-पढ़क्कर हस्तियां,सामान्य जन और यह Facebook. विचार।

। कहक्कर-पढ़क्कर हस्तियां,सामान्य जन और यह
Facebook. विचार।
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यों तो विचारों और वक्तव्यों का यहां सैलाब उमड़ा रहता है लेकिन इन सब में इतनी भांतियों के यथार्थ और इतने विरोधाभास, इतनी इतनी दूरियां, इतनी-इतनी नीयतें और दृष्टिकोण होते हैं कि आख़ीर में सामान्य जन के दिमाग में सब गड्ड-मड्ड हो जाते हैं। एक दूसरे में यूं घुल जाते हैं कि किसी एक ही की कोई शक्ल,स्वरूप या रखे गए विचार की बुनियादी आकृति खोजें तो शायद ही मिलती है। सब मानो घालमेल हो जाता है। किसी के भी कथन का कोई अपना मूल व्यक्तित्व स्पष्ट बचा नहीं रह जाता है।
  भला इस लिखने-पढ़ने और बोलने से क्या फ़ायदा जो आपकी अपनी भी बुद्धि और विवेक का भी हरण करके  बैठ जाय ?
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गंगेश गुंजन 20 जून 2018

Saturday, June 9, 2018

समुद्र का डर

समुद्र का भय  : दो

पृथ्वी पर जगह जगह बहुत उथल-पुथल मची हुई थी। बहुत सारे ऐसे समाचार मिल रहे थे जिनमें राजा और प्रजा के मतभेदों की कहानी बन रही थी। सिंहासन और सत्ता पलटने और बदलने की घटनाएं हो रही थीं।
    प्रजा के विद्रोह का डरावना वातावरण बन रहा था। इन्हीं परिस्थितियों में समुद्र के कानों  तक भी छिट फुट कुछ नदियों के सूखने के भी समाचार पहुंचे। सो समुद्र को भी गहरी चिंता हुई। नदी सूख रही हैं या मुझसे रूठ रही है? या नाराज़ हो रही हैं ? तो ऐसे में उसे चिंता हुई कि  यदि धरती पर की सारी नदियां मिलकर एक हो जाएं और उनकी एकता भी अटूट हो जाए ? सब मिल कर मुझसे विद्रोह कर दें ? और वे मुझसे मिलना ही बंद कर दें तब ? मेरा क्या होगा तब? ऐसे में मैं समुद्र रह भी पाऊंगा क्या भला? यह सोचते ही,समुद्र होते हुए भी वह अचानक बहुत डर गया।और गहरी चिंता में पड़ गया। फिर इस पर सोचने लगा- अवश्य ही इसका कोई कारण भी होगा। सोचते हुए उसके मन में पहला ही विचार यह आया कि अपनी नदियों के बारे में मैं बड़ा लापरवाह हो गया हूं। उन पर ध्यान नहीं देता हूं। उनके दु:ख-तकलीफ नहीं समझता हूं। यानी उनका कुशल क्षेम भी नहीं जानता रहता हूं।किसी से कोई शायद इसीलिए तो कोई रूठता है। इसलिए मुझे नदियों के लिए अपनी चिन्ता बढ़ानी चाहिए। उनको मनाने के लिए,उनके प्रेम को जीतना होगा। उपाय सोचता समुद्र रात भर सो नहीं सका। तब इसी उधेड़ बुन में उसे नये सिरे से इसका भी ध्यान हुआ कि इधर बहुत दिनों से वह किसी भी नदी के बारे में कुछ भी चिंता नहीं कर रहा था। उनके बारे में कोई खोज-ख़बर नहीं रख रहा है।और अंत में उसने अपने मन से ही समझा और माना कि असल में वह बहुत घमंडी हो गया है। वह देर तक पछताता रहा।    
    कहते हैं कि तब समुद्र एक अच्छे अभिभावक की तरह नदियों की नियमित खोज खबर रखने लगा।और तब ऐसे समाचार आने लगे कि नदियां भी कम सूखने लगीं। पहले तो कोई एक नदी सहमी -सहमी समुद्र के पास आयी। फिर कुछ और नदियां भरोसे से भर कर समुद्र में मिलीं।धीरे-धीरे समुद्र के लिए नदियों में भरोसा और प्यार भरने लगा। और तब  मिलने के लिए नदियां जल्दी जल्दी समुद्र तक आने लगीं !

इस तरह समुद्र बच गया जो आज तक है।
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-गंगेश गुंजन 17 अप्रैल 2018.


Monday, May 28, 2018

भूले से विश्वास न कर

भूले से विश्वास न कर
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मौसम  वापस लौटेगा
भूले से विश्वास न कर

कोई  वचन निभाएगा
ऐसी कोई आस न कर

जीवन रख आम ही दोस्त
इसको इतना ख़ास न कर

एकान्तों  में घर न   बना
गांँव से दूर  निवास न कर

मरना  ही है  गर तुझको
यूँ  लावारिस लाश न कर    

बहुत पुराना है  सब कुछ
फेंट-फाँट के ताश न कर  

भटके   हुए डरे हैं  लोग
सोच के मन हताश न कर

वोट  पर्व  के वादों  का
भूले से   विश्वास न कर

बकबक करने दे उसको
तू तो यूं बकवास ना कर

आया  नहीं पत्र  उसका
जी अपना उदास ना कर

टूट  न जाने  दे सपना
दिलकी ख़त्म प्यास न कर

एक सफ़र फिर जो बेकार  
हो,मन को वनवास न कर।    
              -गंगेश गुंजन।17 जून 20011

Wednesday, May 23, 2018

लोकतंत्र का शोभा-सुंदर !

लोकतंत्र का शोभा-सुंदर !
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जिला पुरैनियां से प्रखर युवा पत्रकार चिन्मय आनन्द ने एक दिलचस्प और ज्ञानवर्धक पोस्ट लिखा है कि ट्रंप महोदय का नाम भूल गए। याद करने के लिए आखिर Google से मदद लेनी पड़ी। वैसे Google को भी कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ी। तुरंत उनकी फोटो आ गई। बस। फोटो से पूरा अमेरिका आ गया। अब इस उपलब्धि का उन्होंने किया क्या सो कुछ भी नहीं लिखा है। पत्रकार लोग आजकल यह भी कर देते हैं !
   यही है ज्ञानवर्धक पोस्ट।मेरे एक पचपनोत्तर अनुज बंधु मित्र या कहें मित्रवत अनुज यह पढ़कर इतने उत्साहित हैं के इनके उत्साह से हम लोगों का आकंठ मनोरंजन हो रहा है। ये मित्र खुश हैं कि आहिन्दा जब कभी सास-ससुर का नाम भूलेंगे तो गूगल महान् की मदद ले लेंगे। जिस दांपत्य अनुशासन में बेचारे अबतक अपने विवाह की निर्विघ्न  20-25 वर्षगांठ मना चुके हैं उसे सुचारु रखने के लिए यह आवश्यक है । जबकि दुर्भाग्य से ये दोनों ही नाम उन्हें अक्सर नहीं याद रह पाते। सुन्दर सालियों के नाम में ऐसी कोई समस्या नहीं है। तब ऐसे ससुराल शासित परिवार में इन पति का क्या बनता होगा यह सहज ही कल्पना योग्य है। अब उन्हें कौन समझाए Ok Google बेचारा भी ऐसा कोई मैथिल पंजियार नहीं है कि शव कुलीनों के सभी खतियान कान के नीचे रखता हो। यानी वह स्वनामधन्यों का ही व्यौरा रखता है। वह कुछेक सीमितों बारे में ही आपको बताने का कष्ट करता है,किसी साधारण झा चौधरी या पाठक सिंह का नहीं। अर्थात क्या आपके साथ ससुर भी कम से कम श्रीमान धर्मेंद्र जी और कम से कम मालिनी जी की तरह की हैसियत के हों तभी गूगल जी आपको तवज्जो देंगे। अन्यथा सास और ससुर का नाम भूलने के दुष्परिणाम से आपको अपने स्तर पर ही सलटना होगा ! अब किसी साधारण तुच्छ किसान परिवार के एक बुजुर्ग दंपति का भला Google कितना ख्याल रखें? इतने बड़े लोकतंत्र की इतनी संवेदनशील सरकार की व्यवस्था और महक़मे तो बेचारे किसानों की खबर रखी नहीं पाते और यह बेचारा Google एक छोटे से बक्से में यह मशीन इतने-इतने किसानों के पीछे कहां तक भागती फिरेगी ! फिर भी भला हो पत्रकारों का ही कि वह जगह कथा इन किसानों की आत्महत्या पर शोक श्रद्धांजलि टाइप समाचार छापते रहते हैं। अन्यथा तो साधारण लोगों को अपने जैसे साधारण की आत्महत्याओं के बारे में जान पाना भी मुश्किल ! अतः सहानुभूति चाहिए।
    पत्रकारिता में भी इधर एक नई क़िस्म के नाटक वाले क्लाइमेक्स-तत्त्व आने लगे हैं।घटना या समाचारों का क्लाइमेक्स अब संसद-विधानसभाओं या महज़ ऐसी ही किन्हीं निर्णायक संस्थाओं में ही नहीं होता बल्कि यह पत्रकारिता में भी संभव हो गया है। अभी भले यदाकदा है परंतु इसका भविष्य इसमें बहुत ही सुनहरा उज्ज्वल और सुनिश्चित है !
लीजिए, कहां चला गया मैं भी। फोटो की बात थी...
   इधर कुछ दिनों से देखने में यह आ रहा है कि कोई एक फोटो ही देश बन जा रही है ! देश कोई जनता के दु:ख सुख या समस्या के कारण देश नहीं है,उस देश के एक विशेष व्यक्ति की फोटो के कारण देश बन जाता है। और सो यह भी आवश्यक नहीं कि सिर्फ उस देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जी के कारण ! नहीं, किसी जिला परिषद के सदस्य के भी कारण हो सकता है। आकाशवाणी पटना के दिनों में मुझे याद है कि 'आर्यावर्त्त' अखबार में जो बेचारा हम लोगों का इकलौता आर्यावर्त महान था,उसमें किन्हीं एक मछली विभाग - जिसका सरकारी नाम-’मत्स्य पालन विभाग’ था,और किसी अवसर विशेष पर अपने संदेश की रिकार्डिंग कराते समय जब उक्त विभाग के अध्यक्ष जी चौथी बार मत्स्य शब्द का उच्चारण मतस्य मतस्य करते रहे तब आखिरकार रेडियो के अभागे प्रोड्यूसर ने  अनधिकृत रूप से जनहित में उसका नाम बदल कर ‘मछली पालन विभाग’ कर दिया और पूर्व सांसद महोदय से मछली पालन विभाग’ बुलवाने में सफलता भी पाई। अब यह फोटो कांड उन्हीं महोदय का है !  महान आर्यावर्त्त में 'मत्स्य पालन के विकास में उनके ऐतिहासिक योगदान का सरकारी समाचार तो उनके नाम के साथ छप गया लेकिन उनकी फोटो नहीं छप पाई ! अब सोचिए,अध्यक्ष की फोटो नहीं छपी जो एक सम्मानित सांसद भी थे।यह तो एक लोकतांत्रिक अपराध ही था,और सो भी अपने इस स्वतंत्र देश का इमर्जेंसी आभासी स्वर्ण काल विकास शील हो रहा था ! सांसद सत्तासीन दल ! बाल-बच्चे, वृद्ध मां-बापदार बेचारे समाचार संपादक की तो नौकरी जाने पर ! अब वह हाय-हाय करने लगा। वह तो कहिए कि पराड़कर महान परम्परा के श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार जी जैसे संपादक थे,जो क़द में अकेले 2-3 मुख्यमंत्रियों के बराबर पड़ते थे सो ग़रीब की नौकरी बची।
   तो चिन्मय ने दुस्साहस किया है। एक तो वो महामना ट्रंप नाम भूले और ऊपर से इस पर लिख भी डाला। ग़नीमत है कि वह एक व्यक्ति हैं, विशेष चाहे जितने भी हों। कहीं जो वह कोई देश हुए होते ! देश क्या कोई एक प्रान्त भी होते तो उन पर हमले की भी तैयारी हो सकती थी !
     बतौर पत्रकार वह अपनी जान हथेली पर लेकर लिखा करें। कोई हर्ज नहीं। हालांकि उनको सावधानी बरतने मैं फिर भी कहूंगा ही। परंतु स्वतंत्र पत्रकार हैं। स्वतंत्रता बरतते हैं। मगर हां देश तो सर्वोपरि है। और जो अपने ऐसे अच्छे दिनों के साथ विश्व गुरु होने के आदर्श प्रयाण पंथ पर अग्रसर हो चुका है और इस महाशक्ति मित्र राष्ट्र का सौजन्य स्नेही है,उस देश का सवतंत्र पत्रकार होकर ट्रंप का पूरा नाम भूलेंगे तो कैसे चलेगा भाई ?  
   देश को जरूर सोचें।देश को जरूर सोचते हैं भी आप। तब हां, इसका क्या करिए कि आज बिना जान हथेली पर लिए देश के लिए कुछ सोचा जा भी कहां सकता है ?
    अब यह तो लोकतंत्र है ! और इसका शोभा-सुंदर है!
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-गंगेश गुंजन 22 मई 2018

Tuesday, May 15, 2018

भुलक्कड़ जनता का यह प्रौढ़ लोकतंत्र !

भुलक्कड़ जनता का यह प्रौढ़ लोकतंत्र !
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सच और झूठ का प्रयोगात्मक घालमेल और चतुराई का खेल है राजनीति। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का यह एक आजमाया हुआ व्यवहार है जो कालांतर में दलीय विचार के अनुरूप उसके चरित्र का अंग होते  हुए दलीय स्वभाव और उनका राजनीतिक व्यवहार तथा विचार बन गया है। सिद्धांत और आचरण की मूलभूत नैतिकता भी सुविधा और अवसरोचित वेग से बदलती रहती है। इसी प्रक्रिया में नैतिकता सामाजिक जीवन में उदासीन होती गई है। राजनीति में तो नैतिकता पहले ही अप्रासंगिक हो चुकी है।
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गंगेश गुंजन।१६.५.२०१८.

मनोरंजन के विकल्प

मनोरंजन के विकल्प
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कोई मनोरंजन मुकम्मल हो ही‌नहीं सकता जिसमें मूर्खता की छौंक न पड़ी ‌हो। आम तौर  से तो मैं इस शाम-रात के समय टीवी चैनलों के कुछ चुने हुए हास्य भरे मनोरंजन सीरियल ही देखता हूं। दिल बहलता है।लेकिन आज कर्नाटक चुनाव परिणामों पर तमाम टीवी चैनेलों पर छिड़े घमासानों को देखकर‌ ही मनोरंजन किया।और यह भी लगा कि ऐसा करके मैंने कोई ग़लती नहीं की। यहां तो दिल ही नहीं दिल्ली बहल‌ रही‌ थी ! इसमें मैंने कुछ और ज़्यादा ही मनोरंजन प्राप्त किया,क्योंकि चैनेलों के ये विदूषक भी नैसर्गिक प्रतिभा के बड़े धनी अभिनेत्री-अभिनेता रहते हैं।‌
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-गंगेश गुंजन। १५.५.’१८.