Monday, November 13, 2017

दु:ख दिल से सहा नहीं जाता !

दु:ख दिल से सहा नहीं जाता
और  उससे कहा  नहीं जाता

कौन अपना बचा है गाँवों में
सुन के दौड़ा यहाँ चला आता

बारहां सुख को निकलते देखा
घरके ग़म से ही धकेला जाता

हम भी रहते उसीकी बस्ती में
चैन में मन मेरा  भी इतराता

काश होती  बची कहीं  तासीर
आँख में अपनी भी लहू आता

वह जो बदला तो इस क़दर किअब                
मैं भी उसके  लिए कहाँ जाता

कोंपलें  फूटनी हैं अगली रुत
एक हसरत कि देखकर जाता
🌱
रचना: 9 फरवरी,2013.
-गं.गुंजन

Monday, October 30, 2017

भाषा की पीड़ा

भाषा की पीड़ा
*
सिर झुकाये भाषा, हाथ जोड़ कर खड़ी थी और
एक साथ मुझे अपनी लाचारी और
चेतावनी दे रही थी- मानुष कवि !
इतने असत्य,अन्याय और अंधियारा मैं नहीं बोल सकती अब। तुम्हारे दु:ख,शोषण और परिवर्तन कहते-कहते मैं बेअसर हो चुकी हूं। भोथड़ी हो गई हूं।
और तो और ऐसा लोकतंत्र भी मैं नहीं लिख सकती। इस तरह तो अभी तो भोथड़ी हो रही हूं,कल को तो गूंगी हो जाऊंगी।

-प्रेम से लेकर युद्ध और ध्वंस से निर्माण तक,असहयोग से सशस्त्र प्रतिरोध तक...लाठी-तलवार से  बंदूक कबसे ये सबकुछ कहती आ रही हूं।

देखने के तुम्हें इतने महाभारत और इतिहास दे दिए हैं दुनिया भर।सत्ता,शासन राजतंत्र-लोकतंत्र।
यह लोकतंत्र तुम्हारा ! और अब तुम चाहते हो कि तुम्हारे लिए इन्हें पढ़ूं भी मैं ही, मैं ही करूं ?

तुम लात-जूते खाते रहोगे,वक्त़-वक़्त पर‌ जेलों में तफ़रीह करने जाते-आते रहोगे। धरने पर बैठे फोटो लिवाते रहोगे, वहां से उठकर वोट देने जाते रहोगे।
भले शब्द-लोकतंत्र और परिवर्तन भी मैंने ही कहे, तो ?
    तुम सिर्फ़ इन्हें बोलोगे और बोल कर सोओगे ?...
*
-गंगेश गुंजन। ३१.१०.’१७.

Sunday, October 22, 2017

फेसबुक ज़िम्मेदारी

वैसे कल से तनिक उद्विग्न हूं।मेरे एक प्रिय बंधु जो सुपठित हैं सुलझे हुए हैं,एक पोस्ट पर उनकी  प्रतिक्रिया पढ़कर चिन्तित भी। हालांकि अभी उनका उपकृत भी हो रहा हूं कि उन्हीं के उकसावे या प्रेरणा से यह टिप्पणी लिख रहा हूं।

  मेरे हिसाब से तो Facebookबहुत बड़ी दुनिया है। हमारी अच्छी-बुरी नशीली-विषैली,आनंद और दु:ख की बहुत बड़ी दुनिया रोज़ इस पर अपने आकार लेती है। हमारी मानवीयता,विचार और भावुकता के साथ अपनों तक पहुंचती-पहुंचाती है।आज जब कि साधारण जीवन से पारंपरिक त्योहार भी जीवन से लुप्तप्राय हैं,इस शुष्क जीवन-परिस्थिति-शैली की उद्विग्नता व्यग्रता के बीच ये पृष्ठ कुछ पल के लिए हमें हमारी मनपसंद दुनिया रचने का ख़्वाब याद दिलाते चलते हैं।

  तो ऐसे में हमें, किसी पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए इसका शऊर, इल्म और अंदाजा अवश्य ही रखना नहीं चाहिए कि हम यह टिप्पणी कहीं हरबड़ी में अतः ऐसी टिप्पणी तो नहीं कर रहे जिस अनुभव, विद्या-विधा के हम अधिकारी नहीं हैं, जो हमारा क्षेत्र नहीं है? जो हमारा विषय नहीं है जो हमारी विशेषज्ञता नहीं है या जो हमारे मन की भी बात नहीं है।उसपर हरबड़ी में या क्षणिक किशोर भावुकता के ज्ञान बघारू उत्साह‌में तो ‌नहीं कर रहे? फटाफट और कुछ भी कह देने से क्या हमें बचना नहीं चाहिए?

   हम जानते हैं सभी सब कुछ नहीं जानते परंतु ‘सभी’ कुछ न कुछ विशेष, अवश्य जानते हैं।तो हम यदि अपनी टिप्पणियों को अगर अपनी सीमा को समझते हुए उसी से नियंत्रित और प्रेरित करें तो कदाचित Facebook पर टिप्पणियों के चलते जो बदमज़गी आये दिन होती रहती है,जैसी कुरूप चर्चा चल पड़ती है वह थम सकती है।अत: हम इसके लिए मुनासिब संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से तत्पर रहते‌ हुए, अपने ज्ञान,अपनी जानकारी, विचार और अपने आदर्श का प्रयोग नहीं कर सकते जो लक्षित समाज लक्षित विषय और सर्वसाधारण उद्देश्य की रुचि,बुद्धि और भावना के अनुसार भी बन पड़े ?

‌‌   इस दुश्वारी के चलते ही अपने कतिपय वैसे योग्य,गुणी और आवश्यक आत्मीयों को उनकी सुंदर और मूल्यवान  टिप्पणियां पढ़ कर भी अपनी पसन्द, सराहना भावना को भी संप्रेषित नही कर पाने की मेरी भावनात्मक समस्या तो अलग है।

  ‌  अपने फेबु साथियों के सम्मुख यह मेरा प्रस्ताव,निवेदन है, कोई परामर्श नहीं। शुभकामनाएं।

सस्नेह,

-गंगेश गुंजन ।२२.१०.२०१७ ई.

Thursday, October 20, 2016

मैथिली प्रेम । भाषा साहित्य। पुरस्कार प्रकरण।ओ जनमञ्च तंत्र!

फेसबुक समेत समस्त प्रचार-प्रसार माध्यम पर चतरैत- फड़ैत-फुलाइत मैथिली भाषा-प्रेम पर, अमलेन्दु जी अहांँक टिप्पणी, अपेक्षाकृत संतुलित अछि। तें।हमरा नीक तंँ लगबे कएल,ई दू पाँती लिखबोक स्पृहा सेहो बलवती भेल।आब अहांँक एहि विषय के तथाकथित संबोधित मैथिली समाज कोन रुचि आ दृष्टियें लैत छथि से देखब पूर्ण रोचक हएत। शुभकामना ! हँ,हमरा तं मैथिली-हिन्दीक ओहो युग भोगल अछि जाहि मे आइयो सं विशेष मैथिली अनुरागी कए टा विद्वान, हिन्दीक विरोध मे अंग्रेजी सं आचमनि -पूजन करऽ लगैत रहथि। ई कृत्य हमरा तहियो अनुचित अनर्गल लागय आ आइयो लगैए।बाजब - लिखब तं मैथिली नै तं अंग्रेज़ी। हिन्दी हेय। ( ओहनो व्यवहार कें हमर बुते मूर्खता पूर्ण एहि दुआरे नहिं कहल हैत जे से लोकनि हमर 'गुरुजन कोटिक रहथि। )। हम हिन्दी भाषा ल' क' आरम्भहि सं अपने घर मे मैथिली भक्त लोकनि सं गारि-फझ्झति सुनैत सहैत आएल छी तद्यपि निरन्तर एही दुनू भाषा मे लिखैत आबि रहल छी।आ जीवै छी। मैथिली हमर जन्मदात्री माय। हिन्दी अन्नदात्री माय। यात्री जी होथि, आरसी बाबू होथि वा गुंजन होथि हिनका लोकनि कें जीविकाक अर्हता हिन्दीएक रहलनि।लिखबो हिन्दीए मे आरम्भ कएलनि। (गुंजन तं अबस्से)। तें ई बड़ संवेदनशील मामिला छैक। कारण जे, हिन्दी देशक राष्ट्र (राज) भाषा सेहो तंँ थिक। तकर तंँ अवमानना नहि होएबाक चाही। तें मैथिली समाज मे आँखि मूनि क' एहन संदर्भक टिप्पणी करैत चलबाक जे बजार आ विज्ञापनी दुर्वृत्ति पसरि गेलय ताहि पर मैथिली मे कोनो 'अनुशासन' संभव बाँचल छैक ? ( अहांँकें निश्चिते हम, तेहन कोटिक बजन्ता मे नहि मानैत छी ओ ताही भरोसे अहांँकें एतेक ई लीखियो रहल छी)। एकटा आर बिन्दु। कोनो रचनाकार के आलोचना वा धिक्कारबा सं पूर्व, आलोचक-धिक्कारक महोदय / महोदया कें एकरो जानकारी अबस्से रखबाक नै चाही जे अमुक हिन्दी मे लिखनहार मैथिली लेखक, मैथिलीक प्रसिद्धिक रसास्वादन कऽ लेबाक पश्चात् हिन्दी लीखऽ लागल छथि कि पहिनहिं सं हिन्दी लिखैत रहथि ? हमरा पर तं ई अन्याय। जे छुच्छे यश, अर्थ ओ उपाधि लेल हिन्दी मे लिखऽ लगैत छथि से (क्षमाप्रार्थी छी) ने मैथिली मे श्रेण्य ने हिन्दी मे छथि। से लेखक प्रतिबद्ध कोनहुंँ ठाम नहि। (संदर्भ : आ.पं.गोविंद झा जीक हालिया टिप्पणी) । दोसर जे लोक अर्थात मैथिली प्रेमी लोकनि आइ काल्हि , कोनो 'पुरस्कार' के एना 'जीहलाह' भेल किएक देखि रहल छथि ? कोनो समृद्ध भाषा आ श्रेष्ठ साहित्यक मूल्य लोक एहन-एहन तथाकथित पुरस्कारे मे किएक बुझि रहल अछि, आ से नहि भेटबा कें तेहन निर्णायक मानि कऽ तकरे मानदण्ड मानि क हीन ग्रन्थि सं पीड़ित होइत रहैत अछि ? अपमानकारी कष्टकारी बात हमरा इहो लगैए। तँ की ज्ञानपीठ पुरस्कार बिनु सुमन-मधुप-मणिपद्म-आरसी-किरण-अमर समेत यात्री (नागार्जुन)-राजकमल 'उच्च कोटिक कवि / लेखक नहि छथि ? एकटा मैथिली लेखकक रूप मे एहन मैथिल-बुद्धि हमरा स्वाभिमान कें आहत करैए। से हमर निवेदन जे मैथिली भाषा-प्रेमक नाम पर पुरस्कार हेतु एना जुनि रिरियाइ जाइ जाथि। साहित्यक तँ 'सम्मान' होइत छैक। 'पुरस्कार' 'राजकृपा' थिक। अपना देश मे साहित्य के सर्वश्रेष्ठ सम्मान थिक "साहित्य अकादमी"। मैथिली कें से सम्मान प्रचुर प्राप्त छैक आ अपना लोकनि कें तकर अभिमान होएबेक चाही।हमरा तं अछि जे अपन मैथिली आइ धरि प्राय: पचासोक संख्या मे अकादमी सम्मानित साहित्यकार सं अभिनन्दित अछि। अपन महान भाषाक ई गौरव ! निवेदन जे हमर एहि विनम्र टिप्पणी कें स्वीकार-अस्वीकार जे करै जाइ से मुदा पूर्वग्रह मुक्त मन सं करी। नहि रुचय-जँचय तं क्षमाप्रार्थी बुझी। सस्नेह,