Saturday, March 28, 2020

पावन तिहार संतान।

संतान अपन मायक पावनि-तिहार होइत अछि आ ताहि पावनि-तिहारक ओरिआओन थिकीह-माय।

                    गंगेश गुंजन 

               [उचितवक्ता डेस्क]

Friday, March 27, 2020

ज़िन्दगी की वफ़ादारी

गले भी लगा रखा,उम्र भर लड़ती भी रह गयी।                                            निभाई ज़िन्दगी ने अजब ही मुझसे  वफ़ादारी।              🦚

       गंगेश गुंजन [उचितवक्ता डेस्क]

🌺 कोरोना बुलेटिन 🌺

                  २७मार्च,२०२०.

आज विश्व रंगमंच दिवस पर विशेष  भेंट-दो पात्रीय संवाद-नाट्य:

                  दृश्य:एक मात्र।

[चारों ओर से बंद ड्राइंग रूम में बैठे आमने सामने दो लोग-बेचैन बुज़ुर्ग और बेफ़िक्र युवक।दादा-पोता ]

*

दादा : (बहुत व्याकुलता से खीझ और गुस्से से) :    

         पता नहीं यह अभागा कब जायेगा यहां से।

पोता : जिस्म का फोड़ा नहीं ना है दादू कि एक-दो 

         बारी मरहम लगा देने से चला जाये।आप क्यों     

         परेशान क्यों हो रहे हैं? चला जाएगा न।

दादा : अरे मगर कब जाएगा ? चला जाएगा।

         (और भी ज़्यादा ग़ुस्साते और ख़ीझते) । 

पोता: इम्पोर्टेड बीमारी है दादू। जानते ही हो। वीसा    

         ख़त्म होते ही चला जाएगा।(इत्मीनान से 

         मुस्कुराते हुए )...और आपके ज़माने में वो 

         एक गाना बड़ा मशहूर हुआ था न ?

दादा: (अनमने, उदासीन भाव से) कौन-सा गाना ?          

पोता : जाएगा -आ-आ जाएगा -आ-आ, जाएगा 

         जाने वाला,जाएगा-आ-आ

दादा : अरे वह आयेगा आयेगा था। जायेगा जायेगा 

         नहीं...(तनिक सहज होते हुए गाना सही 

         किया तो पोते ने मुस्कराते हुए कहा-)

पोता: हां दादू। मगर अब आपका आयेगा वाला   

         सिक्वेंस बदल गया। यह तो जाएगा-जाएगा   

         वाला है।

(और काल्पनिक गिटार छेड़ता हुआ बड़ी अदा से तरन्नुम में गाने लगता है-जाएगा जायेगा जायेगा जाने वाला जायेगा।

दादा: बहुत शैतान हो गया है तू...रुक।( वह थप्पड़ दिखा कर उसकी ओर लपकने लगते हैं और

गाते-गाते ही पोता ड्राइंगरूम का पर्दा समेटने लगता है। सामने बाल्कनी दीखने लगता है। सचमुच में गिटार की कोई मीठी धुन सुनाई पड़ती है।)

                   🌿🌳🌿


🦚उचितवक्ता डेस्क प्रस्तुति।🦚

     


कोरोना बुलेटिन

जिस्म का फोड़ा नहीं है कि मरहम से चला जायेगा। इम्पोर्टेड बीमारी है जाने में थोड़ा वक्त तो लेगा।               

        गंगेश गुंजन [उचितवक्ता डेस्क]

Wednesday, March 25, 2020

दु:ख की काया

दुःख की काया आलसी,सुस्त और भद्दी होती है। सुख का तन तन्वंगी, फुर्तीला और सुन्दर होता है। दुःख जहाँ आएगा वहां से उठने का नाम ही नहीं लेगा। सुख कभी आकर बैठेगा भी तो वहाँ से चल देने की जल्दी में रहेगा। 

                   गंगेश गुंजन 

               [उचितवक्ता डेस्क] 

Tuesday, March 24, 2020

ज़रा यक़ीन रखें

बहुत बेताब न हों सब्र और यक़ीन रखें ।    नया है रोग ज़रा वक़्तल लगता है लोगो।

                       गंगेश गुंजन 

                   [उचितवक्ता डेस्क]

कोरोना बुलेटिन में 'भय'

।  भय ।

सभी भय में चुनौती नहीं होती। चुनौती से भरा हुआ भय इंसान को फौरी उपायों के आविष्कार की सामर्थ्य देता है जिस उपाय से समाज पर आये वर्तमान संकट का सामना किया जाता है तथा मनुष्य के भविष्य का मार्ग विपदा मुक्त और प्रशस्त बनता है।

                        गंगेश गुंजन                  

                    [उचितवक्ता डेस्क]