Tuesday, May 15, 2018

भुलक्कड़ जनता का यह प्रौढ़ लोकतंत्र !

भुलक्कड़ जनता का यह प्रौढ़ लोकतंत्र !
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सच और झूठ का प्रयोगात्मक घालमेल और चतुराई का खेल है राजनीति। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का यह एक आजमाया हुआ व्यवहार है जो कालांतर में दलीय विचार के अनुरूप उसके चरित्र का अंग होते  हुए दलीय स्वभाव और उनका राजनीतिक व्यवहार तथा विचार बन गया है। सिद्धांत और आचरण की मूलभूत नैतिकता भी सुविधा और अवसरोचित वेग से बदलती रहती है। इसी प्रक्रिया में नैतिकता सामाजिक जीवन में उदासीन होती गई है। राजनीति में तो नैतिकता पहले ही अप्रासंगिक हो चुकी है।
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गंगेश गुंजन।१६.५.२०१८.

मनोरंजन के विकल्प

मनोरंजन के विकल्प
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कोई मनोरंजन मुकम्मल हो ही‌नहीं सकता जिसमें मूर्खता की छौंक न पड़ी ‌हो। आम तौर  से तो मैं इस शाम-रात के समय टीवी चैनलों के कुछ चुने हुए हास्य भरे मनोरंजन सीरियल ही देखता हूं। दिल बहलता है।लेकिन आज कर्नाटक चुनाव परिणामों पर तमाम टीवी चैनेलों पर छिड़े घमासानों को देखकर‌ ही मनोरंजन किया।और यह भी लगा कि ऐसा करके मैंने कोई ग़लती नहीं की। यहां तो दिल ही नहीं दिल्ली बहल‌ रही‌ थी ! इसमें मैंने कुछ और ज़्यादा ही मनोरंजन प्राप्त किया,क्योंकि चैनेलों के ये विदूषक भी नैसर्गिक प्रतिभा के बड़े धनी अभिनेत्री-अभिनेता रहते हैं।‌
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-गंगेश गुंजन। १५.५.’१८.

Sunday, May 6, 2018

नामवर जी एनडीटीवी

प्रोफ़ेसर नामवर सिंह और रवीश कुमार जी-NDTV के इस सद्य: प्रकरण पर मैं खुश भी हो रहा हूं।खुश यह सोचकर भी कि हिंदी का कोई लेखक इससे पहले शायद ही इस बुलंदी और ऐसे महत्व के साथ मीडिया/चैनेल के लिए टी आर पी का सबब बना है !
    इस पड़ाव पर भी हिंदी के नामवर जी क्या हैं,इसका एक दिग्दर्शन है !
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गंगेश गुंजन। ७.५.'१८.

रात और दिन और ऊषा

(३.)
रात और दिन और ऊषा : एक प्रेम त्रिकोण
               एक तीसरी कहानी भी।
लेकिन एक कथा यह भी है कि अंधकार और प्रकाश दोनों बहुत गहरे मित्र थे। दोस्त। और जैसा कि होता है बचपन से साथ रहते-रहते युवा हुए। तो युवाओं के मन में जो बातें आती हैं भावनाएं होती हैं,उनके भीतर जैसे संवेग और संवेदनाओं का विकास होता है तो उसके हिसाब से स्वाभाविक रूप से दोनों में भी हुआ। दोनों के दिन बहुत आराम और आनंद से बीत रहे थे। कि तभी एक समस्या हुई। इन दोनों के बीच में एक प्रेममयी सुंदरी का प्रवेश हुआ। दोनों ही उस पर प्राण देने लगे। उधर वह सुंदरी भी दोनों को प्रेम करने लगी।अपने लिए दोनों की आकुलता देख कर अच्छा-अच्छा महसूस करने लगी। लेकिन सुंदरी को एक समस्या थी। सुंदरी दोनों को एक ही समान प्रेम जो करने लगी थी।
दोनों में से किसी एक को चुनना उसके लिए बहुत बड़ी मुश्किल थी। वह दोनों को ही इतना चाहती थी कि किसी को निराश और दुखी नहीं कर सकती थी।
इसको लेकर तीनों के बीच बहुत तनाव चल रहा था बहुत दिनों तक कोई समाधान ही ना मिले। दिनों तक तनाव और झगड़े की स्थिति बनी रहती। अतः दोनों मित्र अलग-अलग बेचैन असंतुष्ट दुखी बने रहते। यह समझ ही नहीं पाते कि क्या रास्ता निकालना चाहिए ?
इसी दु:ख और उधेड़बुन में दोनों को एक दूसरे पर सहानुभूति भी हो आती। जैसे मैं उसके बिना नहीं रह सकता हूं वैसे ही वह भी तो उसके बिना नहीं रह पाएगा। दोनों दोनों की तरफ से सोचने लगते हैं। फिर दोनों ने आपस में मिलकर भी बहुत सोच-विचार किया। इस प्रकार वे जब सुंदरी के बारे में सोचते तो उन्हें महसूस होता है कि हम दोनों से अधिक मुश्किल तो सुंदरी की है जिसके लिए दोनों एक दूसरे से तने हुए हैं।
तब एक समय दोनों दोस्त बैठते हैं। मिलते हैं।तय करते हैं। बहुत विचार विमर्श के बाद यह निश्चय होता है कि
-’ठीक है,रात भर सुंदरी,रात के पास ही रहेगी और जब सुबह होने लगेगी तो रात, ऊषाकाल को  दिन के साथ कर देगी। इस तरह से दिनभर ऊषा उसी के साथ रहेगी।
        तभी से दोनों  मित्र परस्पर अपना यह आदर्श वायदा निभा रहे हैं। सूरज शाम को ढल कर रात बन जाता है और सुबह जब निकलने लगता है तो उषा के साथ उगने लगता है।
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-गंगेश गुंजन 9 सितंबर 2017 ईसवी

Friday, May 4, 2018

कहना-सुनना सब बेकार

कहना सुनना सब बेकार यह भी है बहरी सरकार आकर जो ये सोये थे अब भी सोते हैं फुफकार अबके इनको बतला ही दो हो जाएँ ये भी तैयार -4 feb.'17 g.g.

हया का पैमाना


हया का कोई पैमाना हो
इनके क़द का कोई आईना हो
गंगेश गुंजन।

Tuesday, May 1, 2018

काले अक्षरों के लाल अख़बार।

काले अक्षरों के लाल अख़बार।
🌸
लाल रंग भटरंग* हो गया लगता है
कुंद हो गयी है हंसिया की धार
ख़ुद अपने ही अपनों के कपाल
फोड़ता हुआ लगे हथौड़ा !
जबकि अब भी जैसी ही‌,
खेती-बाड़ी‌ है,
पक रहे ही हैं फसलों के खेत।
झूमते ही हैं मौसमी बयार मे
गेहूं के सुनहले शीश !
     किसानों का आत्मदहन है लगातार।
छप ही रहे हैं -
काले अक्षरों में लाल अख़बार !
🍁
*वह एक रंग जो कहीं फीका कहीं गाढ़ा अतः सहज न दिखे, मैथिली में उसे भटरंग* कहते हैं।

-गंगेश गुंजन 30 अप्रैल 2018.