Tuesday, November 13, 2018

थाली में 🌒

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चांद थाली में दिखाकर हमें बहलाते हैं।
हमारी संसद के हमारे ये माई-बाप !
!
-गंगेश गुंजन

Wednesday, November 7, 2018

दीये की आयु

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एक दीया तब तक जलता है जब तक उसे तेल और बाती का साथ रहता है।  दोनों में से किसी एक के चुक जाने से उस दीये का भी अस्तित्व नहीं रहता।
दीये की आयु उसमें तेल और बाती के बराबर है।

-गंगेश गुंजन।७.११.’१८.

Saturday, November 3, 2018

राजनीतिक वक्तव्य एक निवेश ।

राजनीतिक वक्तव्य: एक निवेश की तरह !
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राजनीतिक वक्तव्य एक निवेश की तरह होते हैं।जैसे सावधि जमा खाता होता है,एक प्रकार का वित्तीय निवेश । फ़िक्स्ड डिपाजिट।जमाकर्ता को जिस तरह पांच वर्ष की अवधि के जमा खाते में जमा (फ़िक्स्ड) राशि, उसे सूद समेत मिल जाती है। वैसे ही राजनीतिकों को भी लोकतंत्र के चुनावी 5 वर्षों के शांति काल में दिए गए पक्ष या विपक्ष के उनके वक्तव्य का मूल्य सभी सत्ता और सरकार के आने पर सूद समेत मिलता रहता है मिल जाता है। अलबत्ता जिसकी जितनी राशि का निवेश है यानी वक्तव्यों का निवेश है। जिस मूल्य के वक्तव्य का निवेश है उसी के अनुपात में नई सत्ता नई सरकार उनका भुगतान करती चलती है ।भुगतान का स्वरूप भले ही वित्तीय सुविधाओं से लेकर सम्मान प्रतिष्ठा और संस्थागत पदों पर अध्यक्ष, निदेशक इत्यादि पदों से सुशोभित करने के रूप में किया जाता है। अब लोकतंत्र के इतने स्वतंत्र स्वाधीन वर्षों में इसे यह देश जान गया है । साधारण जनता का जानना बाकी है। जिस दिन इसे जान गई...।

-गंगेश गुंजन।

Wednesday, October 31, 2018

नफ़रत की सरहद

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ख़त्म होती हैं कहीं नफ़रत की  सरहदें।
प्रेम का मार्ग बहुत आगे तक जाता है।
🌺🥀
-गंगेश गुंजन

ज़रा सी बात पर

ज़रा-ज़रा-सी बात में भर आये,
रक़ीब हो गईं  अपनी ही आंखें।
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-गंगेश गुंजन.

Tuesday, October 23, 2018

प्रसाद में केक

।। केक ।।
🥀
प्रसादी की जलेबी खाती हुई एक छोटी-सी बच्ची मुझसे अचानक पूछ बैठी:
-दादा जी,अमेरिका और इंग्लैंड में जो रहते हैं वे पूजा में भगवान को प्रसाद क्या चढ़ाते हैं ? काहे कि वहां मिठाई तो बिकती नहीं है। तब?’
-’हां यह तो है। तुम ही कहो तो वे लोग प्रसादी क्या चढ़ाते होंगे?’ मैंने उसीसे पूछा तो वह एक क्षण सोचती रही। फिर बोली-’शायद दादा,पूजा में दुर्गा माय को वे लोग केक चढ़ाते होंगे ! और सुंदर-सुंदर बिस्किट टॉफी! है न?’
   मुझे स्वाभाविक ही हंसी आ गई। बच्ची की मासूम कल्पना पर आनंद आ गया! बच्ची गांव में एक पूजा- पाठी धर्म प्राण परिवार में वह जन्मी है।संस्कार में ये ही सब हैं किन्तु उसकी बाल सुलभ कल्पना में वैज्ञानिकता लगी। 
-’सो तो ठीक है लेकिन तुमको कैसे मालूम है कि वहां अमेरिका इंग्लैंड इत्यादि देश में मिठाई नहीं मिलती है ?’ मैंने उससे पूछा।
-’नमो काका जो कहते हैं न !’उसने तपाक से कहा।
-’नहीं बेटी अब तो दुनिया भर देश में हर देश का का खानपान चलता है। इसीलिए चाहने पर मिल भी जाता  है। इसलिए इंग्लैंड-अमेरिका में भी मिठाइयां मिलती हैं।हां,थोड़ी कठि- नाई से और महंगी।अपने यहाँ जो बाजार में मिठाई की दुकानें भरी पड़ी हैं,वहां इतनी नहीं। मगर मिठाई मिलती वहां भी है।परंतु बेटा,आपका यह प्रसाद में केक चढ़ाना मुझे भा गया! और मैं यह मानता हूं सच में यदि वे लोग  वहां पूजा करते हैं तो उन्हें प्रसाद में केक ही चढ़ाना चाहिए क्योंकि वहां की मिठाई है और केक भी इतने-इतने प्रकार की मिठाई है कि खाते-खाते आदमी का जी ना भरे,इतना स्वादिष्ट।
-'लेकिन दादा,दुर्गा माँ तो बहुत गुस्सा वाली हैं,तो प्रसादी में केक चढ़ाने पर दुर्गा माय नाराज़ नहीं हो जाएंगी?’
-’मां कहीं अपने बच्चे पर नाराज होती है !’ मैंने कहा।
बच्ची दिल से प्रसन्न थी।
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-गंगेश गुंजन,17अक्टूबर'18

Thursday, October 18, 2018

सबकुछ बीच में है !

सब कुछ बीच में है।
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सब कुछ बीच में है। एक काम अभी पूरा हुआ है ।आगे कोई अधूरा खड़ा है।आज का दिन आज समाप्त हुआ है ।अगले दिन फिर शुरू होने वाला है ।कोई पुस्तक एक पृष्ठ पढ़ी गई है ।आगे भी पढ़ी जाने वाली है ।जहां अंत है वहां दूसरी पुस्तक प्रकाशित होकर समाज में आने वाली है। यही क्रम है जीवन का। नित्य निरंतर। आज मैंने कहा- हम बीच में हैं ।कल थे । ‘आज’ आने वाले कल के बीच में हैं। सब दिन सब काम आधा है जिसे तमाम सृष्टि पूरा करने के चक्र में निरंतर चलती रहती है। जाने कब से सृष्टि स्वयं भी बीच में ही है ।जब भी शुरू हुई अतीत में शुरू हुई है ।और अगर समाप्त होगी तो वर्तमान में नहीं भविष्य में कभी। इस प्रकार वर्तमान विगत कल और आने वाले कल के बीच में संपूर्ण भी है और असंपूर्ण भी है । हर वर्तमान की अर्थात हर एक वर्तमान ही यथार्थ जो आपके विवेक और कर्म के अधीन है। और पूर्व पर है सर्जक या विनाशक है ।प्रकाश है । जीवन को सिर्फ आज और आज के ही दायरे में अपने विवेक अपनी बुद्धि अपनी आशा आकांक्षा के साथ भविष्य से जोड़ना चाहिए। वर्तमान को जहां तक संभव हो अपने आचरण से,अपने कर्म से,प्रयास से,सोच और आदर्श से सचमुच का आदर्श बनाना चाहिए। आदर्श में त्याग की भूमिका मेरे विचार से सर्वोपरि है। अपेक्षा हीनता की प्रेरणा बड़ी है ।संबंध कोई हो वह पत्नी, पुत्र,पिता, माता ! सबसे संलिप्त रहकर भी सबसे निरपेक्ष रहना। एक प्रकार सबमे होते हुए भी सबसे निर्लिप्त रहना एक प्रकार से सबसे बड़ा विवेक है। मन प्राण में अपने साथ अपने परिवार के साथ अपना गांव भी रहे,अपना सकल समाज भी रहे । आदर्श स्थिति है यही ।परंतु यह सब कुछ आप अतीत को सुधारने में नहीं लगा सकते। भविष्य को बनाने के लिए नहीं कर सकते। सिर्फ और सिर्फ वर्तमान को सुंदर से सुंदरतम बनाने की प्रक्रिया चलाए रख सकते हैं।यही आपकी विवेक का तकाजा है यही श्रेष्ठ मनुष्य का लक्ष्य है।
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गांव।-gangesh Gunjan विजयादशमी। १९.१०.’१८