Saturday, January 12, 2019

महादेव बनाती हुईं स्त्रियां !

महादेव बनाती हुई स्त्रियां !
*
ये सैया महादेव बनाती हुई स्त्रियाँ
गुंधी गीली मिट्टी से छुड़ा रही हैं-
हजार-हजार वर्षों की अपनी मैली हथेली के कलंक। मानो,
उबटन का रस्म कर रही हैं
महादेव बना रही हैं।

स्त्री एक हथेली पर रखी माटी की छोटी लेई पर
दाहिने हाथ की उंगलियाँ घुमाती हुई
आकार दे रही है!
शिवरात के ऐसे भगवानजी वाले मौके में वह भी की जाएगी शामिल
यह कैसे हुआ !

बनाएगी घृणित हाथों से अछूत
एक ही पंगत में बैठ कर वह
एक साथ सवा लाख शिवजी !
स्त्री देर से बैठी लगी हुई है। उसके छूने पर गंदे नहीं हो रहे हैं महादेव बाबा।
भरोसा हो रहा है

जानती है कि बहुत बदल गई है दुनिया,
महादेव रचती हुई वह स्त्री।

लेकिन यह जो अपना -
भारत देश कहते हैं, यहां
धर्म प्रार्थनाओं के इस तेंतीस कोटि देवि-देवताओं की
पूजा-अर्चना करने वाली एक अरब से भी कितनी ज्यादा
आबादी ! करोड़ों अपने ही समान लोगों से जी-जान से करती है नफरत।आज भी रहती है दूर
उनकी छाया से भी बच-बचकर।

सोचती है महादेव बनाती स्त्री -
हर तरह दलित-वंचित-कलेसित ये लोग युग-युग से किस सराप को झेल रहे हैं,झुलस रहे हैं

सुबह से शाम, रात-रात तक गर्हित गरीबी और दमघोंट ज़िल्लत झेल रहे हैं।अपने ही जिगर के टुकड़ों के साथ
दाना-पानी के लिए जानवरों-से रेेंग रहे हैं,बूढ़े सास-ससुर के साथ खुद को रोज जैसे दोज़ख में धकेल रहे हैं

अभी महादेव बना़ रही है जैसे,
इतिहास में दफ्न अपने मान-सम्मान कोड़ के फिर से अपने आगे रख रही है !
माटी के महादेव जोड़ती स्त्री !

हल्की नीली साड़ी और गाढ़े आसमानी रंग ब्लाउज में
कितनी सुन्दर लगती है ! और पावन !
सिर से फिसल आए आँचल को
माटी सनी कलाई से माथे पर चढ़ाती हुई महादेव में महादेव जोड़ती है ।

हरेक जोड़ने की कड़ी में हर बार
अपने डरावने अतीत को तोड़ती है,
कोई मनहूस धरती, एक कदम और पीछे छोड़ती है-
घिनौने कर्म कलंक की परछाँई,
मन में कुंडली मारे बैठे संस्कारों के
बुरे, डरे हुए यक़ीन ताकत लगा कर
जोर से तोड़ती है ।
एक और महादेव जोड़ती है-स्त्री !

महादेव बनाती हुई साफ-सुथरी सम्भ्रान्त स्त्री-पुरुषों की पाँत में
वह अपनी जगह पहचान करती है
और समझ पाती है-अधिकार की यह इतनी बड़ी दुनिया अबतक रखी गई छीन कर उससे-
उसके सभी लोगों से।
वही सब वापिस पाती हुई महसूस करती है,पर
किसी रोमांच से आँसू नहीं बहने देती आँखों से बाहर ।
इस खुशी में नहीं रोती है,
खुशी की पहली सीढ़ी पर पड़े हैं कदम मन ही में मन को धोकर
तोलती है,
एक और महादेव जोड़ती है!

लिथरे हुए मन-बुद्धि और ज़ंग लगे संस्कारों की गाँठ पड़ गए सिरे को खोलती है खुद से ही बतियाती-बोलती है-
एक कहा भी ना जा सके ऐसे अहसास में भीतर ही भीतर रोमाँच बटोरती है- स्त्री।

स्त्री के भीतर सड़े हुए सैवाल, पोलिथिन, अगड़म-बगड़म
शहर भर की गंदगी से भरी
अतीत की सड़ाँध पसारती लहराती हुई झील है।
किसी स्वर्ग के जल से इसी के जहर
अदृश्य धोती है मन ही मन-
जिन्दगी का पहला पवित्र स्नान करती है।
जिस नदी में उतरने का भी खुला हक़ न था कभी,
उस अहसास की गंगा में बार-बार
सचमुच आजाद डुबकी लगाती है ।

स्त्री, अपना पूरा जिस्म भीतर आत्मा तक डुबोती है
इसमें समाई है पूरी जमात इनकी
शिवजी के भभूत मल-मल कर अपना तन झक-झक करती है,
जाने कितने युगों से सताये हुए
जख़्मी मन को खंगाल-खंगाल कर धोती हुई खुद पर चन्दन के लेप चढ़ाती है
दशाश्वमेध घाट में धंस कर
जी भर नहाती है।
इस बार जिस्म को कुछ और लक दक बनने की सलाह देती है,
स्त्री असली गंगा नहा रही है!

महादेव बनाती हुई स्त्री कुलीन स्त्री-समाज के साथ
बराबरी के ताजा विश्वास में
शिव वंदना गाती है
गुंधी हुई मिट्टी से स्त्री
बहुत नज़ाकत और मुहब्बत बरतती है,मुरव्वत से पिरोती है। कुछ कहती है,
इस बार चुपचाप ज़रा-सा रोती है
अभी इस दम जैसे पूरे इतिहास-पुराण-धर्म के बोझ
अकेले ढोती है
अनादि अनन्त अपने सताए गये पुरुखों के ताप धोती है,
महादेव पिरोती है।
फरियाद करती है-‘ईश्वर हो आप ।
अब भी तो करो हमारा इन्साफ’ !
स्त्री अपने सिर और काँधों पर लदी,सदियाँ उतारती है,
उनके बोझ !
अपना छीना हुआ नन्हा-सा कच्चा आँगन,खुशबू छोड़ते ताज़ा बेलपत्रों से बुहारती है
अपनी हथेली पर घर,तितली,दरख्त, पानी वाले नये नक्षत्र,
ग्रह-तारा सूरज-चाँद
सिरजती है,बतियाती है,
जरा भी नहीं सकुचाती है,
अपनी जैसों को रस्ता बतलाती है,
स्त्री महादेव बनाती है
खुद को मंदिर से बाहर टुकुर-टुकुर दूर से निहारती अभी मजबूर नहीं पाती
धरधराती हुई बेझिझक ज़ीना चढ़ती है,
जी करे तो उतर आती है,
सहेली को आवाज लगाती है
अधिकार के सुकून से ऐन शिवाले के बीच प्रार्थना कर रही मिलती है,

ताजे-हरे बेलपत्रों पर स्त्री लिखने बैठी है-
ऊँ नमः शिवाय !
सवा सौ बेलपत्र लिखेगी ।
आखिर लिखना आ गया है जब तो,
यह क्यों न करेगी ।
भले एकदम जल्दी-जल्दी नहीं,
जितना लिख लेती है अब अपनी ही यह दसवीं पढ़ रही
लाडो बेटी-जोली !

बेटी किशोर होठों पर महीन मुस्कुराती है। एक और बेलपत्र पर
'ओम बाबा साहेब' लिखती है और
छुपा कर बड़ी बहन को दिखाती है-'मैं तो यह लिख रही हूँ दीदी !' कोमल शरारत से मुस्कराती है। दीदी सशंकित हो अगल-बग़ल देखती है। सहमी हुई मुस्कराती है।
बेटी रफ्तार से पत्ते पर लिखे जा रही है-रक्त चंदन के
लाल लाल अक्षर !

स्त्री हवन कुण्ड के आगे बैठी इत्मीनान से सारे कलेस,
जमाने से पाई घृणा-अवहेलना,
धिक्कार की कंटीली यादें,
मन में सुलगते प्रतिशोध
एक साथ अँजुरी में लेती है और
लपलपाते हवन कुण्ड में कर रही है-
स्वा ऽ हा ऽ ऽ ऽ

ऐसी ही बन रही है वह स्त्री!
एक बार महादेव एक बार अपने को गढ़ती है।

जिस्म के सूने सब अंग पर दमकती इज्जत जड़ रही है
स्वयं को एक नए ही साँचे में मढ़ रही है ।
और तो और आदमी की बगल में खुद को पार्वती कह रही है !

स्त्रियाँ,
सहने लायक़ धीरज से सुनाती हैं विपदा-
दिखलाती है शिवजी को एक-एक ज़ख़्म !

उन्हें भी माफ़ कर देने की विनती करती हैं जिनने नीलाम रखा सदियों उनके हिस्से का उजाला।
मन से उतार देने की गाती हैं आरती !

सैया महादेव बनाती हुई  
पहले से बैठीं स्त्रियाँ बहती हुई गंगा हैं
जिसमें यमुना की तरह मिल रही हैं-
गाढ़े आसमानी रंग ब्लाउज और हल्के नीले रंग साड़ी में

ये स्त्रियां यहाँ,

हजूरी गेट से आई अलवर और टोंक की स्त्रियाँ इस धरती पर एक नया प्रयाग बना रही हैं
इसे देश का असली संगम बता रही हैं।
नए ही तर्ज-तेवर में ‘हजूरी गेट का कोरस’ गा रही हैं !

Saturday, January 5, 2019

आलोचना और आलोचक !

आलोचना और आलोचक !
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ज्ञान का साहसिक बुद्धि-प्रयोग ही आलोचना को सम्यक् श्रेष्ठ और प्रासंगिक बनाता है।
    ज्ञान-साहसी रचनाशील दक्षता किसी आलोचक का मेरुदंड है। पूर्वग्रह मुक्त और निष्पक्ष होना यहाँ अपरिहार्य नैतिकता है।
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 -गंगेश गुंजन 2 दिसंबर,२०१८.

Monday, December 31, 2018

Monday, December 24, 2018

सब्सिडी सिर्फ वित्तीय अनुदान ही नहीं !

सब्सिडी सिर्फ वित्तीय अनुदान ही नहीं !
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सब्सिडी का स्वरूप आज की तारीख में सिर्फ वित्तीय और सरकारीअनुदान ही नहीं है। मुझे लगता है सब्सिडी कई रूपों में समाज के संपन्न लोग भी प्राप्त करते हैं।और उसे अपनी संपन्नता बढ़ाते हैं किंतु अंततः सरकारी जो संगठन है जो संकाय और विभाग हैं उन पर किसी न किसी रूप में पड़ता  उसका बुरा प्रभाव पड़ता रहता है।

जहां तक कम्प्यूटर और नागरिक निजता का प्रश्न है उस संदर्भ में जो सच वे कह रहे हैं और कहे जा रहे हैं उनका औचित्य देश की स्वतंत्रता देश के संग सुरक्षा और जनताके कल्याण से बड़ा नहीं है। हम जैसे नागरिकों के मन में यह भी एक प्रश्न उठता है कि जनसाधारण कम्प्यूटर धारी जनसाधारण भी उसे इस निजता स्वतंत्रता के सवाल पर सशंकित होने और डरने की क्या जरूरत है ? डरने की क्या जरूरत है ?और जो अन्य तबका है समाज का बुद्दिजीवी वर्ग तवक़ा उसमें,समृद्धि की और बढ़ने वाले लोगों का तवक़ा उनकी गतिविधियां राष्ट्र विरोधी ना भी हो सकती हैं तो भी कुछ अनियमितताओं से भरी हुई रह सकती हैं। इसीलिए उन्हें सशंकित होना पड़ रहा है।जनसाधारण किसी भी दुराचरण में क्यों पड़ेगा ? उसे तो अपना छोटा सा घर-परिवार, दिन और रात सुचारू चलाने की चिंता रहती है ।और सामान्यत: नियम के दायरे में रहकर जीवन यापन करने का स्वभाव होता है ,जबकि बड़े-बड़े एन.जी.ओ. वाले,बड़े अखबार, बड़ी संस्थाएं, बड़े ट्रस्ट बगैरह इन सबों में बहुत प्रतिशत अवश्य ही ऐसे होंगे जो राष्ट्र विरोधी नहीं होकर भी देश की विधि व्यवस्था विरोधी गतिविधियों में संलग्न हो सकते हैं और अपने को समृद्ध कर रहे होंगे। तो यह निगरानी भी क्योंकि उनके सरकारी विज्ञप्ति के दायरे में आ जा सकती है इसलिए उनका चिंतित और चौकन्ना होना स्वाभाविक है।

परंतु एक बार फिर बड़ी चतुराई से उच्च मध्यवर्गीय और उच्च वित्तीय लोग जो अपने स्वार्थ और उसी के अनुसार समझ के दायरे में जनसाधारण के कंधे पर बंदूक रखकर चलाना चाहते हैं। इसका क्या औचित्य है ? मुझे नहीं लगता कि सरकार की इस नई विज्ञप्ति में,जिसे तमाम नागरिकों की निजता पर हमला बताया कर प्रचारित और हल्ला बोल दिया गया है वह उचित या सही है। भारतीय समाज की आज भी यही वास्तविकता है । अधिकांश प्रतिशत लोगों की जिन्हें हम सचमुच जनसाधारण कहते हैं सामान्य जनता कहते हैं उनकी चिंताओं में बहुत पारंपरिक और पवित्र रूप से देश की चिंता है और वे अपने अपने स्तर से नियमानुसार सीधा साधा और सच्चा जीवन यापन करते रहते हैं। वे हमारे नियम मुताबिक संविधान के अनुसार और दायरे में ही अपना स्वार्थ तय करते हैं और उसे सिद्ध करने की मशक़्कत में लगे रहते हैं ।इसीलिए यह धारणा फालतू है कि इस सूचना के तहत सारे कम्प्यूटर धारी लोग भारत में निजता खो देंगे । ऐसा नहीं है । क्योंकि अभी भी बड़ी-बड़ी संस्थाएं अधिकांश बहुत नियमानुसार और राष्ट्रीय स्वास्थ्य को अपने एजेंडा में रखकर नहीं चल रहे हैं यह तो सर्वविदित है। राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ सीमा सुरक्षाबल से नहीं देशप्रेमी नागरिकों पर भी टिकी होती है। संस्थागत संहिता एवं वित्तीय अनियमितता से भी देश दुर्बल होता है। संविधान कमज़ोर होता जाता है।

यह प्रश्न जनसाधारण की निजता के दायरे का बिल्कुल नहीं है। अपितु यह समाज के कुछ प्रतिशत समृद्धि लोग, परिवार और कुनबे के संदिग्ध विमति समूह का प्रायोजित हल्ला बोल है जो सरकार की सुविधा और मिलने वाले संरक्षण के रूप में सब्सिडी लाभ उठाने के आदी हो चुके हैं। संविधान प्रदत्त निजता के अधिकार की आड़ में सब्सिडी अपना विशेषाधिकार मानते हैं और स्वतंत्र भारत में गत कितने ही दर्शकों से निर्विरोध और सुविधा पूर्वक प्राप्त कर रहे हैं ।

अतः मुझे तो लगता है कि यह विज्ञप्ति उनके सब्सिडी छीनने की घोषणा है और वह सहन कर हर बार की तरह हर मुद्दे की तरह इसे भी जनसाधारण से जोड़कर उनका स्वार्थ बता कर अपना युद्ध जीतना चाहते हैं जो प्रकार अंतर से राष्ट्र की प्रगति के अनुकूल नहीं है देश की सुरक्षा के भी अनुकूल नहीं है।        **
-गंगेश गुंजन. 22 दिसंबर, 2018.

Friday, December 14, 2018

हम इतने करुणाहीन क्यों हो रहे हैं

हम करुणाहीन क्यों होते जाते हैं।
                  🌻
करुणा मनुष्यता का दिव्य गुण है। स्वयं को असमर्थ और दयनीय होने से बचा कर,इस अनमोल मानवीय धन-करुणा का अपने लिए ख़र्च होने से बचा कर हम समाज का मूल्यवान सहयोग कर सकते हैं।पड़ोस और समाज को दयनीय पर ही दया आती है। स्वस्थ और सक्रिय मनुष्य पर समाज की सदा संतोष और सराहना की दृष्टि पड़ती है। अपने-अपने यत्न और रखरखाव से हम स्वस्थ रहें तो समाज की करुणा बचेगी।
    वृद्ध जन वृद्ध तो दिखें लेकिन असहाय और बीमार नहीं।ऐसी चिन्ता रखने से सामाजिक करुणा का अपव्यय बच सकता है।
मुझे लगता है अन्य भंडारों की तरह ही मनुष्य में करुणा का भंडार भी सीमित है अतः करुणा का भी प्रयोग और ख़र्च भी बहुत विवेक के साथ ही होना चाहिए अन्यथा यह पृथ्वी धीरे-धीरे अपने इस दिव्य मानवीय गुण करुणा से रिक्त हो जाएगी और मनुष्यता निष्करुण।
                 🌳🌳
-गंगेश गुंजन। १५.१२.’१८.

Saturday, December 8, 2018

सही मन से लिखा

सही मन से लिखा !

सही मनसे लिखी गई या की गई टिप्पणी आपके मन के विरुद्ध भी है तो आप को प्रभावित करती है। यह आज भी सच है कि आप उस से अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते।
कहना यह चाहता हूं Facebook पर कई ऐसी टिप्पणी आती है जो उस लेखक की ईमानदारी और सदाशयता की,विवेक से भरी हुई टिप्पणियां लगती हैं। कई बार विचार आता है जो आपके अनुकूल नहीं होने पर भी प्रभावित करता है और यह विशेष बात लगती है।
   युवतर पीढ़ी में यह गुण मुझे कुछ अधिक देखार लगता है। इसका स्वागत होना चाहिए।स्वागत हो भी रहा है। कभी लिखा था कि भाषा चुग़लख़ोर होती है। चुग़ली करती है। बेईमान लेखन इसका जल्द और ज्यादा शिकार होते हैं।भाषा भी आईना है !
-गंगेश गुंजन।

Thursday, December 6, 2018

कुछ ज़रूरी टिप्पणियां !

सत्ता से बाहर सत्ताभोगी और सत्ताधारी रानीतिक दल !
**
सत्ताभोगी किसी रानीतिक दल का कार्यकर्ता या नेता अगर दूसरे सत्ताधारी दल के नेता की‌ खिंचाई करता है तो यह उसकी ‘थेथरै’  ही कही जाएगी। बिल्कुल थेथरै। कारण यह कि अभी तक देश की जनता को ऐसे किसी एक भी राजनीतिक दल के शासन सत्ता में रहकर ऐसा कुछ  अनुभव नहीं हुआ है कि भ्रष्टाचार उसके गुप्त एजेंडे में‌ नहीं रहा हो। सो यह ऐसे लोकतंत्र का यह चुनावी कर्मकाण्ड भी मिलाजुला कर सत्ता का हस्तांतरण भर होकर रहता है।ठीक वैसे ही 1000 मीटर के रिले रेस के जैसा।
जनसाधारण बेचारा तो 5 वर्ष का पपीहरा है!
००
वर्तमान कितना भी छोटा हो,अतीत से बड़ा होता है लेकिन वर्तमान कितना भी बड़ा हो भविष्य से छोटा होता है।
२.
संस्कृति माफ़िया !
चंदन माफिया,कोयला-बालू-
माफ़िया और  के समान ही देश भर कहीं 'संस्कृति माफिया' का भी उद्भव और विकास तो नहीं हो गया लगता है ? अगर है तो इसका संपोषण निश्चित ही राज्य और केन्द्रीय सरकारों के संस्कृत मंत्रालय और उनसे संबद्ध केंन्द्र और राज्यों की अकादमियां करते हैं। अपवाद छोड़ दें तो इसके उत्स चाहे जो और जहां भी रहें।
३.
नानी विद्या
संस्कृत मेरी नानी विद्या है।(विद्यानानी)! क्योंकि मैंने हिन्दी पढ़ी है और संस्कृत हिन्दी की जननी है, सो संस्कृत मेरी नानी विद्या है।

-गंगेश गुंजन।६.१२.