Sunday, September 13, 2009

पछिला दिन हम अपन दुटप्पी मे जे सन्दर्भ अधे-छिधा कहि सकल रही से छल-आधुनिक मैथिली साहित्यक गौरव-स्तंभ डा०मणिपद्मजीक जयन्ती उत्सव।दिल्लीक एलटीजी सभागार मे-स्थानीय संस्था मिथिलांगनक आयोजन। ओहि अवसरक किछु अनुभव तं कहि गेल रही। मुदा किछु शेष रहि गेल रहए। नहि जानि अपने कें कोनो महत्वोक लागय बा नहि मुदा हमरा कहबाक चाही। एहि ‍द्वारे जे एखनहुँ हमरा लोकनि केहन आउटडेटेड भलमानुस बनल बैसल छी।

आजुक कारपोरेटी युक्ति आओर चलनिक मोताबिके हॉलक प्रवेश-द्वारक मुँहथरिए लग मिथिलांगनक संस्था-साहित्य समेत मिथिलांगन पत्रिकाक टटका अंक सेहो पर्याप्त मात्रा मे साजल धएल बुझाएल। आगन्तुक कें तकर ग्राहक बनवाक आग्रह कएल जा रहल छलैक। सोझाँ मे एकटा उपस्थिति-मन्तव्यक रजिस्टर दैत एक युवक अपन परिचय-पता-आ विचार लिखबाक आग्रह कएलनि। से करैत हाँल मे प्रवेश करैत रही तं कोनो अपरिचित युवक गंभीर आग्रह सं अपन दू पातक पम्प्लेट लेबाक बादहि भीतर प्रवेश करबा योग्य बन देलनि। जे से। महेन्द्र मलंगियाजी बाटे मे भेटि गेल रहथि। मैलोरंगकरमी कमल-ओना प्रकाशक शब्द मे-पवन सेहो भेटि गेल रहथि जा क बैसलहुं सभागार मे।
तकरा बादक विषय मोटामोटी कहने रही। नाटक बेशी लोक देखए चाहैत छैक से अनुभव दोहरा रहल छी। अर्थात् मैथिली-मिथिला-मैथिलक व्यापक समाज मे हितकारी रुचिक नव-निर्माण मे नीक नाट्यालेख अर्थात् नीक लेखक कें गंभीर समर्पण भावें सक्रिय-संलग्न होएबाक चाही। यद्यपि ओइ साँझक नाटक-सामा चकेबा आलेख समेत मंच-प्रस्तुति-युक्ति पर उन्नयनकारी आलोचना-विवेचना होएबाक आवश्यकता।
दोसर दिन लेखन-प्रस्तुतिक बधाई तथा अपन भावना हम रोहिणी रमणजी कें कहबाक वास्ते फोन कएने रहिअनि। ओ त नहि नाटकक निर्देशक संजयजी फोन पर रहथि। नीक लागल जे नाटक देख हमर आएब हुनका लोकनि कें नीक लगलिन। नाटक विषय मे जिग्यासा कएलनि तं कहने रहिअनि अपन प्रतिक्रिया। जे से। कनी दोसर दिस चल गेल चर्चा माफ करब।
घुरती काल मिथिलांगनक ग्राहक बनबाक उद्देश्यें स्टाल पर गेलहुं।विधवत सदस्य कही-ग्राहक कही बनबाक क्रम मे स्वभावतः अपेक्छा रहए जे टटके अंक सं बनाओल जाएत। कार्यव्यस्त व्यक्ति रुपैयाक रसीद संगे एक प्रति मिथिलांगनो देताह। आहि रे बा कथी लए देताह। हम जकरा हुनक स्वाभाविक समझ आ तत्परता बूझि क कनी काल मुँह तकैत पत्रिका नहि पाबि खउंझाइत विदा भ गेलहुं। से मानै छी नहि करबाक चाहै छल। हम अपन इच्छा कहितिअनि-एही अंक सं सदस्यताक। मुदा इएह तं हम कह बैसल छी। ई विषय आओर चिन्तित तं गाम पर आपस आबि क भेल। गेट पर जे पर्चा जेकाँ भेटल रहए तकर विषय बुझबा लेल जखन खोलि क पढ़लिऎक तं चकित रहि गेलहुं। पर्चा चिक्कन-चुनमुन सुन्दर कागत पर छपल सद्यः पुनर्प्रकाशित होए वला मैथिली पत्रिका-मिथिला दर्शनक विग्यापन सहित एकर ग्राहक बनबाक आग्रह पत्रक छलैक। जे मैथिल समाज मे अपना कें ए मीडिया हाउस डेडिकेटेड
टू मैथिली क क प्रचारित-प्रसारित क रहल छथि। एकरा कही डिजिटल युगक प्रबन्धन-बुद्धि। सोचू जे अवसर उपलक्छ्य आ इन्तिजाम मिथिलांगनक आ आजुक प्रबन्धन व्यवस्थाक तत्परता सं अपना वास्ते उर्वर बना गेल-मिथिला दर्शन । साधु-साधु कहलिऍन।
आ मिथिलांगनक कर्ता-धर्ता अपन पत्रिकोक साधारण सन मार्केटिंग नहि क सकलाह।
हम तं मैथिल पाठक-दर्शक ।हमरा वास्ते मि०द०क प्रबंधन सुखद आ आश्वस्तकारीतें नीक लागल। मिथलांगनक अलसाएल अनमनाएल प्रबंधन चिन्तित करए वला।
अनुभवक अपन ई मिश्रबोधी सुख-दुःख ककरा कही आ कतए । तें अही माध्यम कें समर्पित।
गंगेश गुंजन

5 comments:

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