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ग़ज़लनुमा
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हर किसी के हाथ में पत्थर रहा
जानकर भी घर से मैं बाहर रहा
ज़रूरी है जानना इन हाथ को
सियासी चाणक्य भी सब डर रहा
किस अंधेरे में लड़ाई चल रही
क़त्ल किसका कौन इसमें कर रहा
जंग के भी वे ज़माने लद गये
एक नया अंदाज़ सज-संवर रहा
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गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडे.

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