Thursday, May 30, 2024

एक अत्यावश्यक सूचना !

           एक अत्यावश्यक सूचना !
                         *
     अगले 4 जून तक देश का दिमाग़               स्थगित है।                
                        ! 😁!                                        सूचना जनहित में जारी।                                  गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।

निर्लिप्त सा झूठ

⚡⚡।    बहुत निर्लिप्त-सा
वह भी झूठ ही बोल रहा है
जिसके विरुद्ध,पूरी पेशेवर ताक़त से
किसी की वफ़ादारी में ही
तस्किरा कर रहा है।
बड़े शानदार अंदाज़ में अपने झूठ से
दूसरे सच का शिकार कर रहा है।
लैश हैं हमारे समय के कतिपय चिंतक, कवि-कलाकार और विचारक।
उतने ही निस्पृह लेकिन ये
साधारण जन भी हैं जो अपनी सरल स्वच्छ हृदयता के साथ, महज़ रखने के लिए
सत्य का मान रखते रहते हैं ।
अपने स्वजन का कहना मान कर सब सुनते हैं, और भरोसे से बरतते हैं।
प्रेरित हो जाते हैं और किसी तरफ धकेल दिए जाते हैं।
जिधर भी ठेल कर भेजे जाते हैं
उधर ही किन्हीं तिलिस्मी माहिरों के हाथों
सूर्यास्त तक ठगे जाते हैं।
दो तेवर-ओ-अंदाज़ में एक तरफ पहले और दूसरी तरफ दूसरे जुमले और भाषा में पगे जाते हैं ठगे जाते हैं।
अपनी-अपनी ताक़त लगाये,चल-चल कर अपने-अपने भरोसे पर जा मत्था टेकते हैं
अनगिन लोग !
       गणतन्त्र को फिर सिर नवाते हैं।
तो क्या सभ्य सुभ्यस्थों का महावन हो गया लोकतंत्र!
°°
कहाँ है वह महाद्वार जहाँ
कोई पहला सूर्योदय कब से न प्रतीक्षा में खड़ा है,हम जिसे सदी भर हसरतों से तकते हैं ! 
                               ••
                        गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Saturday, May 25, 2024

नगण्य गण्य नगण्य

आपके लिए जो व्यक्ति नगण्य है देशके संविधान में वह भी आपके बराबर ही गण्य है।फेसबुक .पर किसीको हेय समझने-कहने की असभ्यता करने से बचें। यह लोकतंत्र है।

                गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, May 24, 2024

ग़ज़लनुमा: हुस्न और इश्क तो बेआब हुए बैठे हैं

हुस्न और इश्क़ तो बेआब हुए बैठे हैं
अब भी शाइर वही आदाब लिए बैठे हैं।

हाथ होने थे नर्म फूल जो पसन्दीदे बदशकल बेरहम तेज़ाब लिए बैठे हैं।

हाय इस मौसम में भी बद्ज़ेह्नी छायी
ज़ौक़-ए-हथियार में रबाब लिए बैठे हैं।

हम भी किस बात पे यूंँ फ़िक्रज़दा हो बैठे
वो ख़ुश बहुत क्या नाया’ब लिये बैठे हैं।

मसअला नाज़ुक है और ये ऐसे ग़ाफ़िल
खौलते वक़्त में क्या ख़्वाब लिए बैठे हैं।

ज़ोर से जिनको आवाज़ ही उठानी थी
वही ज़ुबान तक जनाब सिये बैठे हैं।

बहुत नहीं भी पर वे सब जो अपने हैं
हाथ में शरारे बेताब लिए बैठे हैं।
                       •
           गंगेश गुंजन २०.५.'२४.

            #उचितवक्ताडेस्क।

Wednesday, May 22, 2024

ईश प्रार्थना !

🌾🌾           ईश प्रार्थना !
                           •• 

आप तो ईश्वर हो
बिना बिजली के रह सकते हो
हमें अंधेरे में बहुत डर लगता है
हम इन्सान हैं न।
अपनी विशाल सजावट को ज़रा कम करके थोड़ी बिजली हमारी बस्ती में भी नहीं भेज सकते ?
आप तो ख़ुदे दैवी आलोक से उद्भासित हैं।
   ईश्वर होकर इतना तो कर ही सकते हैं।
ठीक आपके पास में ही तो हैं हम।
कोई बहुत दूर भी नहीं है-
हमारी यह ग़रीब बस्ती। 
उम्र में बहुतेरे राजनेताओं की नानी-दादी से भी बड़ी है।
पिचहत्तर-अस्सी साल से यह भी अंधेरे में खड़ी है।
     अभी तनिक और डरी है।
                        ❄️
                   गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क.

Thursday, May 16, 2024

ग़ज़लनुमा : होगा कभी किसी दिन ज़िक्र...

❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️❄️

    होगा कभी किसी दिन ज़िक्र ज़माने का
    पहला नाम आएगा इस दीवाने का।

    अभी किनारा कर ले कोई जो जितना
    कबतक नाम छुपेगा किस परवाने का।

    दुनियादारी सब दरकारों से बाहर
    किसे दर्द याराना वक़्त बिताने का।

    एक जन्म में ही लगता सबकुछ बासी
    कशिश नहीं कुछ कहीं करे जी जाने का।

    उलझे रिश्ते भी कितने सुन्दर थे, अब
    हुनर भूल बैठे हम दोस्त रिझाने का।

    मैंने क्या किसने सोचा होगा कल यह
    जो अंजाम हुआ ख़ुशहाल फ़साने का।

    कल तक था अपने लोगों का,अपना घर
    नयी सियासत में है गाँव सयाने का। 
                          ।📕।                                               गंगेश गुंजन 
                  #उचतवक्ताडेस्क.

Monday, May 13, 2024

दो पँतिया : जिस सफ़र की याद में

     जिस सफ़र की याद में मरते रहे 

     सुनोगे तो ज़िक्र से ही रो पड़ोगे।

🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂

                  गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Sunday, May 12, 2024

ग़ज़ल नुमा : सुख भी बोझल करता है...

🍂
      सुख भी बोझिल करता है
      मेरा  दिल  यह  कहता है।

      ग़ैर  नहीं  लगने   लगता   
      दुःख गर ज़्यादा टिकता है।

      जिसको भूल चुका हूँ मैं
      वह  मेरे  ग़म  सहता है।

      गरम लहू कुछ यादों का
      ठंढे  तन  में  बहता  है।

      रहते - रहते   सहरा  में
      मन भी रमने लगता  है।
                      •
               गंगेश गुंजन                                       #उचितवक्ताडेस्क।                                   रचना : १२.५.'२४.

निर्मम बेडौल सच...

🍂       ओ भाग्यशालिओ      !
    कितने ही लोग अभागे हैं। उनकी बदौलत ही आप भाग्यशाली बने हुए हैं।
  ऐसी समाज व्यवस्था का यह बेडौल  और निर्मम सच आपको
      भाग्यशालियो !
            समझना चाहिए।

                 ।🌾🛖🌾।                                         गंगेश गुंजन                                   #उचितवक्ताडेस्क।

दो पँतिया : कह रहे थे उम्र के वो आख़िरी लम्हे मुझे...

कह रहे थे उम्र के वो आख़िरी            लम्हे मुझे ।                                     और तो गुज़री भली ही इश्क़                थोड़ा कम किया ।

                   🌼🌼                                            गंगेश गुंजन                                   #उचितवक्ताडेस्क।

Saturday, May 11, 2024

दो पंतिया : आ गये अनगिन सड़क पर...

आ गये अनगिन सड़क पर और कुछ      अब मालदार।

बेबसी में तिलमिलाए सब सियासी          वफ़ादार । 

                 गंगेश गुंजन।                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Friday, May 10, 2024

दो पंँतिया : रह लेते ज कर अब गुंजन।

                        |🌈     
        रह लेते जा कर अब गुंजन,  
    और कहीं तो अच्छा था.
बेसुकून वक़्तों में माँगे
         दिल अब कोई और दहर।
                          🌊
                      गंगेश गुंजन                                   #उचितवक्ताडेस्क.

Wednesday, May 8, 2024

ग़ज़ल नुमा : इसमें या उस दरिया जाय

                    🌓
      इसमें या उस दरिया  जाय
      किस दरिया जा डूबा जाय।

      एक तरफ़ अंधी धतकर्मी
      दूजा जिसको मन गरिआय।

      सन्तन को भी सत्य कहांँ अब
      झूठ-मूठ ही अधिक सुहाय।

      एक तो अर्जित भर वैभव
      दूजा सबकुछ रहा लुकाय।

      अचरज क्या अखबारों में
      दानवीर कल कथा छपाय।

      सब असनान बाथरूम में 
      को जा के गंगा में नहाय।

      क्या सूझै जब ख़ाली पेट
      किस बज़ार में करे उपाय।
                     🙊🙊
                 गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Tuesday, May 7, 2024

नैतिकता का हथियार और राजनीति

नैतिकता के हथियार से राजनीति की लड़ाई हास्यास्पद सोच है।

                         .🌓.                                               गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Sunday, May 5, 2024

किछु दु पंँतिया

                     । 📔।
      लाल कलम में कारी मोसि
      सावधान  किछु दुर्घट हयत।
                     •
  जहिए संँ लीख’ लगलै कवि लाल
कलम सँ कारी बात
  तहियेसँ जनता पर बढ़लै
केहने-केहने दन आघात।
                     •
     सब  दिन  क्यो सम्राटो  नहि
     सम्राजो सब एक दिन जाइछ।
                     •
              गंगेश गुंजन                          ‌        #उचितवक्ताडेस्क।

Saturday, May 4, 2024

घृणा : ईंधन

🔥।               नफ़रत : ईंधन .
  सृष्टि में अकार्यक शायद ही कुछ है यहाँ तक कि आदमी की नफ़रत।
जिस प्रकार मनुष्य की बिष्ठा से भी गैस,ऊर्जा तैयार की जा सकती है और रात भर उससे रौशनी के खम्भे में जलते हुए अंधेरी सड़कों पर प्रकाश फैलाया जा सकता है,जाड़ों मे तापने योग्य जलावन और खाना पकाने में ईंधन की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है तो इतनी विशाल घृणा को भी वाँछित ऊर्जा में परिवर्तित क्यों नहीं किया जा सकता। सकारात्मक बेहतर बहुत कुछ ? बजाय इसके कि सुबह से शाम,रात तक हम अपनी नफ़रतें व्यर्थ ही यहांँ-वहांँ जुगाली करते और थूकते फिरें ?
  बहुत कुछ नहीं भी हो यह फेसबुक किन्तु ख़ामख़्वाह कोई उग़ालदान भी नहीं है।ऐसे में भाषा भी तो प्रभावहीन होती जा रही है। सहलाये या आघात करे अपना काम तुरत करने पर ही भाषा भाषा है।
सिर्फ वर्तमान विद्यमान ढोना ही तो इसका काम नहीं।भविष्य ज़्यादा निर्भर है इसमें।

     स्वतंत्रता भी तो हम गूंगी नहीं- भाषा में पाते हैं।
                        🌿
                  गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

Thursday, May 2, 2024

दो पँतिया : बहुत छोटा घर हमारा...

बहुत छोटा घर हमारा अभी तक        एकान्त था।                                      एक बच्चा आ गया यह घर                    बड़ा लगने लगा।         

                गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

Wednesday, May 1, 2024

मज़दूर दिवस:

    ये ही काँधे हैं इन पर बैठा है सूरज 
    ये ही बाज़ू हैं सभी नक्शे बनाते हैं।                               💥                                         #उचितवक्ताडेस्क।                                  गंगेश गुंजन                                      मज़दूर दिवस।