Thursday, October 20, 2016

मैथिली प्रेम । भाषा साहित्य। पुरस्कार प्रकरण।ओ जनमञ्च तंत्र!

फेसबुक समेत समस्त प्रचार-प्रसार माध्यम पर चतरैत- फड़ैत-फुलाइत मैथिली भाषा-प्रेम पर, अमलेन्दु जी अहांँक टिप्पणी, अपेक्षाकृत संतुलित अछि। तें।हमरा नीक तंँ लगबे कएल,ई दू पाँती लिखबोक स्पृहा सेहो बलवती भेल।आब अहांँक एहि विषय के तथाकथित संबोधित मैथिली समाज कोन रुचि आ दृष्टियें लैत छथि से देखब पूर्ण रोचक हएत। शुभकामना ! हँ,हमरा तं मैथिली-हिन्दीक ओहो युग भोगल अछि जाहि मे आइयो सं विशेष मैथिली अनुरागी कए टा विद्वान, हिन्दीक विरोध मे अंग्रेजी सं आचमनि -पूजन करऽ लगैत रहथि। ई कृत्य हमरा तहियो अनुचित अनर्गल लागय आ आइयो लगैए।बाजब - लिखब तं मैथिली नै तं अंग्रेज़ी। हिन्दी हेय। ( ओहनो व्यवहार कें हमर बुते मूर्खता पूर्ण एहि दुआरे नहिं कहल हैत जे से लोकनि हमर 'गुरुजन कोटिक रहथि। )। हम हिन्दी भाषा ल' क' आरम्भहि सं अपने घर मे मैथिली भक्त लोकनि सं गारि-फझ्झति सुनैत सहैत आएल छी तद्यपि निरन्तर एही दुनू भाषा मे लिखैत आबि रहल छी।आ जीवै छी। मैथिली हमर जन्मदात्री माय। हिन्दी अन्नदात्री माय। यात्री जी होथि, आरसी बाबू होथि वा गुंजन होथि हिनका लोकनि कें जीविकाक अर्हता हिन्दीएक रहलनि।लिखबो हिन्दीए मे आरम्भ कएलनि। (गुंजन तं अबस्से)। तें ई बड़ संवेदनशील मामिला छैक। कारण जे, हिन्दी देशक राष्ट्र (राज) भाषा सेहो तंँ थिक। तकर तंँ अवमानना नहि होएबाक चाही। तें मैथिली समाज मे आँखि मूनि क' एहन संदर्भक टिप्पणी करैत चलबाक जे बजार आ विज्ञापनी दुर्वृत्ति पसरि गेलय ताहि पर मैथिली मे कोनो 'अनुशासन' संभव बाँचल छैक ? ( अहांँकें निश्चिते हम, तेहन कोटिक बजन्ता मे नहि मानैत छी ओ ताही भरोसे अहांँकें एतेक ई लीखियो रहल छी)। एकटा आर बिन्दु। कोनो रचनाकार के आलोचना वा धिक्कारबा सं पूर्व, आलोचक-धिक्कारक महोदय / महोदया कें एकरो जानकारी अबस्से रखबाक नै चाही जे अमुक हिन्दी मे लिखनहार मैथिली लेखक, मैथिलीक प्रसिद्धिक रसास्वादन कऽ लेबाक पश्चात् हिन्दी लीखऽ लागल छथि कि पहिनहिं सं हिन्दी लिखैत रहथि ? हमरा पर तं ई अन्याय। जे छुच्छे यश, अर्थ ओ उपाधि लेल हिन्दी मे लिखऽ लगैत छथि से (क्षमाप्रार्थी छी) ने मैथिली मे श्रेण्य ने हिन्दी मे छथि। से लेखक प्रतिबद्ध कोनहुंँ ठाम नहि। (संदर्भ : आ.पं.गोविंद झा जीक हालिया टिप्पणी) । दोसर जे लोक अर्थात मैथिली प्रेमी लोकनि आइ काल्हि , कोनो 'पुरस्कार' के एना 'जीहलाह' भेल किएक देखि रहल छथि ? कोनो समृद्ध भाषा आ श्रेष्ठ साहित्यक मूल्य लोक एहन-एहन तथाकथित पुरस्कारे मे किएक बुझि रहल अछि, आ से नहि भेटबा कें तेहन निर्णायक मानि कऽ तकरे मानदण्ड मानि क हीन ग्रन्थि सं पीड़ित होइत रहैत अछि ? अपमानकारी कष्टकारी बात हमरा इहो लगैए। तँ की ज्ञानपीठ पुरस्कार बिनु सुमन-मधुप-मणिपद्म-आरसी-किरण-अमर समेत यात्री (नागार्जुन)-राजकमल 'उच्च कोटिक कवि / लेखक नहि छथि ? एकटा मैथिली लेखकक रूप मे एहन मैथिल-बुद्धि हमरा स्वाभिमान कें आहत करैए। से हमर निवेदन जे मैथिली भाषा-प्रेमक नाम पर पुरस्कार हेतु एना जुनि रिरियाइ जाइ जाथि। साहित्यक तँ 'सम्मान' होइत छैक। 'पुरस्कार' 'राजकृपा' थिक। अपना देश मे साहित्य के सर्वश्रेष्ठ सम्मान थिक "साहित्य अकादमी"। मैथिली कें से सम्मान प्रचुर प्राप्त छैक आ अपना लोकनि कें तकर अभिमान होएबेक चाही।हमरा तं अछि जे अपन मैथिली आइ धरि प्राय: पचासोक संख्या मे अकादमी सम्मानित साहित्यकार सं अभिनन्दित अछि। अपन महान भाषाक ई गौरव ! निवेदन जे हमर एहि विनम्र टिप्पणी कें स्वीकार-अस्वीकार जे करै जाइ से मुदा पूर्वग्रह मुक्त मन सं करी। नहि रुचय-जँचय तं क्षमाप्रार्थी बुझी। सस्नेह,

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